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क्या सच में तुम कदम बाहर बढ़ा पाओगी? क्या तुम जी पाओगी?

Posted: नवम्बर 28, 2020
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‘जो आज न बढ़ी तो कमज़ोर पड़ जाऊंगी, फिर माँ, दादी की तरह इस कुएं में तड़पती रह जाऊंगी’, उस दिन मेरा अहम् जीता या उसका स्वाभिमान, नहीं जानता!

अतीत की खिड़की से
झांकता एक चेहरा
वो चेहरा अप्रतिम
स्नेह और प्रेम की आभा से दमकता
जिसपर वक़्त की धूल चढ़ती गयी थी
कुम्हलाये फूल सा, तेजहीन,
जो अपनी खुशबू, रंगत बिखेरते बिखेरते
थका सा निहारता, कि शायद
स्नेह की बयार बहे
और उसे भी कोई याद दिला दे
जीवित होना!
निस्तेज आँखों में अधूरे स्वप्न
चेहरे पर प्रेयसी, मातृत्व के अनेकों रंग
सर्वस्व न्योछावर कर भी मुस्कान से वंचित।
कैसे भुलाया जाए उसका मुड़ कर देखना
और पूछना, क्या यकीनन मैं जाऊं?
और मेरा व्यंग्य से उसे कहना
क्या ज़िंदा रह पाओगी?
क्या कुंए की आश्वस्त दीवारों से
बाहर अनजान उफनती नदियों में
छलांग लगा पाओगी?
क्या सच तुम कदम बाहर बढ़ा पाओगी?

बहुत याद आता है उसका मुड़ कर देखना
और बस आखिरी बार आस करना
कि शायद रोक ले कोई
और फिर ये तय कर लेना
जो आज न बढ़ी तो कमज़ोर पड़ जाऊंगी
फिर माँ, दादी की तरह इस कुएं में
तड़पती रह जाऊंगी।
उस दिन मेरा अहम् जीता या उसका स्वाभिमान
नहीं जानता
मगर उस दिन वो पंख पसारे
उन्मुक्त आकाश में उड़ना सीख गयी
कुएं की दीवारों, नदी की लहरों से कहीं ऊपर
बादलों संग विचरना सीख गयी।
और जान गयी
कि कुँए की जलचर वो थी ही नहीं
पंख रखने वाले पानी में तैरते नहीं
बंधे हुए पंख कसते जाते हैं
और एक दिन अपने बोझ तले दब कर
भारी पत्थर बन तलहटी में बैठ जाते हैं।
पंखों को बाँधा नहीं जाता
सपनों को तह लगा तिजोरी में रखा नहीं जाता।

मूल चित्र : Instants from Getty Images Signature, via Canva Pro 

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