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2020 में भारतीय महिलाओं के हित में हुए ये 4 सुप्रीम फैसले!

Posted: दिसम्बर 31, 2020

साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने अनेक ऐतिहासिक निर्णय सुनाए जो महिलाओं से संबंधित हैं और जिसे जानना हर एक के लिए ज़रुरी है। आइये जानें और…

साल अब खत्म होने को है। ऐसे में ऐसी अनेक बातें रहीं, जिसने लोगों को हंसाया और रुलाया। कोरोना के दौरान अनेक रिपोर्टस आए जिसमें महिलाओं की स्थिति के बारे में बताया गया। आधी-आबादी का संघर्ष और मुखर होकर सबके सामने आया। महिलाओं ने भी आवाज़ उठाना सीखा और अपने हक की लड़ाई के लिए मुखर होकर बोलना सीखा। 

साल 2020 ने महिलाओं से संबंधित अनेक ऐसी खबरों लाया जिसे जानना हर एक इंसान के लिए ज़रुरी रहा। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक ऐतिहासिक निर्णय सुनाए, जिसमें से चार महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहे। 

निर्भया को मिला इंसाफ

16 दिसंबर की काली रात को निर्भया के साथ हुए बलात्कार के दोषियों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सजा का ऐलान हुआ। इस तरह से निर्भया को इंसाफ मिला। फांसी के तड़के एक दिन पहले दोषियों की पांच याचिका खारिज हुई और  20 मार्च को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। निर्भया को इंसाफ मिलने में 7 साल, 3 महीने और 4 दिन का समय लगा। हालांकि फैसला आने में देरी हुई मगर दोषियों को सजा मिली। यह एक माता-पिता समेत भारत के देशवासियों की जीत है क्योंकि लड़की के साथ जबरदस्ती करना और बलात्कार को अंजाम देना सरासर गुनाह है और गुनाहों की सजा जरुर मिलनी चाहिए।

थलसेना में मिला महिलाओं को बराबरी का हक

सुप्रीम कोर्ट ने एक और ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत 14 साल से कम और उससे ज्यादा समय तक सेवाएं दे चुकी महिलाओं अफसरों को परमानेंट कमीशन का मौका दिया जाए और महिलाओं को भी कमांड पोस्टिंग का अधिकार मिले। सरकार ने इस फैसले के खिलाफ दलील पेश कि थी कि पुरुष महिलाओं से आदेश लेने को तैयार नहीं है। इस पर कोर्ट ने कहा था कि अब जरुरत है, अपनी मानसिकता को बदलने की। 

स्थाई कमीशन के लागू होने के बाद अब महिलाएं 20 साल तक सेना में अपनी सेवाएं दे सकेंगी। हालांकि यह आदेश सीधे युद्ध में उतरने के लिए लागू नहीं होगा। बहरहाल महिलाएं अपने हक के लिए 17 साल से लड़ रही थी और यह स्त्री शक्ति की जीत है। 

पिता की संपत्ति में बेटियों का भी अधिकार

कोर्ट में एक महिला द्वारा याचिका दायर की गई थी, जिसमें उसके भाइयों ने दलील दी थी कि पिता की मृत्यु साल 1999 में हो गई थी इसलिए संपत्ति पर उनकी बहन का हक नहीं है। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए था कहा कि हिंदू उत्तराधिकारी (संशोधन) कानून 2005 के लागू होने के वक्त पिता जीवित ना हो तो भी बेटी संपत्ति में हिस्सेदार होती है। जस्टिस अरुण मिश्रा की बेंच ने तर्क दिया था कि बेटे तो शादी तक ही बेटे रहते हैं मगर बेटियां पूरी जिंदगी माता-पिता को प्यार देती हैं। 

इस कानून के लागू होने से पहले लड़कियों को पिता की मृत्यु हो जाने और बंटवारा हो जाने के बाद लड़कियों को पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता था मगर सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम की सीमा को तोड़ दिया और लड़कियों के हक में फैसला सुना दिया। 

तलाक के बावजूद महिला को मिला पति के रिश्तेदारों के घर में रहने का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने एक और ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अब तलाक का केस चलने पर भी पत्नी को ससुराल में रहने का हक मिल गया। साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि पत्नी सिर्फ पति के घर पर ही रह सकती है मगर ससुराल वालों या रिश्तेदार के घर पर नहीं लेकिन अब पत्नी पति के किसी भी रिश्तेदार के घर पर रहने का हक है। 

इस फैसले के पहले पत्नी सिर्फ पति के उसी घर में रह सकती थी, जिसमें पति का हिस्सा था मगर अब अगर पति का किसी घर में हिस्सा नहीं है लेकिन संबंधों के दौरान पत्नी उस घर में रही है, तो वह उस घर में रहने की हकदार है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से सभी को चौंकाया और आधी-आबादी को अधिकार दिए। महिलाओं की जीत समाज में ऊर्जा का संचार करती है क्योंकि इससे ही बराबरी की लड़ाई मुखर होती है। उम्मीद है कि आने वाला साल भी महिलाओं को उनके हकों का आसमान देगा। 

मूल चित्र : KJIO77 from Getty Images, via Canva Pro

 

                              

  

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