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क्या आप जानते हैं टीबी का एक बड़ा कारण कुपोषण हो सकता है?

विभिन्न संगठनों द्वारा आंकड़े यही बताते हैं कि टीबी का खतरा बढ़ने का अनुमान है, जिसमें कुपोषण एक सबसे बड़ा कारण बनकर उभर सकता है।

विभिन्न संगठनों द्वारा आंकड़े यही बताते हैं कि टीबी का खतरा बढ़ने का अनुमान है, जिसमें कुपोषण एक सबसे बड़ा कारण बनकर उभर सकता है।

कोरोना महामारी ने सभी के स्वास्थ्य को प्रभावित किया है। साथ ही लोगों के लाइफ-स्टाइल और रहन-सहन में अनेक बदलाव किए हैं, मगर इसके साथ ही कोरोना ने कई ज़िंदगियों को प्रभावित भी किया है। कोरोना के दौरान गिरती अर्थव्यवस्था की हालत ने अनेक लोगों को स्वास्थ्य संबंधित सुविधाओं से वंचित किया है।

लोगों ने एक ओर जहां कोरोना से जंग लड़ी है, वहीं दूसरी ओर पैसों की तंगी के कारण बीमारियों को न्यौता भी दिया है। कोरोना के दौरान लोगों के मास्क पहनने से संक्रमण से फैलने वाली बीमारियों को भले कम किया है, मगर कुपोषण और गलत खान-पान ने टीबी की बीमारी को बढ़ा दिया है।

डब्लूएचओ की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

हाल में आई विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार महामारी के दौरान टीबी के केस में 50-60 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी, मगर अब महामारी के दौरान हुई आर्थिक परेशानी ने कुपोषण को बढ़ा दिया है, जिस कारण टीबी के केस में बढ़ोतरी दर्ज होने का अनुमान है। यह जानकारी डब्लूएचओ के सीनियर साइंटिस्ट डॉक्टर सौम्या स्वामिनाथन ने इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल के दौरान दी है।

उन्होंने आगे कहा कि टीबी के केस में 1 मिलियन की बढ़ोतरी होने का अनुमान है, जिससे भारत वर्ष 2025 तक टीबी मुक्त होने के दावे से एक कदम पीछे हो जाएगा। कोरोना के दौरान अधिकांश स्टॉफ केवल कोविड के टेस्ट में लग गए। सबसे गंभीर बात यह है कि जीडीपी के गिरे हुए स्तर के कारण खान-पान में कमी होने से कुपोषण के बढ़ते स्तर ने टीबी के बढ़ने के संकेत दिए हैं।

सिर्फ टीबी से ही हर साल विश्व भर में करीब 10 करोड़ लोग टीबी के संक्रमण से प्रभावित होते हैं और करीब 1.4 मिलियन लोगों की मृत्यु हो जाती है।    

लक्ष्य से पीछे हुआ भारत

वहीं साल 2020 की बात करें तो लगभग 3 लाख मरीज राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम से छुट गए क्योंकि केवल 24.04 लाख लोग ही अधिसूचित किए गए जबकि डब्लूएचओ ने लक्ष्य 26.9 लाख लोगों का रखा था। पिछले साल के मुकाबले 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि अब संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीपीसी) से बदलकर राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) कर दिया गया है।

कुपोषण के कारण भी बढ़ रहा संक्रमण

लोगों में कुपोषण के कारण टीबी के संक्रमण बढ़ने का सबसे बड़ा कारण रोग-प्रतिरोधक क्षमता का घट जाना है क्योंकि शरीर बाहरी संक्रामक कणों से लड़ नहीं पाता और बीमारी बढ़ने लग जाती है। सही खान-पान नहीं लेने से लोग बीमारी के चपेट में आसानी से आ जाते हैं, जिसका एक कारण आर्थिक रुप से कमज़ोर होना भी है।

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विभिन्न संगठनों द्वारा आंकड़े यही बताते हैं कि टीबी का खतरा बढ़ने का अनुमान है, जिसमें कुपोषण एक सबसे बड़ा कारण बनकर उभर सकता है। कम जागरुकता और लोगों के मन में बसी भ्रामक जानकारी के कारण भी लोग कुपोषण पर ध्यान नहीं देते। जैसे- नवजात में कुपोषण के कारण टीबी का खतरा बढ़ जाता है, जिसे केवल जागरुकता के साथ ही खत्म किया जा सकता है।

बिहार में टीबी का खतरा

हालांकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार बीते पांच सालों में बिहार की स्थिति में सुधार होने की खबर आई है। वहीं टीबी की बीमारी पर लगाम लगाने व उन्मूलन को लेकर बिहार अपने पड़ोसी राज्यों की तुलना में फिसड्डी साबित हो गया है क्योंकि टीबी की बीमारी पर बिहार के मेडिकल कॉलेजों में शोध कार्य नहीं होते। असलियत यह है कि बिहार के 14 मेडिकल कॉलेजों में टीबी पर शोध कार्य नहीं हो सके। केवल साल 2018 में दो रिसर्च हुए।

नेशनल ट्यूबरकोलोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम (एनटीईपी) बिहार के अध्यक्ष डॉ. डीपी सिंह ने कहा कि बिहार के किसी भी मेडिकल कॉलेजों के टीबी एंड चेस्ट विभाग में पीजी की पढ़ाई नहीं चल रही है, जबकि रिसर्च वर्क में पीजी के छात्रों की अहम भूमिका होती है। ऐसे में कम-से-कम पीएमसीएच व जेएलएनएमसीएच में पीजी टीबी एंड चेस्ट की पढ़ाई तत्काल शुरू करानी होगी।

बिहार भी 2025 के मापदंड से कोसों दूर

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि अभी बिहार में एक लाख की आबादी पर 200 टीबी के मरीज हैं। डॉ. डीपी सिंह बताते हैं कि जब तक एक लाख की आबादी पर 43 टीबी मरीज या इससे नीचे तक आंकड़ा नहीं आएगा, तब तक बिहार से 2025 तक टीबी उन्मूलन असंभव है। लोगों में बढ़ती गरीबी और कुपोषण के कारण टीबी की बीमारी को नियंत्रण करने में परेशानी हो रही है।

अस्पतालों में लोगों को समुचित स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पाती क्योंकि लोग कुपोषण को लेकर जागरुक नहीं हैं। एक व्यस्क आदमी को कितने पोषक तत्वों की जरुरत होती है, इस बारे में उन्हीं जानकारी नहीं होती है। हकीकत यह है कि बिहार में अधिकांश लोग कुपोषण को एक गंभीर समस्या नहीं मानते हैं। हाल में एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट ने भी खुलासा किया है कि बिहार में लोग सेहत को लेकर जागरुक नहीं है।

बिहार में कुपोषण के खिलाफ अभियान

केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय पोषण मिशन (पोषण अभियान) की प्रशासनिक स्वीकृति साल 2017 में मिल गई थी, जिसके बाद बिहार में मिशन के सफल संचालन के लिए परियोजना स्तर पर बिहार पोषण मिशन कोषांग का गठन किया गया है। निदेशालय मुख्यालय में नियोजन संबंधी जानकारी देने के लिए हेल्पडेस्क भी बनाया गया है। इसके फोन नंबर 0612-2547960 पर भी फोन कर जानकारी हासिल की जा सकती है।

ये प्रमुख कार्य होंगे-

– कुपोषण के विरुद्ध जागरूकता का प्रसार करना।

– छह वर्ष तक के बच्चों में कुपोषण की दर को कम करके साल 2022 तक 25 फीसदी पर लाना।

– प्रत्येक माह पोषण कैलेंडर के मुताबिक पोषण गतिविधियों का संचालन करना।

– बच्चों, किशोरियों एवं महिलाओं में एनीमिया की रोकथाम के लिए शिविर का आयोजन।

– पोषण के लिए अनुपूरक आहार वितरण एवं टीकाकरण कार्यक्रमों का संचालन करना।

– सूक्ष्म पोषक तत्वों की जानकारी प्रदान करना।

यह लेख SATB फैलोशिप के तहत लिखी और प्रकाशित की जा रही है।

मूल चित्र : hadynyah from Getty Images Signature via CanvaPro  

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