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कहीं वो भी एक दो करवाचौथ के बाद उसी की तरह बदल तो नहीं जाएगा?

Posted: नवम्बर 2, 2020

वो रखना भी चाहती थी व्रत, प्रेम के अभिभूत जो उसे मिल रहा था पर फिर विचार रुक जाता था। क्या वह उसके इस प्रेम तप के योग्य है?

फिर से वही दिन आने वाला था। आसपास की विवाहित स्त्रियाँ, यहाँ तक कि ऑफिस की भी कलीग्स नई साड़ी, गहनों, पार्लर के मेक अप और शाम तक फ्रेश बने रहने के नुस्खे और किस्से साझा करने लग गईं थीं। वो फिर पशोपेश में थी।

कुछ के लिए ये दिन एक जिम्मेदारी था जिसे उन्होंने उठाया हुआ था क्योंकि उनके सम्बन्ध में कुछ स्नेह जैसा शेष नहीं था। कुछ के लिए नई साड़ी या लहँगा, पार्लर मेक अप और कुछ हंसी ठिठोली का बहाना था और कुछ के लिए ये केवल इसलिए ज़रूरी था कि पड़ोसन को हर साल कोई नया गहना तोहफ़े में मिलता है, तो मुझे भी जता जता कर कुछ नया बनवाने को मिल जाएगा। जो बंधे हों प्रेम से, आंखों में आंखे डालकर केवल मौन से ही थाम लेते हो सम्बन्धों को, ऐसे जोड़े भी रखते हैं ‘करवाचौथ’, एक दूसरे के लिए।

वो परिचित थी हर प्रकार के व्रत से। अब समस्या तो उसके सामने थी। सामाजिक और पारिवारिक दबाव बहुत होता है इस जिम्मेदारी नुमा व्रत के लिए। जो ये व्रत न करे उसे बहुत ही संदिग्ध दृष्टि से देखा जाता है स्त्री समाज में। अति मॉडर्न, फेमिनिस्ट या धर्म को न मानने वाली स्त्री बन जाती है वो। और पति? वो भी तो समाज का हिस्सा है। उन्हें भी दम्भ ही होता है कि लम्बी आयु के लिए कोई उनके लिए निर्जला व्रत करे। जिसकी धर्मपत्नी व्रत न करे उन्हें भी तो उनके पुरुष समाज में बहाने बनाने पड़ते हैं।

उसकी तो कहानी ही दूसरी थी। कितने मन से प्रेम और समर्पण से रखती थी वो भी व्रत। पर क्या हुआ? न उसके मन की पवित्रता न उसके तप का सत्य न ही उसकी देह की गमक… कुछ भी रोक न पाया उसे। भर भर कर मानसिक और शारिरिक कष्ट दिए गए उसे। फिर एक बेटी गोद मे छोड़कर भाग खड़ा हुआ अपनी जिम्मेदारियों से। अकेले ही बेटी और खुद का भरण पोषण करते हुए वह इतनी कठोर हो चुकी थी कि तलाक़ का निर्णय उसने खुद लिया था। सब ठीक हो गया था। उसकी मानसिक शांति लौट आई थी। मन के घाव भरे नहीं थे पर उनमें दर्द भी नहीं रहा था। किसी पर विश्वास और प्रेम का लेश भी नहीं रख पाती थी अब। थोड़े से चटकीले रंगों से दोस्ती कर के वह जीवन में लौटने का प्रयास कर ही रही थी कि अचानक उसे वो मिला।

उसने कहा, प्रेम प्यार विश्वास करते रहना चाहिए। यही हमें मनुष्य बनाता है। शनै शनै वह उसके विचारों से सहमत होने लगी थी। पर वो डरती थी। मनुष्य स्वभाव में कैसे कब परिवर्तन होता है पता भी नहीं चलता, ये उसने देखा था जिया भी था। पर उसे इसके उत्तर में गहरा प्रेम और विश्वास दिखा। स्थापित प्रेम और शाश्वत स्नेह मिला जो उसकी कठोरता को भी अपना चुका था। आखिर उसके हृदय में धमक सी हुई। और वो पुनर्विवाह के लिए मान गई थी।

पिछला साल तो खैर निकल गया जैसे तैसे। इस बार भी करवाचौथ की तिथि कैलेंडर में शूल जैसी दिख रही थी उसे। वो रखना भी चाहती थी व्रत, प्रेम के अभिभूत जो उसे मिल रहा था पर फिर विचार रुक जाता था। क्या वह उसके इस प्रेम तप के योग्य है? है भी तो क्या वह समझेगा उसके प्रेम को? वो भी एक दो करवाचौथ के बाद बदल तो नहीं जाएगा? नहीं, नहीं! हो सकता है मेरा ये व्रत रखना ही अशुभ हो! क्या करे वो, समझ ही नहीं पा रही थी।

वो शहर से बाहर रहता है। उन दोनों के बीच का मौन संधिपत्र था ये भी, क्योंकि उसने ही कहा था, ‘ मैं पूरी तरह खर्च कर चुकी हूँ मेरा प्रेम, विश्वास, त्याग करने और सम्बन्धो को संभालने का हुनर! तुम्हे ही सब देखना होगा। और ये चौबीसों घण्टे नहीं रह पाऊंगी साथ में। कभी कभी मिलो, और थोड़े दिनों तक प्रेम को जीने के बाद तुम जाओ तो मुझे दुख हो, आँखों मे आंसू हों कि तुम जा रहे हो। इसे ऐसे ही सुंदर रहने देंगे। बिना लड़ाई झगड़े और विवाद के।’

इस बार के करवाचौथ की तिथि आने को आतुर थी। और वो दोनों ही व्हाट्सएप के संदेशों और फ़ोन कॉल में भी इसका उल्लेख करने से बचते रहे।

ठीक करवाचौथ के दिन वह शहर से अचानक आ धमका। बिटिया को गले लगाकर बोला चलो तैयार हो जाओ, बाहर चलते हैं। तुम्हे वोदका के कुछ शॉट्स लगवा आएं। वो फ़टी आंखों से बस उसे देखती रह गई। वो उससे नज़रे नहीं मिला पा रही थी। कहीं भीतर बहुत गहरे में उसके अंतर से आवाज़ आ रही थी, यही है वह, यही है, जो पात्र है तेरे प्रेम और समर्पण का।

उसने उसी क्षण निर्णय लिया कि वो उसे बताएगी कि वो भी प्रतीक्षा में है उस सुंदरतम करवाचौथ के, जब वह प्रेम के वशीभूत इतनी उत्साह में होगी कि सारा जीवन उसे प्रेम दिखाई देगा। उसे विश्वास होगा कि उसका किया जा रहा निश्छल प्रेम, छल बनकर नहीं लौटेगा, उस दिन वह बांवरी होकर नाचेगी और रखेगी उसके लिए करवाचौथ!

मूल चित्र : Arindam Dab via Unsplash

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