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आज रुपा तो कल कोई और होगी, लेकिन कब तक…

Posted: जनवरी 13, 2021

जहां एक तरफ एक बेटी के पैदा होने पर सब खुशियां मना रहे थे, वहीं दूसरी तरफ एक बाप ने रेप की वजह से प्रेग्नेंट हुयी बेटी और उसके होने वाले बच्चे को खो दिया।

भारत के लिए  सोमवार का दिन खुशी और गम दोनो का था। जहाँ एक तरफ किसी मशहूर स्टार के घर बेटी पैदा हुई, वहीं एक बाप ने अपनी पंद्रह वर्ष की बेटी और उसके होने वाले बच्चे को खो दिया। उत्तरप्रदेश बेरली की रहने वाली रुपा( काल्पनिक नाम) का बलात्कार सात माह पहले हुआ था।

मशहूर खिलाड़ी के घर बेटी पैदा होने पर सोशल मीडिया पर बधाईयों का अंबार ऊमड़ पड़ा, पर *रुपा की मौत शायद ही किसी को याद रहेगी। हमारे देश में अभिनेता, अभिनेत्री के जिंदगी में क्या चल रहा है, इसमें हमें बहुत दिलचस्पी होती है। किसी अभिनेत्री की शादी, बच्चा, तलाक होने पर सोशल मीडिया पर जितनी बंधाईया और गालिंया आती हैं, उसका अंदाजा लगना मुश्किल है पर उतना ही ध्यान अगर हम महिलाओं के मुद्दे पर देते तो कितनी महिलाओं की ज़िंदगी बेहतर हो सकती थी।

जब एक गरीब के घर बेटी पैदा होती है तो वो अपशगुनी, अभागन, जैसे शब्दों से नवाजी जाती है। पालन-पोषण के खर्च से बचने के लिए कितनी ही लड़कियों को कोख में मार दिया जाता है। सोशल मीडिया पर जितनी तवज्जो एक अभिनेत्री को दी जाती है, उसका दो प्रतिशत भी अगर औरतों के मुद्दों पर दिया जाए तो समाज बेहतर हो सकता है। ऐसा नहीं है कि किसी भी मुद्दे को उठाया नहीं  जाता है पर एक-जुटता की कमी के कारण ये मुद्दे दब कर रह जाते हैं। रुपा का मुद्दा भी ऐसा ही है।

बरेली के फतेहगंज रेप केस की पीड़िता रुपा को शनिवार को उल्टीयाँ होने लगीं। हालत बिगड़ने पर अस्पताल ले जाया गया और पता चला कि शरीर में संक्रमण फैलने के कारण उसकी मौत हो गई। मानसिक रुप से अस्वस्थ रुपा का रेप तीस वर्षीय बनवारी ने किया था। उसके साथ रेप करने के बाद उसने परिवार को मारने की धमकी भी दी थी। जिसके कारण रुपा ने घर में किसी को कुछ नहीं बताया। उसकी मानसिक अवस्था का फायदा उठाते हुए ऐसे घिनौने अपराध को अंजाम दिया गया। अब तक ना जाने रुपा जैसी कितनी ही लड़कियों ने दम तोड़ दिया होगा। उनके आत्मविश्वास को रोज़ नोचा जाता है।

मानसिक रुप से महिलाओं और लड़कियों के मामले में Invisible victims of sexual violence संस्था की रिपोर्ट के अनुसार भारत में मानसिक और शारीरिक रुप से विकंलाग महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा यौन हिंसा की घटनाऐं होती हैं। जिन लड़कियों को सुनने-बोलने, चलने-फिरने में तकलीफ होती है, वो हिंसा के लिए आसान शिकार मानी जाती हैं।

भारत में हर 16 मिनट पर एक लड़की के साथ रेप होता है। हमारे देश में रुपा जैसी कितनी ही लड़कियाँ हैं, जिनका रोज शारीरिक और मानसिक रुप से शोषण किया जाता है। पिछले साल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने दावा किया था कि महिलाओं के प्रति होनी वाली हिंसा 21 प्रतिशत से घट कर 19 प्रतिशत हो गई है, जबकि एक ही महीने में पांच सबसे दर्दनाक मामले देखने को मिले थे।

भारत में रेप हुई महिला का जीवन बद से बदतर होता है। जिन औरतों के साथ यह जघन्य अपराध होता है उन अपराधों के लिए ज़्यादातर उन्हें ही दोषी करार दिया जाता। Deutsche welle संस्था की रिपोर्ट में रेप के लिए ज़िम्मेदार कथनों पर चर्चा की गई है।

रेप के मामले में सबूत न मिलने के कारण अपराधी आसानी से छूट जाते हैं। रेप की समस्या को न सिर्फ कानून तौर पर बल्कि समाजिक तौर पर भी नकरा जाता है। हमारे देश आज भी पितृसत्तात्मक समाज का है, जहाँ औरतों  को दूसरे दर्जे का मनुष्य माना जाता है।

बहुत कम उम्र में ही बच्चों की ज़हन में यह बात डाल दी जाती है कि लड़की की विचार मायने नहीं  रखते। निम्र आय वर्ग के लड़कों का मानना था कि, जो महिलाएं पश्चिमी सभ्यता के कपड़े पहनती हैं,  वो बुरी होती हैं। वो यौन हिंसा को बढ़वा देती हैं।

National crime records Bureau data के अनुसार 2017 में 93 प्रतिशत मामले में महिलाएं रेप करने वाले अपराधियों को जानती थीं जिससे पता चलता है कि महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। ऐसा ज़रुरी नहीं है कि रेप करने वाला कोई अंजान ही हो। ज्यादातर मामलों में वह कोई जान- पहचान वाला होता है। अंजान से सुरक्षा के लिए तो हमारे माता-पिता हमेशा हिदायत देते हैं, पर अपने जानने वालों से कोई कैसे बचा जा सकता है, जिनकी सोच ही खराब है, ये कौन सिखाएगा?

हमारे समाज में महिलाओं के साथ होने वाले शोषण पर चुप रहने की एक पुरानी सोच है। सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं को आम लोगों की संपत्ति माना जाता है। जिसका जब मन करता है वो उनके साथ बदतमीजी कर के चला जाता है। रेप करने वाला सिर्फ एक आदमी नहीं बल्कि पूरा समाज होता है। हमारी न्याय पालिका भी इन मामलों में पीछे नहीं।

रेप जैसी घटनाओं पर पुलिस और वकीलों के असंवेदनशील सवालों पर औरत की इज्जत रोज लूटती है। हम सोच भी नही सकते रुपा के माँ- बाप पर क्या बीती होगी। मानसिक रुप से ग्रसित बेटी को संभालने और उसका पालन पोषण करना ही बहुत मुश्किल होता है। अपनी बेटी को खोने से ज्यादा दु:ख उन्हें इस बात का होगा कि उन्हें न्याय शायद कभी नहीं मिलेगा। बरेली रेप केस के बनवारी जैसे लोग हमारे समाज में अपना सीना चौड़ा कर घूमते हैं पर रुपा जैसी लड़कियों पर समाज को शर्म आती है। ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाना शायद मुश्किल होगा।

आज रुपा तो कल कोई और होगी।

नोट: *रूपा एक काल्पनिक नाम है 

मूल चित्र : thainopho via Canva Pro

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