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मैं कभी कश्मीर नहीं गई : प्रज्ञा सिन्हा की बेहद खूबसूरत कविताओं की एक एन्थोलॉजी

प्रज्ञा सिन्हा की बेहद खूबसूरत 25 कविताओं की एन्थोलॉजी 'मैं कभी कश्मीर नहीं गई' के बारे में आज हम उन से इस इंटरव्यू में बात कर रहे हैं!

प्रज्ञा सिन्हा की बेहद खूबसूरत 25 कविताओं की एन्थोलॉजी ‘मैं कभी कश्मीर नहीं गई’ के बारे में आज हम उन से इस इंटरव्यू में बात कर रहे हैं!

अलग अलग विषयों की इस एन्थोलॉजी में कुछ कविताएँ पॉलिटिक्स से हैं, कुछ नेचर से इंस्पायर्ड हैं और ज्यादातर महिलाओं से सबंधित हैं। इसकी लेखिका के लिए हर एक कविता खास है क्योंकि सभी के साथ एक अलग इमोशन है जो अपने साथ अलग कहानी कहती है। तो आइये मिलते हैं इन कविताओं और उनकी रचयिता से। 

प्रज्ञा सिन्हा की एन्थोलॉजी ‘मैं कभी कश्मीर नहीं गई’ के बारे में आज बात कर रहे हैं। इस किताब में आपको बेहद खूबसूरत 25 कविताएं पढ़ने को मिलेंगी। ये प्रज्ञा सिन्हा की पहली किताब है जिसके बारे में और जानने के लिए हमने उनसे एक इंटरव्यू किया। 

प्रज्ञा सिन्हा इंस्ट्रक्शनल डिज़ाइन एंड प्रोग्राम मेनेजमेंट में स्पेशलाइज़्ड हैं और पिछले 19-20 सालों से इ-लर्निंग डोमेन में काम कर रही हैं। जमशेदपुर में पली-बढ़ी और दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिराण्डा हाउस से इन्होने कॉलेज किया है। इनके हस्बैंड नॉवेलिस्ट हैं और इन्हें एक प्यारी बेटी है। प्रज्ञा सिन्हा को सबसे ज्यादा ख़ुशी अपनी गर्ल फ्रेंड्स के साथ मिलती हैं।  

प्रज्ञा सिन्हा का मानना है कि लिखने के लिए पढ़ना बहुत ज़रुरी है

प्रज्ञा सिन्हा के आसपास हमेशा से ही पढ़ने का माहौल रहा है। मम्मी पापा भी काफी पढ़ा करते थे। और फिर कॉलेज में वे अपने पति सिद्धार्थ से मिलीं और उन्हें पढ़ना और लिखना बहुत पंसद है। इनकी फ्रेंड्स को भी पढ़ना अच्छा लगता है। प्रज्ञा सिन्हा का मानना है कि लिखने के लिए पढ़ना बहुत जरुरी है, तो पढ़ते-पढ़ते ही हमेशा से इनका लिखने के तरफ रुझान बढ़ा है। ये बचपन से लिखा करती हैं।  

ये कहती हैं, “पहले मैं खुद की ख़ुशी के लिए लिखा करती थी। फिर मैं कॉलेज में गर्ल्स हॉस्टल में रही तो मैंने बहुत अलग-अलग गर्ल्स के एक्सपीरियंस देखे हैं। फिर अपने आसपास की महिलाओं के मुद्दे भी समझ आने लगे तो वही एक्सपेरिएंसेस उनके लिए लिखा करती थी और ज़्यादतर अपनी गर्ल फ्रेंड्स के साथ शेयर किया करती थी जो मुझे बेहद सुकून और ख़ुशी देता। बस यहीं से मेरी लिखने की जर्नी चल रही है।” लेकिन प्रज्ञा ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन इनकी किताब पब्लिश होगी। 

आइये चलते हैं प्रज्ञा सिन्हा की एन्थोलॉजी ‘मैं कभी कश्मीर नहीं गई’ के सफर पर

प्रज्ञा सिन्हा की अपनी एन्थोलॉजी ‘मैं कभी कश्मीर नहीं गई’ के साथ अनुभव  

प्रज्ञा सिन्हा ने ‘मैं कभी कश्मीर नहीं गई’ एन्थोलॉजी में पिछले 4-5 सालों में ही लिखी कविताओं में से कुछ चुनी हैं और ये ज्यादातर हाल ही में लिखी कविताएं हैं। इसके एक्सपीरियंस के बारे में बात करते हुए कहती हैं, “मैंने तो कभी सोचा नहीं था कि मैं अपनी कविताओं को इस तरह से सबके साथ शेयर करुँगी।

दरअसल मेरे पति सिद्धार्थ ने मुझे इसके बारे में कहना शुरू किया। लेकिन कहते है ना कि घर की मुर्गी दाल बराबर। मैंने सिद्दार्थ की कभी नहीं मानी। लेकिन फिर मेरी बड़ी बहन ने इसके बारे में मुझे कहा, फिर मैंने इसके बारे में सोचा।”

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लेकिन प्रज्ञा को लगता है कि अपने लिए लिखना, अपने करीबियों के साथ उसे शेयर करना और उसे पूरी दुनिया के साथ शेयर करने में बहुत फ़र्क है। एक बार उसे शेयर कर दिया तो फिर हमारे शब्दों को कोई कैसे लेता है, उन्हें किस तरह इस्तेमाल करते हैं, इन सब पर हमारा कोई कंट्रोल नहीं रहता। इसके लिए बहुत कॉन्फिडेंस भी चाहिए।

तो इस चीज़ को एक्सेप्ट करने में प्रज्ञा सिन्हा को वक़्त लगा। आगे वे कहती हैं, “एक तरह से इस एन्थोलॉजी के लिए मैंने पहले खुद को मानसिक रूप से तैयार किया। सबसे अच्छी बात है कि रिव्युज़ के बारे में मैंने कभी नहीं सोचा है क्योंकि सबका अलग पर्सपेक्टिव होता है।” 

ये एन्थोलॉजी कलेक्टिव एक्सपीरियंस है जिन्हें हम सबने महसूस किया है

“मेरी एन्थोलॉजी में कुछ कविताओं के विषय पॉलिटिक्स से हैं, कुछ नेचर से इंस्पायर्ड हैं और महिलाओं से सबंधित बहुत कुछ है। मेरे आसपास हो रहे विषय मुझे किस तरह प्रभावित करते हैं और उन्हें मैं किस तरह समझती हूँ। जब इन्हें एक्सप्रेस करती हूँ तो ये सब मेरे कविताओं के हिस्से बन जाते हैं। इसमें कुछ एक्सपीरियंस मेरे हैं, कुछ मेरे आस पास की महिलाओं के है। तो ये एन्थोलॉजी कलेक्टिव एक्सपीरियंस है जिन्हें हम सबने महसूस किया है।” 

प्रज्ञा की लेखन शैली के बारे में बात करते हुए कहती हैं

“मैं फिक्शन लिखती हूँ। कविताएं हिंदी में लिखती हूँ और फ़िक्शन स्टोरीज़ ज़्यादातर इंग्लिश में लिखती हूँ। अभी मैं लिख तो रही हूँ लेकिन सोचा नहीं है कि उनका आगे क्या करना है। तो फ़िलहाल किसी किताब पर काम नहीं कर रही हूँ।” 

प्रज्ञा सिन्हा की एन्थोलॉजी ‘मैं कभी कश्मीर नहीं गई’ से उनकी पसंदीदा कविता

प्रज्ञा के लिए ये प्रश्न सबसे मुश्किल रहा। वे अपनी हर कविता से जुड़ाव महसूस करती हैं। वे कहती हैं, “ये चुनना मेरे लिए बहुत मुश्किल है। सभी कविताएं मेरे लिए खास हैं क्योंकि हर एक कविता के साथ एक अलग इमोशन है, अलग कहानी है। हाँ, लेकिन हो सकता है थोड़े टाइम बाद मैं ये बता सकती हूँ कि कौन सी मुझे अब पसंद नहीं है।” साथ ही वे कहती हैं कि “ये आप लोग बेहतर बता सकते हैं कि आपकी इस एन्थोलॉजी की फेवरेट कविता कौन सी है।” तो आप बताएंगे ना?

प्रज्ञा सिन्हा रीडर्स को क्या मैसेज देना चाहती हैं

“मेरी कविताएं बहुत कुछ कहती हैं और मैं किसी को मैसेज कैसे दे सकती हूँ। हर महिला की अलग जिंदगी होती है। मुझे लगता है जैसे ही हम दुसरों को मैसेज देने लगते हैं वहीं हम जजमेंटल हो जाते हैं। हर महिला को अपने लिए फैसले लेने का पूरा हक़ है। 

बस मेरा ये अनुभव है कि हर महिला को अगर हो सके तो इंडिपेंडेंट होना चाहिए और इसमें फिज़िकली, इमोशनली और अगर पॉसिबल हो सके तो फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस शामिल है। मेरे पापा हमेशा कहते हैं कि बस इतना विश्वास रखो कि अगर कभी ऐसा पल आये कि तुम्हारे आसपास कोई ना हो, तब भी तुम अपनी ज़िंदगी अपने बल-बूते पर जी सको। तो आप अपनी ख़ुशी का भी ख्याल रखे। अपने आस पास से सीखे गए बंधनो से खुद को मुक्त करें।” 

तो आप ये किताब कब पढ़ रहे हैं? ये किंडल पर अवेलेबल है। आप अपनी कॉपी यहां से आर्डर कर सकते हैं। 

प्रज्ञा सिन्हा एक सशक्त विचारों वाली खुशमिज़ाज़ महिला हैं जो हर छोटी-बड़ी चीज़ में ख़ुशी ढूंढती हैं। पहली किताब के लिए आपको ढ़ेरों शुभकामनाएं और  हम सभी को आपकी अगली किताब का इंतज़ार है। 

मूल चित्र : Pragya Sinha

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About the Author

Shagun Mangal

A strong feminist who believes in the art of weaving words. When she finds the time, she argues with patriarchal people. Her day completes with her me-time journaling and is incomplete without writing 1000 read more...

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