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मैं सिर्फ आपकी पत्नी ही नहीं किसी की बेटी भी हूँ…

क्या पता कल को बेटी का पति या ससुराल वाले कैसे मिलें? तुझे अपनी बेटी का रोना दिख गया लेकिन दूसरी बेटी के रोने पर आंखे मूंद ली? “हेल्लो पापा! आप अब और अकेले उस घर में नहीं रहेंगे। अगर आज आपको कुछ हो जाता तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाती। अच्छा […]

क्या पता कल को बेटी का पति या ससुराल वाले कैसे मिलें? तुझे अपनी बेटी का रोना दिख गया लेकिन दूसरी बेटी के रोने पर आंखे मूंद ली?

“हेल्लो पापा! आप अब और अकेले उस घर में नहीं रहेंगे। अगर आज आपको कुछ हो जाता तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाती। अच्छा हुआ जो आपको कहीं चोट चपेट नहीं आयी। यहाँ सबके साथ अच्छा लगेगा, मन भी लगा रहेगा। नमन को मैंने कह दिया है। आप आ जाना उनके साथ।  खुशी की तबियत ठीक होती तो मैं खुद ही आ जाती”, रमा ने अपने पिताजी अवधेश जी से कहा।

“अरे बेटा! तूने खाम खा दामाद जी को परेशान किया। मैं यहाँ ठीक हुँ”, अवधेश जी ने कहा।

“पापा अब मैं कुछ भी नहीं सुनने वाली, बस आप आ रहे हैं। अब आप हमारे साथ ही रहेंगे। फोन रखती हूं, आप का इंतजार करूँगी”, रमा ने कहा।

“माँजी ठीक किया ना मैंने पापा को यहाँ बुला कर?” रमा ने अपनी सास सरला जी से कहा।

“हाँ बेटा! माता-पिता बच्चों के साथ नहीं रहेंगे तो कहाँ जाएंगे? अच्छा किया तुमने जो समधी जी को बुला लिया”, सरला जी ने कहा।

रमा अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। रमा के मां का निधन हो जो जाने से अवधेश जी अकेले हो गए थे। सीढियां उतरते वक़्त पैर फिसला लेकिन वो गिरने से बच गए थे।

सुबह से शाम हो गयी। रमा को अपने पापा का इंतजार करते करते। रसोई से लेकर सफाई तक कोई भी काम करती लेकिन उसका ध्यान दरवाजे और फोन पर ही टिका हुआ था कि कब उसके पापा आएंगे?

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रमा लगातार फोन पर फोन किये जा रही थी लेकिन कोई भी फोन नही उठा रहा था। कभी मन मे अनहोनी की आशंका होती, तो कभी मन कहता ,नही सब ठीक होगा। रमा के चेहरे पर उसके मन का डर,घबराहट और बेचैनी साफ झलक रहा था ।

रमा की सास ने रमा को ढाढस बंधाते हुए कहा,”बहु चिंता मत करो आ जाएंगे थोड़ी देर में।”

“हाँ माँजी लेकिन सिर्फ 3 घंटे ही तो लगते हैं। यहाँ तो सुबह से शाम हो गयी। और कोई फोन भी नहीं उठा रहा। इसलिए मन बेचैन हो रहा था”, रमा ने कहा।

तभी दरवाजे की घंटी बजी। रमा सोफे से उठकर भागके दरवाजा खोलने गयी। देखा सामने नमन थे सिर्फ। रमा नमन के अगल बगल झांकने लगी। तभी नमन ने कहा, “अब घर के अंदर भी आने दोगी मुझे?”

“हाँ हाँ नमन आओ ना। पापा कहाँ है?” रमा ने कहा।

“जहाँ होना चाहिए और कहाँ?” नमन ने कहा।

“मतलब?” रमा ने गुस्से भरे स्वर में पूछा।

“वहीं वृद्धाश्रम में छोड़कर आया हूं। जो बात तुम नहीं समझी वो तुम्हारे पिताजी समझ गए। और तैयार हो गए आश्रम जाने के लिए”, नमन ने कहा।

“नमन तुम पागल हो चुके हो? मैंने तुम्हें मना किया था कि तुम वृद्धाश्रम की बात मेरे पापा से नहीं  करोगे”, रमा ने कहा।

“देखो रमा जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि अगर बाबुजी की जगह तुम्हारी माँ होती, तो मैं एक बार सोचता भी साथ रखने के लिए। लेकिन मैं तुम्हारे पापा को साथ नहीं रख सकता, क्योंकि माँ को कंफर्टेबल नहीं रहेगा। और वो भी कंफर्टेबल नहीं रहते। समझीं?”

“ये क्या बात हुई नमन? तुम्हारे लिए तुम्हारी मां सब कुछ और मेरे पापा कुछ भी नहीं। माफ करना जैसे माँजी की खुशी तुम्हारे लिए पहले मायने रखती है, वैसे ही मेरे पापा की खुशियां भी मेरे लिए मायने रखती हैं। मैं जा रही हूं। मैं अपने पापा के साथ ही रहूंगी।”

तभी रमा के फोन की घण्टी बजी। देखा तो उसके पापा का ही फोन था। उन्होंने कहा, “हेल्लो रमा बेटा तुम चिंता मत करना। मैं यहाँ ठीक हुँ। तुम अपना और खुशी का ख्याल रखना।”

“लेकिन पापा आप क्यों गए? मैं आ रही हूं। मैं आपको वृद्धाश्रम में नहीं रहने दूँगी बस”, रमा आंखों से बहते आंसू पोछते हुए कह रही थी।

“तुझे मेरी कसम है बेटा, तू अपना घर संसार संभाल। मैं यहाँ ठीक हूँ। तू यहाँ नहीं आएगी। मैं फोन रखता हूँ।”

रमा इतना सुनते वहीं सोफे पर बैठ कर मुँह पर हाँथ रख कर बेतहाशा रोने लगी। रोते-रोते उसने नमन कहा से, “क्यों नमन क्यों किया तुमने ऐसा? एक बेटी के पिता की जगह वृद्धाश्रम क्यों?”

सरलाजी ये सबकुछ चुपचाप देख और सुन रही थीं। लेकिन चुपचाप ही रहीं। अगले दिन भी रमा रो रो के उदास मन से घर के काम में लगी हुई थी। वो सोच रही थी कि काश वो लड़का होती तो उसके पापा के साथ ऐसा कभी नहीं होता।

इधर तीन साल की खुशी लगातार सरलाजी के ठीक सामने रोये जा रही थी। लेकिन सरलाजी उसको गोद मे नहीं ले रही थीं। तभी नमन ने खुशी को गोद मे उठाते हुए कहा, “मां आप ने खुशी को उठाया क्यों नहीं?”

“मैं क्यों उठाऊँ इसको? ये किस काम की मेरे? तू तो अब बस दूसरे बच्चे की तैयारी कर और हाँ लड़का ही होना चाहिए। तभी मैं उसको गोद मे लूँगी। अब चाहे उसके लिए तुझे जो भी करना पड़े”, सरलाजी ने कहा।

नमन ने गुस्से में कहा, “माँ आज आप कैसी बातें कर रही हैं? ऐसा कौन सा काम है जो मेरी  बेटी नहीं कर सकती जो एक बेटा कर सकता? दुनिया चांद पर पहुंच गया और आप अभी भी उसी पुरानी मानसिकता में है। आज बेटियां किसी मुकाबले में बेटों से कम नहीं हैं। बेटी हर वो काम कर सकती है जो एक बेटा कर सकता है। यही आज के युग की सच्चाई है। आप की सोच पहले तो ऐसी नहीं थी।”

“हो सकता है कि बेटियां सबकुछ कर सकती हों लेकिन बूढ़े पिता का सहारा नहीं बन सकती। उन्हें रहने के लिए छत नहीं दे सकतीं। और मैं नहीं चाहती कि जिस बेटे को मैंने इतने लाड़ प्यार से पाला पोसा, उसको अपना बुढ़ापा वृद्धाश्रम में बिताना पड़े।”

“क्योंकि क्या पता कल को बेटी का पति या ससुराल वाले कैसे मिलें? कहीं उन लोगों ने रखने से मना कर दिया तो? जैसे तूने समधी जी को वृद्धाश्रम छोड़ दिया? तुझे अपनी बेटी का रोना दिख गया लेकिन दूसरी बेटी के रोने पर आंखे मूंद ली?”, सरलाजी ने कहा।

नमन ने सिर झुका लिया और कहा, “लेकिन माँ मैंने तो आपकी सुविधा की खातिर ये किया।”

“नमन तो तुमने मुझसे पूछना भी जरूरी नहीं समझा। उनके रहने से मुझे असुविधा क्यों होगी? माता-पिता को बुढ़ापे में अगर बच्चे सहारा नहीं देगे तो कौन देगा? समधी जी के यहाँ रहने से मुझे कोई समस्या नहीं है। ये तो तेरी सोच का फर्क है बेटा। वरना उनके रहने से तो हम सब को कोई असुविधा नहीं होते। अंदर-बाहर के छोटे-मोटे काम तो समधी जी अभी भी कर लेते हैं। वो बुजुर्ग हुए हैं, लाचार नहीं।

परिवार होते हुए भी तुमने उन्हें अकेला कर दिया। थोड़ा सोच कर देख बेटा अगर तू आज समधी जी की जगह होता तो तुझे कैसा लगता? जब एक बेटे के माता-पिता अपने बेटे के साथ रह सकते हैं तो एक बेटी का पिता क्यों नहीं अपनी बेटी के साथ रह सकता है?”

नमन को अपनी माँ की बाते सुन के गलती का एहसास हो गया। उसने कहा, “मां आपने बिलकुल सही कहा, मैंने इस नजरिए से तो सोचा ही नहीं।”

नमन ने तुरंत अपनी कार  निकाली और रमा से कहा, “रमा चलो बाबूजी को लेने।”

नमन पूरे परिवार के साथ वृद्धाश्रम पहुंचा । तो देखा कि अवधेश जी चुपचाप अकेले कुर्सी पर बैठे पौधों को  एकटक ध्यान से देख रहे थे। रमा दौड़कर अपने पिता के गले लग गयी। नमन ने अपने किये व्यवहार के लिये माफी भी मांगी और उन्हें घर चलने के लिए कहा, तो अवधेश जी ने कहा, “मैं यहाँ ठीक हूँ। आराम से हूँ। आप लोग चिंता मत कीजिये।”

तभी सुधा जी ने कहा, “समधी लेकिन हमें तो आराम नहीं। आप संकोच ना करें। वो घर भी आपका ही है।” और सभी लोग एकसाथ घर आ गए।

तब रमा ने कहा, “माँजी आपका बहुत बहुत धन्यवाद।”

मूल चित्र : Photo by Photo Grapher from Pexels

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