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आपने हमें बताया कि दुखी होने के बावजूद औरतें शादी के रिश्ते को निभाती हैं क्यूँकि…

Posted: फ़रवरी 19, 2021

बच्चों की वजह से मैं अपने सपनों ओर इच्छाओं की कुर्बानी दे सकती हूँ लेकिन बच्चों को किसी चीज की कमी बर्दाश्त नहीं कर सकती।

शादी को धारणिक रूप से दो लोगों के बीच का एक दूसरे के साथ एक सुखद जीवन बिताने का फ़ैसला माना जाता है। पर काफ़ी मामलों में दुर्भाग्यवश कुछ कारणों की वजह से यह साथ इतना सुखदायक नहीं रहता है। हालाँकि आजकल आपसी सहमति से काफ़ी जोड़े एक साथ ना रहने का फ़ैसला लेके अलग हो जाते हैं, पर ज़्यादातर रिश्तों में, ख़ासकर औरतें, ख़ुश न होने के बावजूद भी उस रिश्ते को ख़त्म करने में हिचकिचाती हैं।

हम बचपन से ही सुनते आते हैं कि शादी सात जन्मों का रिश्ता होता है। हम जिससे शादी करते हैं उसे हमारा जीवन साथी बुलाया जाता है। शादी के रिश्ते को अपने जीवन भर चलाने का विचार हमारे दिमाग़ में बैठ जाता है। यही विचार कभी एक ज़िम्मेदारी और कभी कभी एक बोझ बनकर औरत के मन में नाखुश रिश्ते को भी निभाने का नैतिक दबाव बनाता जाता है।

अपने पाठकों से सवाल करते हुए हमने उनसे पूछा कि ऐसे कौन से कारण हैं जिसकी वजह से आज भी औरतें अपनी शादी में दुखी होने के बावजूद उस रिश्ते को निभाना चाहती हैं।

इस प्रश्न को पूछते ही कॉमेंट्स में काफ़ी औरतों ने अपने विचार या अपने मन की बात लिख हमें कई कारण बताए। उनमें से कुछ कॉमेंट्स को चुन कर ये पोस्ट बना कर, उनके कुछ जवाब आप तक पहुंचा रहे हैं, साथ ही उनके मन की दबी बातों को आवाज़ देने की एक कोशिश कर रहे हैं।

गरिमा राय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा

“क्योंकि ज्यादातर महिलाएं आत्मनिर्भर नहीं होती हैं इसलिए वो इस समाज और अपने पति के जुर्म सहती हैं अगर औरतों को सम्मान के साथ जीना है तो उनको आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना ही होगा।”

सविता कुमारी कहती हैं

“अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने वाली महिलाओं को ये समाज कहाँ पचा पाता है इसलिए वह सब झेलती रहती हैं।”

मोनिका राजपूत का मानना है

“सभी आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होतीं और बच्चे के पालन पोषण की जिम्मेदारी भी माँ पर ही डाल दी जाती है, न उसके पास घर होता है और न कमाई का साधन। बच्चों की वजह से औरत अपने सपनों ओर इच्छाओं की कुर्बानी दे सकती है लेकिन बच्चों को किसी चीज की कमी बर्दाश्त नहीं कर सकती।”

संगीता यादव अपनी भावनायें व्यक्त करते हुए कहती हैं

“हम इमोशनली कमजोर हो जाते हैं कि अगर रिश्ते को तोड़कर बाहर निकले तो कैसे रहेंगे, एक डर ये भी होता है कि आर्थिक रूप से कमजोर हैं, दूसरा शारीरिक सुरक्षा। और इन सब को मन में पैदा करने वाले हमारे अपने ही माता पिता होते हैं। इसी डर से नहीं निकल पातीं।”

गुंजन अग्रवाल के शब्द हैं

“क्योंकि वह परंपराओं के बोझ तले दबी होती हैं, और घुट-घुट के जीने को ही अपना धर्म मानती हैं।”

मीना सिंह समाज को ताना कसते हुए कहती हैं

“ताकि वो हमारे इस रूढ़िवादी समाज के तंज और अपमान से खुद के परिवार को और खुद को बचा सकें। हाँ यही सच है क्योंकि मान-सम्मान सब की रक्षा का दायित्व औरत के हिस्से ही तो आता है। पुरुष तो कोठों पर भी जाएँ तो कोई कुछ नहीं कहता और यदि औरत कमाने भी चली जाए तो बात परिवार की इज्जत पर जाती है। शायद यही वजह होती है कि वो दुखी होते हुए भी रिश्ता निभाती है।”

प्रियंका सिंह के इन शब्दों से आप भी सहमत होंगे

“रिश्ते टूटने पर हमेशा लड़की को ही गलत ठहराया जाता है, चाहे उसके साथ कितना भी गलत क्यों न हो रहा है। इसके अलावा वित्तीय निर्भरता तो एक प्राथमिक कारण होता ही है। लड़ाई यहीं ख़त्म नहीं होती, अकेली तलाकशुदा महिला को समाज भी कोई बहुत अच्छी नजर से नहीं देखता, इसलिए बहुत मुश्किल होता है। जिंदगी की खुशियों के लिए कीमत अदा करनी पड़ती है।”

रिमझिम अग्रवाल इन शब्दों में अपने विचार बयान करती हैं

“कभी समाज, कभी परिवार, कभी बच्चे तो कभी प्यार जो उसने किया था अपने जीवनसाथी से, वो प्यार भी कई बार रोक देता है उसे।”

रुचि मित्तल के शब्दों में हम समाज की सच्चाई और साथ ही मुख्य कारणों की समीक्षा कर सकते हैं

“इस सब का ज़िम्मेदार होता है लड़की का अपना घर, समाज और वे सब लोग जो उसके इर्द गिर्द होते हैं। हमारे समाज का वो घिसा-पिटा ढाँचा, जो सदियों से चला आ रहा है, ज़र्जर हो चुका है। ये अंदर से खोखला, लेकिन उसे ही घसीटना है।

विदाई के समय आज भी यहीं सीख दी जाती है, जा लाड़ो इस घर से तेरी डोली उठ रही है, जिस घर जा रही है, वहाँ से अर्थी ही उठे। अगर तू ससुराल से रिश्ते तोड़कर आ गई तो छोटे भाई बहनों की शादी कैसे होगी, समाज उँगली कर करके जीने नहीं देगा। अगर सोचा जाए तो लड़की के माँ बाप का ये डर गलत भी नहीं है। वही समाज की रूढीवादी सोच।

हाँलाकि आज लड़कियों ने बहुत तरक्की कर ली है, लेकिन आज भी बहुत बड़ी संख्या में लड़कियाँ अपने पैरों पर नहीं खड़ीं या इतना नहीं कमातीं कि खुद से अपना और अपने बच्चों का भरण-पोषण कर सकें। और इन सबसे बढ़कर लड़की का कोमल मन, अपने माँ-बाप, भाई-बहन की चिंता और बच्चों का भविष्य। चाक के दो पाटों के बीच पिस कर रह जाता है उसका जीवन। बोल-बोल कर पहले ही उसे त्याग,  ममता की मूरत बना दिया गया, तो वो प्यार, त्याग, ममता और अपनों की फ़िक्र उसकी अपनी खुशी और स्वाभिमान पर हावी हो जाती है।”

कारण ढूंढने पर तो हर औरत के अलग-अलग कारण मिलेंगे पर मूल रूप से समाज के डर, बच्चों के मोह या रिश्ते निभाने की ज़िम्मेदारी के अकेले भार की वजह से औरतें नाखुश रिश्ते में बंधे रहना स्वीकार करके जीवन व्यतीत करने का सोच लेती हैं।

कई और ऐसे कारणों और विचारों को जानने के लिए या और कॉमेंट्स पढ़ने के लिए विमेंस वेब हिंदी के फेसबुक पेज पर इस पोस्ट को देखें।

मूल चित्र : FatCamera from Getty Images Signature via Canva Pro

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