कोरोना वायरस के प्रकोप में, हम औरतें कैसे, इस मुश्किल का सामना करते हुए भी, एक दूसरे का समर्थन कर सकती हैं?  जानने के लिए चेक करें हमारी स्पेशल फीड!

मुथुलक्ष्मी रेड्डी : देश की पहली महिला विधायक का रोमांचक सफर

Posted: नवम्बर 16, 2020

मुथुलक्ष्मी रेड्डी के प्रयासों से स्थापित कस्तुरबा चिकित्सालय और कैंसर राहत के लिए अखिल भारतीय संस्थान आज एम्स के रूप में प्रसिद्ध हैं।

भारत की अज़ादी की लड़ाई के दौरान कुछ लोग ऐसे भी रहे, जिन्होंने आज़ादी के साथ-साथ सामाजिक आंदोलनों को भी ज़रूरी समझा। इन समाज सुधारकों ने सामाजिक सुधार और सामाजिक जागृति के लिए महत्वपूर्ण काम किए। मुथुलक्ष्मी रेड्डी, वह नाम हैं जिन्होंने महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार के लिए सामाजिक कुरीतियों के विरोध के साथ-साथ सामाजिक सुधार आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई।

तामिलनाडु के मध्यवर्गीय परिवार में 30 जुलाई 1886 को जन्मीं मुथुलक्ष्मी रेड्डी ने स्वयं को शिक्षित करने के लिए रूढ़िवादी समाज के विरोध के बाद भी सह-शिक्षा विद्यालय में मैट्रिक की पढ़ाई की। आगे की पढ़ाई के लिए महाविद्यालय ही नहीं, बल्कि मेडिकल कॉलेज में भी वह एकमात्र महिला स्टूडेंट थी।

गौरतलब है कि मुथुलक्ष्मी रेड्डी को साल 1927 में मद्रास लेजिस्लेटिव काउंसिल से देश की पहली महिला विधायक बनने का गौरव भी हासिल हुआ।

यही नहीं, वह भारत में महिला प्रसूति और नेत्र चिकित्सालय की प्रथम महिला सर्जन थी। इसके साथ-साथ मुथुलक्ष्मी रेड्डी, 1937 में मद्रास नगर निगम की पहली महिला एल्डरवुमैन और 1954 में राज्य कल्याण परामर्शदाता मंडल की प्रथम महिला अध्यक्ष और मद्रास विधान परिषद की पहली महिला उपसभापति भी बनीं। यह उस दौर की बात है, जब सार्वजनिक जीवन में महिलाएं मुश्किल से ही मिलती थीं। एक मात्र महिला चिकित्सक होने के नाते उनकी प्रैक्टिस बहुत अच्छी चल रही थी।

महिलाओं और बच्चों के प्रति समर्पित किया जीवन

उन्होंने एक शल्य चिकित्सक डॉ. सुनडेरा रेड्डी से शादी की। शादी के बाद दोनों महात्मा गाँधी और एनी बेसेंट के संपर्क में आए, जिसके बाद जीवन के प्रति दोनों का नज़रिया बदल गया। तब मुथुलक्ष्मी रेड्डी ने महिलाओं और बच्चों के प्रति अपना जीवन समर्पित करने का फैसला किया। जब अपनी आगे की पढ़ाई के लिए उनको इंग्लैड जाना पड़ा, तब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलनों में भाग लेना शुरू किया। भारतीय महिला संघ के अनुरोध पर उन्होंने मद्रास विधान परिषद की सदस्यता के लिए चिकित्सक के रूप में अपनी गाढ़ी कमाई को छोड़ दिया और विधान परिषद के उपसभापति के तौर पर काम करना शुरू किया।

उन्होंने अनाथ बच्चों के लिए मद्रास में अव्वई होम की शुरुआत की जो आज भी काम कर रही है

भारतीय महिला संघ से जुड़ने के बाद उन्होंने नगरपालिकाओं और विधानसभाओं में महिला मताधिकार के पक्ष में आंदोलन का नेतृत्व भी किया। अनाथ बच्चों के प्रति अधिक संवेदना होने की वजह से उन्होंने मद्रास में अव्वई होम की शुरुआत की। अव्वई होम का मकसद यह था कि अनाथ बच्चों को आवास, शिक्षा, पोशाक और उचित खुराक मिल सके। यह संस्था आज भी अनेक निर्धन और निराश्रित लड़कियों को नि:शुल्क शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण दे रही है।

इसके साथ-साथ मुथुलक्ष्मी ने कई समाज सुधारों की नींव रखी। उनकी महत्वपूर्ण उपलब्धियों के रूप में देवदासी प्रथा के उन्मूलन के लिए विधेयक, बहुविवाह प्रथा विरोधी विधेयक, महिलाओं के लिए व्यस्क मताधिकार, निर्वाचन मंडल में महिलाओं के स्थानों के लिए आरक्षण, वेश्या के उन्मूलन के लिए कार्यक्रम और लड़कियों के विवाह के लिए न्यूनतम आयु का निर्धारण प्रमुख हैं।

कस्तुरबा चिकित्सालय और एम्स मुथुलक्ष्मी रेड्डी के प्रयासों की है बानगी

महिलाओं के सुधार हेतु विधेयकों पर आम सहमति के संदर्भ में सदन में महिलाओं की उपस्थिति के लिए वह बसों का इतंजाम करके रखती थीं ताकि विधेयक परित होने से रूक ना सके। वह दर्शक दीर्घा में भी महिलाओं का जमावड़ा रखती थीं। उनके प्रयासों से स्थापित कस्तुरबा चिकित्सालय और कैंसर राहत के लिए अखिल भारतीय संस्थान आज एम्स के रूप में प्रसिद्ध हैं, जो शोध संस्थान के रूप में भी काम कर रहा है।

आज़ादी के बाद उन्हें राज्य समाज कल्याण बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। शिक्षा समिति के सदस्य के रूप में चिल्ड्रन एंड सोसायटी और मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों में उनके सुझाव काफी सराहनीय थे। उन्होंने भारतीय महिला संघ की पत्रिका “स्त्री-धर्म” का संपादन भी किया। समाज सुधार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए उन्हें 1956 में “पद्म भूषण” की उपाधि से सम्मानित किया गया।

जीवन के अंतिम दिनों में देश की पहली महिला नेत्र चिकित्सक की आंखों की रोशनी चली गई, जिसके बाद भी वह समाचारों और सूचनाओं के प्रति जागरूक रहकर महिलाओं के खिलाफ किसी भी अन्याय का भरसक विरोध करती रहीं।

उन्होंने राजनीतिक दलों और सरकारों के पीछे चलना कभी स्वीकार नहीं किया। अपने बचपन से लेकर जीवन के हर मोड़ पर उन्होंने अपने आत्मबल के दम पर संघर्ष किया। 80 वर्ष की आयु में ब्रेन हैम्ररेज की वजह से उनकी मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु पर भारतीय महिला संघ ने उनको श्रद्धांजली देते हुए सौ साक्षरता केंद्र खोलकर महिलाओं को शिक्षित करने का संकल्प लिया, जिसके लिए भारतीय महिला संघ धन्यवाद का पात्र है।

संदर्भ :अखिल भारतीय महिला संघ आरकाइव।

फोटो साभार : Google Doodle, Twitter

पसंद आया यह लेख?

पाइये विमेन्सवेब के सारे दिलचस्प हिंदी लेख अपने ईमेल इनबॉक्स मे!

विमेन्सवेब एक खुला मंच है, जो विविध विचारों को प्रकाशित करता है। इस लेख में प्रकट किये गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं जो ज़रुरी नहीं की इस मंच की सोच को प्रतिबिम्बित करते हो।यदि आपके संपूरक या भिन्न विचार हों  तो आप भी विमेन्स वेब के लिए लिख सकते हैं।

घर के बाहर काम करने से क्या मैं बुरी माँ बन जाऊँगी?

टिप्पणी

Women In Corporate Allies 2020

अपना ईमेल पता दर्ज करें - हर हफ्ते हम आपको दिलचस्प लेख भेजेंगे!

Women In Corporate Allies 2020