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ये आधी-आबादी आज भी ढूंढ रही है समानता वाला स्वतंत्र गणतंत्र…

Posted: जनवरी 25, 2021

हम स्वतंत्र गणतंत्र की बात कैसे करें जब आज भी आधी आबादी का एक बड़ा हिस्सा कई तरह की असमानताओं का सामना करने के लिए विवश है।

कल आने वाले 72वें गणतंत्र दिवस पर देश के आन-बान और शान का प्रतीक रही गणतंत्र दिवस परेड पर, देश की  पहली महिला फाइटर भावना कंठ लडाकू विमान राफेल के साथ उड़ान भरेगी। गणतंत्र दिवस परेड में पहली बार महिला पायटल को शामिल किया गया है। यह देश की हर लड़की के लिए प्रेरणा और गर्व की बात है। पर इसके साथ-साथ 24 जनवरी को जब देश राष्ट्रीय बालिका दिवस  मना रहा था, उसी शाम बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 12 साल की बच्ची का ब्रेस्ट को छूना सेक्सुअल असाल्ट की श्रेणी में मानने से इंकार किया है।

इसे देखकर यही लगता है कि भारतीय संविधान में कानून के समक्ष आधी-आबादी को कई मौलिक अधिकार मिले ज़रूर हैं जिसका वह अपने विकास में इस्तेमाल भी कर रही है, पर इन कानूनों से हम देश के उन मान्यताओं को धवस्त नहीं कर सके हैं जो आधी-आबादी के महिलाओं का ही नहीं, मासूम बच्चियों का भी शोषण करते हैं।

कहाँ है पूर्ण समानता वाला स्वतंत्र गणतंत्र?

आधी-आबादी के लिए समानता और स्वतंत्रता के बदलाव की पहल आजाद भारत के संविधान ने की। अब तक देश व समुदाय की महिलाओं ने इस पहल से अपना गौरवपूर्ण इतिहास रचा है जो आनेवाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक इबारत है। सच्चाई यह भी है कि अभूतपूर्व सफलता हासिल करने के बाद भी आज हम पूर्ण समानता वाले स्वतंत्र गणतंत्र का दावा नहीं कर सकते हैं।

हम चांद पर भी उतर चुके हैं पर आज भी आधी आबादी का एक बड़ा हिस्सा लैंगिक पूर्वाग्रहों के कारण कई तरह के असमानताओं का सामना करने के लिए विवश है। अपने जीवन में बेहतरी और बराबरी के तलाश में हमारे देश की एक बड़ी आधी आबादी आज भी है। हमारा दायित्व है कि हम उन सामाजिक मान्यताओं और मानसिकताओं को दमन करे जो हमारे सामाजिक जीवन में मौजूद है जो देश के किसी भी नागरिक का चाहे वह स्त्री हो या पुरुष हो या इंतरलिंग उसका शोषण करते है।

अब “चलता है” नहीं चलेगा

समाज में  स्वतंत्रता और समानता के रास्ते बनाने के लिए हमें कुछ खास सामाजिक व्यवहारों को स्वीकार करना होगा जो हमारे सामजिक जीवन में हम-सब के आस-पास घटते रहते हैं। यह घर-परिवार-समाज-राज्य और देश के प्रति हर एक नागरिकों का संविधान के प्रति दायित्वबोध है जिसके साथ “चलता है” जैसी मानसिकता के साथ पूरा नहीं किया जा सकता है। मसलन, लिंग आधारित चुटकुलों और अश्लील शब्दों के इस्तेमाल से बचे, किसी के गलत व्यवहार पर आवाज़ उठाये, समानता आधारित चर्चा में शामिल हो, स्त्रीवादी रोल मॉडल को समझे, उनके सशक्तिकरण की कहानियों को सांझा करे और तमाम रूढ़िवादिता को चुनौति दे।

साथ ही साथ घर-परिवार और समाज के परिवेश में बच्चों के साथ असमानता का बीज बच्चों के बालमन में नहीं पड़ने दे। भले ही हमने लैंगिक समानता और संवेदनशीलता का पाठ काफी देर से  पढ़ा है, आने वाली पीढ़ी के साथ खाने के थाली से स्कूल के बस्ते तक समानता के पाठ तैयार करना चाहिए। घर-परिवार के सदस्य  मिल-जुलकर समानता का बोध विकसित करें। यौन प्रताड़ना के खिलाफ बोलें, फिर चाहे वह घर के दायरे में हो या कार्यस्थल पर दिखे, दोनों ही जगह समानता के संस्कृत्ति का विकास करे और दोहरी मानसिकता को नकारन शुरू करें।

समानता महिला मात्र का मुद्दा है ही नहीं

समानता वाले गणतंत्र की चाह में सबसे जरूरी पहल यह है कि हम यह समझ विकसित करें कि समानता महिला मात्र का मुद्दा है ही नहीं। यह आर्थिक और सामाजिक विकास की पहली ज़रूरत है। देश को जिस विकास की आज जरूरत है वह समानता के सिद्धांत पर भरोसा करके ही आ सकती है।

इसका शंखनाद सबसे पहले अपने घर-परिवार से ही करना होगा उन सभी मिथकों, पूर्वधारणाओं और भ्रमों को दूर करने के लिए जो इस राह में अटके हैं। इनपर हमारी चुप्पी व सहनशीलता ही असमानता को बढ़ाने में हमारी सहायक है। मसलन, औरत ही औरत की दुश्मन है पुरुषवादी समाज की यह आरोपित परिभाषा, कभी भी एक औरत का दूसरे औरत के प्रति सम्मान का भाव पैदा ही नहीं होने देती है। सवाल यह है कि क्या पुरुषों का आपस में मनमुटाव नहीं होता? फिर उनको लेकर इस तरह के परिभाषा क्यों नहीं गढ़ी गई?

दूसरा भी उतना ही सम्मान अपने लिए चाहता है जितना आप स्वयं के लिए चाहते है। जिस दिन इस बात को समझ जाएगें तमाम असमानता के दमन की शुरुआत हो जाएगी। हम-आप समाज-राज्य-देश और राष्ट्र तमाम असमनाता को बढ़ावा न दें।  स्त्री हो या पुरुष हो या दोनों के लिए याद रखने वाली बात यह है कि देश को खूबसूरत बनाने के लिए जिस लय-ताल की दरकार है, वह हमेशा ही बराबरी के रास्ते से आती है।

मूल चित्र : Duncan1890 from Getty Images via Canva Pro 

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