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उन दिनों माँ को कैसा लगता होगा मैं अब समझती हूँ…

Posted: जनवरी 19, 2021

आज थोड़ा ठहरकर सोचने में लगता है कि क्या इतना मुश्किल था माँ को माँ से बाहर निकालकर सिर्फ एक औरत की तरह मानना?

माँ एक ऐसा शब्द है जिसपर आप हम सब भावुक हो जातें है। होना भी चाहिए। माँ सिर्फ एक शब्द ही नहीं, बहुत सारे भाव हैं, जो मुझको, आपको, हम सभी को एक ऐसे सूत्र में बांधते हैं कि हमें लगता है कि उसने सिर्फ हमें अपने गर्भ में ही नहीं रखा, बल्कि हमें दुनिया की जद्दो-जहद से भी दूर रखा।

हमें क्या चाहिए, क्या नहीं, इस सबका माँ ध्यान रखती है। यही  कारण होगा  कि हम कभी सब का भार सहती धरती से, तो कभी मूक सहनशील  गाय से, तो कभी विशाल बहती गंगा से माँ का अक्स बनाने की कोशिश करते हैं। माँ का विस्तार शब्दों का जाल है, भावनाओ की एक लहर है। जहाँ माँ सिर्फ माँ है, बाकी उसके वजूद का कोई हिस्सा हमारे और आपके लिए शायद ही माएने रखता हो।

और जब ये माँ बचपन में हमारे साथ घूमने जाती थी, तो मैंने कभी इसको माँ का चोला उतारते नहीं देखा। वो हमेशा माँ ही बनी रही। यूँ तो हमारा घर ऋषिकेश में होने के कारण मेरा ननिहाल देहरादून हमेशा पास ही रहा। लेकिन पढ़ाई-लिखाई के चलते सिर्फ साल में एक दो बार ही हमारा वहां जाना होता था। इसी तरह दादा-दादी का घर भी रुड़की होने के कारण कभी उतना दूर नहीं रहा, पर वहां भी देहरादून जैसे ही एक दो बार जाना ही हो पाता था।

यात्राओं के नाम पर ये दो घर ही मेरी माँ की कुल जमापूंजी थी। यहाँ जब वो जाती, तो हमें भी बड़ी ख़ुशी होती कि हम अपने घर से थोड़ा दूर घूमने-फिरने आये हैं। लेकिन दोनों ही जगह पर माँ को कितना यात्रा का सुख मिलता होगा, ये मै आज ही समझ पाती हूँ। परिवार की बुनावट इतनी सख्त होती है कि माँ को उसके अन्दर से अपने लिए कोई भी सुख के रिसाव का अंश  शायद ही कभी मिला हो।

यहाँ बात  सिर्फ अपने नानी घर की करुँगी, जहाँ माँ को एक तसल्ली रहती होगी कि वो अपने घर पर हैं। अपने माँ, पिता, भाई बहनों के पास। देहरादून जाते ही हम बच्चों का तो हल्ला-गुल्ला शुरू हो जाता था और हम भूल जाते थे कि माँ भी हमारे साथ आई है। मगर माँ कभी नहीं भूल पाती थी कि वो कभी इसी घर में बिना हमारे भी रही होगी। उसे हमेशा एक ही बात खाती रहती कि हम ठीक रहें वरना वापस जाने पर यही सुनने को मिलेगा कि अपने पिता के यहाँ बच्चों को बीमार करा आई, ध्यान नहीं रखा होगा। तो इसीलिए अगली बार से उनका ओर माँ का अपने घर जाना बंद।

माँ कोई भी हिदायत भूल नहीं सकती थी क्योंकि ऐसा करने पर साल में एक-दो बार जो वो निकल भी पा रही थी वो भी बंद हो सकता  था। अपनी यात्रा के चरण में माँ को शाम में पास के चाट-पकोड़ी वाले स्टाल से अपना बचपन जीने की छूट जैसी थी। दोपहर में कुल्फी वाले से कुल्फी लेने की भी। मगर उससे ज्यादा मैं सोच कर भी याद नहीं कर पा रही हूँ, क्योंकि उन्हें जो खर्च के नाम पर पैसा दिया गया था वो ज्यादा कुछ दिला भी नहीं सकता था। और तो और हमारे स्कूल के कपड़े, बैग, किताबें इन सब के लिए गिना हुआ पैसा होता था, जिन्हें लेकर माँ अपने भाइयों के साथ लेने बाजार जाती थी।

उन दिनों बाजार जाना अपने आप में एक समारोह जैसा प्रतीत होता था क्योंकि ऋषिकेश में तो माँ कभी कभार ही बाजार जाती थी। वैसे तो इस समारोह में भी चाट, आइसक्रीम से बढ़कर किसी चीज का लुत्फ़ नहीं उठाया जा सकता था, लेकिन वो भी बहुत था।

इस यात्रा में किसी भी परम्परागत कर्तव्यों में कोई बदलाव नहीं किया जाता। सुबह सभी औरतें नाश्ता बनातीं, घर के काम करतीं, बच्चों को अगर स्कूल कॉलेज भेजना होता तो भेजतीं ओर अपने अपने पति को ऑफ़िस। माँ भी उन्हीं का हिस्सा थी। तो वो भी सारे कामों में हाथ बटाँती। उसके बाद दिन के खाने का सिलसिला शुरू होता। लेकिन बीच के समय में मैंने माँ को बहुत बार खिलखिला कर हँसते हुए देखा है।

सरिता, मनोहर कहानियां  जैसी किताबें पढ़ते हुए, बुनाई करते हुए,आटे के जवें तोड़ते हुए.चाए पीते हुए। और तब कुछ एहसास हुआ हो या न हुआ हो, आज होता है कि ये वो समय होता होगा जब मेरी माँ, किसी की भी माँ होने से बाहर आती होगी और फिर एक लड़की या औरत बन कर सोचती होगी या महसूस कर सकती होगी।

सालो से एक ही बात सुनाई, दिखाई जाती है कि घर वो सबसे ज्यादा अच्छा होता है जहाँ माँ, बहनें  अपने पति, पिता, बच्चों  को खाना खिला बाद में खाती हैं। यही तो होता रहा है हमारे यहाँ, आप किसी के यहाँ भी। किसी के यहाँ भी चले जाओ, औरतें चाय-पानी से लेकर भोजन तक अकेले इंतजाम करती हैं। पुरुष बाहर का काम कर सकता है लेकिन घर का,अरे तौबा तौबा!

तो क्या हुआ कि मेरी माँ की भी  तो छुट्टियाँ चल रही हों, वो अपने घर से दूर यात्रा पर आई हों, रहेंगी तो वो माँ ही, भाभी, बेटी, बहिन ही, क्योंकि ये सभी माँ हैं और बनेंगीं। इनके लिए कुछ भी इससे दूर का सोचना गलत है। कोई भी काम,आराम, सुख माँ की परिधि में ही रहे, इससे ज्यादा उसे चाहिए भी क्या? वो कितना भी उड़ना चाहेगी उसके पंख हमेशा सख्त सामाजिक रिवायतों में बंधे रहेंगे।

आज थोड़ा ठहरकर सोचने में लगता है कि क्या इतना मुश्किल था माँ को माँ से बाहर निकालकर सिर्फ एक औरत की तरह मानना? उसकी यात्रा कभी भी उसकी अपनी वो उडान नहीं रही, जिसमें वो अपना हर वो कर्त्तव्य, अपनी हर वो जिम्मेदारी छोड़ सके, जो समाज ने उसके ऊपर लादी है।

आज तक वो माँ, दूसरों से अलग कर खुद को सोच ही नहीं पाती है, वो जिसका अपना भी कुछ मन होता होगा। जो गाय की तरह मूक न होकर हमें कुछ नहीं देना चाह सकती हो, जो धरती की तरह हमारे बोझ को अपना बोझ न मानने के लिए तैयार हो? जो न चाहती हो विशाल गंगा की तरह खुद को सहनशील बनाना। तो क्या वो मेरी आपकी माँ कहलाएगी? शायद ही…

मूल चित्र : FatCamera from Getty Images Signature via Canva Pro

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