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मर्द बनाने की बजाय आप अपने बेटे को औरत की इज्ज़त करना सिखाते तो अच्छा होता…

आपने अपनी बेटी को तमीज ही नहीं सिखाई, ले जाइए अपनी बेटी। हमें ऐसी बहु नहीं चाहिये जो अपने पति को मारती हो।

आपने अपनी बेटी को तमीज ही नहीं सिखाई, ले जाइए अपनी बेटी। हमें ऐसी बहु नहीं चाहिये जो अपने पति को मारती हो।

रक्षा के ससुराल का माहौल उसके मायके के माहौल से बिलकुल उलट था। रक्षा के मायके में जहाँ सब एक दूसरे को बराबर मान सम्मान देते थे, कोई किसी के लिए किसी भी तरह की गाली-गलौज या अपशब्द का प्रयोग नहीं करता था। लेकिन ससुराल में सब कुछ पूरी तरह अलग था। यहाँ घर के सभी पुरुष अधिकतर घर की महिलाओं से गाली देकर ही बात करते। रक्षा को सबसे ज्यादा गुस्सा तब आता जब उसकी सास सरोज जी भी उनका ही साथ देती और कहती, “अरे! ये तो मर्दों की आदत होती है इसको क्या दिल से लगाना।”

रक्षा की नयी नयी शादी हुई थी तो वो कुछ कह नहीं पाती थी लेकिन जैसे ही मां-बहन की गालियां ससुर जेठ को देते, सुनते ही उसका खून खौल जाता, लेकिन वो चुप कर जाती।

एक दिन रक्षा और उसकी जेठानी शिल्पा दोनो रसोई में काम कर रही थी कि तभी शिल्पा के पति आलोक उसे माँ-बहन की गालियां देते हुए रसोई में आ गए और बोले, “दिमाग कहाँ रहता है? क्या तेरे बाप ने चीनी फ्री की भेजी थी जो चाय इतनी मीठी बना दी?” कहते हुए चाय शिल्पा के ऊपर फेंक दी।

चाय का कप गिर कर टूट गया, और रक्षा देखती रह गयी। सब मूक दर्शक बने देखते रह गए और आलोक वहाँ से चला गया। शिल्पा रोते हुए चाय की टूटी कप के टुकड़े उठाने लगी तो रक्षा ने कहा, “भाभी आपने कुछ बोला क्यों नहीं?”

“क्या बोलूं, अब यही मेरी किस्मत है और मेरी ही गलती है। अगर चाय मीठी ना बनती तो ये ऐसा ना करते।”

उधर सासु मां बड़बड़ाते हुए कह रही थी, “सुबह-सुबह दिमाग खराब कर दिया मेरे बेटे का।”

रक्षा सन्न थी लेकिन सासु मां की बात सुनकर उसने कहा, “माँजी, आपको जेठजी को समझाना चाहिए, आप तो भाभी को ही बोले जा रही हैं।”

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“हाँ तो सारा दोष ही इसका है अभी साल भर छोड़ा था इसको मायके, वो तो बाप-भाई ने हाँथ जोड़कर माफी मांगी तो वापिस रख लिया बेटे ने, मेरे कहने पर”, सरोज जी ने कहा।

“अच्छा! माँजी लेकिन अगर भाभी की जगह मैं रहती तो मैं शायद मेरा हाथ उठ जाता और मैं एक थप्पड़ रसीद कर देती। अगर कोई भी मुझे गाली दे तो सीधा मुँह तोड़ दूँ मैं उसका”, कहकर रक्षा कमरे में चली गयी।

ये बात सरोज जी को इतनी ना गवार गुजरी की उन्होंने रक्षा के पति अमर को इतनी बढ़ा चढ़ा कर बताई कि रात में गुस्से अमर में रक्षा का हाँथ खींचते हुए अपने कमरे से अपने माँ के कमरे में लाकर कहा, “माफी मांग माँ से।”

“अमर पहले तो मेरा हाँथ छोड़ो और किस बात की माफी? किया क्या किया है मैंने?” रक्षा ने हाथ छुड़ाते हुए गुस्से में कहा।

“अच्छा! सा*…तेरी माँ##$$$”, अमर ने जैसे ही गालियां रक्षा को देनी शुरू की वैसे ही रक्षा ने चटाक…चटाक…दो थप्पड़ अमर के गाल पर मारते हुए कहा, “खबरदार जो मुझे माँ-बहन की गालियां दीं तो। मुँह थोड़ दूँगी मैं तुम्हारा।”

पूरे घर मे जैसे भूचाल आ गया, सबकी जैसे चेहरे से हवाइयां उड़ गईं।

“नई बहू ने मेरे बेटे को थप्पड़ मारा”, नाम से ये बात सबके सामने सरोज जी सबको बताते हुए कहा, “लगाओ इसके बाप को फोन। ले कर जाए अपनी बेटी। नहीं चाहिए हमको उनकी बेटी। छ:महीने में ही इसने अपने रंग दिखा दिए।”

आनन फानन में रक्षा के मम्मी-पापा भागकर रक्षा के ससुराल पहुंचे। एक ही शहर में होने की वजह से वो लोग कुछ देर में ही पहुंच गए। रक्षा के पापा अनिल और माँ रमा के पहुंचते ही रक्षा के सास, ससुर, जेठ सब के सब शिकायत लेकर शुरू हो गए।

सरोज जी ने कहा, “आपने अपनी बेटी को तमीज ही नहीं सिखाई, ले जाइए अपनी बेटी। हमें ऐसी बहु नहीं चाहिये जो अपने पति को मारती हो।”

“लेकिन बहन जी बात क्या हुई थी ये तो बताइए। रक्षा बिना बात के तो मारेगी नहीं, इतना तो मैं दावे से कह सकता हूँ।”

“अनिल जी हमसे क्या पूछ रहे हैं? अपनी बेटी लेकर जाइये और वहीं पूछते रहिएगा”, ससुर जी ने कहा।

“मैं बताती हूं पापा, क्योंकि अमर ने मुझे माँ-बहन की गाली दी इसलिए मैंने थप्पड़ मारा”, रक्षा ने कहा।

अपनी बेटी की बात सुनते अमर के पास जाकर अनिल जी ने कहा, “दामादजी देखूं तो चेहरा, सब तो ठीक है। समधन जी ने फोन किया तो मैं डर गया कि कहीं आपके फेस का नक्शा तो नहीं  बिगाड़ दिया मेरी बेटी ने। दरसअल क्या है कि वो ब्लैक बेल्ट है कराटे में। ये बात मैं आप लोगों को बताना भूल गया था।

समधनजी! बहुत अच्छा किया मेरी बेटी ने अमर को थप्पड़ मार के। मैं तो कहता हूं कि इसको तो दो-चार और मारने चाहिए थे आपको, क्योंकि आप तो पढ़े-लिखे गवार निकले, जिसको ये नहीं पता कि माँ-बहन को गाली नहीं, उन्हें सम्मान देते हैं।”

“आप अब लेक्चर देना बंद कीजिए। इसमे कौन सी नयी बात है मर्दों की तो आदत होती है।”

“सरोज बहन जी आप जैसी औरतें ही औरतों के नाम पर कलंक होती हैं। गाली देना, अपशब्द कहना महिलाओं को ये सब मर्दों की निशानी नहीं। समझीं आप? मैं भी मर्द हूँ। तो क्या मैं आपको गाली दूँ? मर्द बनाने की बजाय आपने अपने बेटे को संस्कार और औरतों की इज्ज़त करना सिखाया होता तो अच्छा होता।”

“कहा ना अपना उपदेश बंद कीजिए अपनी बेटी लेकर जाइये। जब आएंगे हाँथ जोड़ते माफी मांगने तब पता चलेगा। शादी शुदा बेटियां रखना आसान बात नहीं। जब समाज ताने देगा तब पता चलेगा।”

“हाँ हाँ मैं खुद भी ऐसे घर में अपनी बेटी को नहीं रहने दूंगा जहाँ इतने गिरे विचारों के लोग रहते हों और माफी कौन किससे मांगेगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा। चलो बेटा यहाँ से।”

रक्षा अपने मम्मी पापा के साथ चली गई।अगले दिन शाम को डोरबेल बजी तो रक्षा ने दरवाजा खोला। देखा तो रक्षा के ससुराल वाले दरवाजे पर खड़े थे। रक्षा देखकर आश्चर्यचकित रह गयी कि कल तक जिनको अभिमान था आज यहाँ कैसे?

तभी रक्षा के पापा ने कहा, “बेटा इन्हें अंदर लेकर चलो। मेहमानों का स्वागत दरवाजे पर नहीं  करते। आइये, आइये! अंदर आइये!”

“समधी जी हम बैठने नहीं बल्कि कहने आये हैं कि आप केस वापिस ले लीजिए, अमर को जेल में बंद करा कर क्या फायदा होगा?”

“माफ कीजिएगा समधनजी! मैं वो पिता नहीं जो बेटी को दान दे कर मजबूर हो जाये। मैंने अपनी बेटी ब्याही थी आपके यहाँ, कोई सौदा नहीं किया था जो आप उसके साथ गाली-गलौज और मारपीट करेंगे। मेरी बेटी मेरी कमजोरी नहीं, मेरी ताकत है और अपने जीते जी मैं उसके सम्मान पर आंच तो नहीं आने दूंगा।

अब तो आप देखते जाइये कि कैसे आप मेरी बेटी को हक़ भी देंगी और सम्मान भी। मैंने अपनी बेटी को सम्मान देना और लेना दोनों सिखाया है। आप लोगों की हिम्मत कैसे हुई उसके साथ ऐसा व्यवहार करने की? अभी तो सिर्फ अमर जेल में है। आगे आप सब भी वहीं होंगे।”

“नहीं नहीं समधी जी! ऐसी बात मत कीजिए। गलती हो गयी, माफ कर दीजिए। आप कहिये तो हम सब रक्षा से भी माफी मांग लेते हैं। सम्बंध तो जोड़ने के लिए बनाए जाते हैं, तोड़ने के लिए नहीं”, सरोजजी ने कहा।

“तो हमने कौन सा सम्बंध तोड़ने की बात की? बात तो आपने शुरू की ना? हमने भी सम्बंध जोड़ने के लिए ही बेटी ब्याही थी लेकिन आप तो कुछ और ही समझ बैठे”, अनिल जी ने कहा।

“आखिर आप चाहते क्या हैं? ये तो बताइए।”

“हम तो रक्षा को अपने साथ ले जाने आये थे। कल गर्मा-गर्मी में बात बढ़ गयी थी”, रक्षा के ससुरजी बोल पड़े।

“मैं अपनी बेटी सिर्फ एक शर्त पर भेजूंगा,  जब आप लोग आगे से उसके साथ कोई गाली गलौज या बदतमीजी नहीं करेंगे तब। उसको बहु होने का पूरा सम्मान और अधिकार देंगे”, अनिल जी ने कहा।

“समधी जी हमे आपकी सारी शर्त मंजूर है”, सरोज जी बोल पड़ी।

आखिर में अनिल जी ने घरेलू हिंसा का केस वापिस ले लिया और रक्षा को उसके ससुराल जाने दिया क्योंकि कोई पिता अपनी बेटी का घर नहीं तोड़ना चाहता, चाहता है तो सिर्फ इतना कि उसकी बेटी को उसकी ससुराल में भरपूर प्यार और सम्मान मिले।

दोस्तों माँ बहन की गालियां देना कोई मर्दानगी या आदत नहीं होती। ये सीधा-सीधा हम महिलाओं का अपमान होता है जिसे कभी भी बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। इस कहानी का उद्देश्य किसी की भावना आहत करना नही है  किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए माफी चाहूँगी। 

मूल चित्र : YouTube 

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