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कंडोम चाची सीतापती देवी घर-घर में परिवार नियोजन का अलख जगा रही हैं!

Posted: नवम्बर 11, 2020

कंडोम चाची सीतापती देवी कंडोम अपनी पल्लू में बांधती और निकल पड़ती सभी घरों की ओर ताकि वे लोगों की जरूरत को कर सकें।

कोई इन्हें चलता फिरता कंडोम की दुकान कहता, तो कोई दबी जुबान में बुढ़ापे में जवानी छा जाना कहकर दबी हंसी हंसता। गांव की नई नवेली बहुएं तो इन्हें देखते ही पल्लू डालकर, चेहरे पर हल्की हंसी लिए हुए घर के अंदर घुस जाया करती थी एवम् उनके पति काम का बहाना कर खेत या दुकान की तरफ निकल जाते थे।

शुरुआत में इनके परिवारवालों को भी समझ में नहीं आया कि इन्हें आखिर हो क्या गया है और इन्हें झूठ बोलकर डॉक्टर से भी दिखाया गया और मानसिक बीमारियों वाली दवा भी खिलाई गई।
कहते हैं अगर ईमानदारी पूर्वक प्रयास किया जाए तो समय बदलते देर नहीं लगती एवम् ठीक यही हुआ सीतापती देवी के साथ।

वर्ष 2016 में वह दूसरी बार मसौढ़ी प्रखंड, पटना जिला, बिहार के एक पिछड़े पंचायत की वार्ड सदस्य के रूप में निर्वाचित हुई थी। दूसरी बार चुनाव जीतने तक इन्हें इस बात के इल्म नहीं था कि उनके पति रामराज रविदास ने नहीं उन्होंने चुनाव जीता है। फिर भी उन्होंने कभी इस बात की फ़िक्र नहीं किया कि उन्हें क्या सब करना है और पहले कि भांति उनका कार्य पति करते रहे थे।

जून 2018 में सेंटर फॉर कैटेलाईजिंग चेंज द्वारा संचालित चैंपियन परियोजना से जुड़ने के बाद ना केवल उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हुआ वरन् उन्होंने अपने पति से बखूबी सारे वार्ड संबंधी कार्यों का भार अपने ऊपर ले लिया। चैंपियन का प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने पहली बार जब वह अपने उप स्वास्थ्य केंद्र गई तब उन्हें कुछ बच्चे बैलून से खेलते दिखे, पूछने पर पता चला कि केंद्र के कंडोम बॉक्स से निकाल कर लाए।

ए. एन.एम. दीदी ने भी कहा कि सरकार ने बॉक्स लगवा तो दिया है लेकिन कोई इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहते हैं। हम लोग समझा-समझा के थक गए हैं। परिवार नियोजन की आवश्यकता और विभिन्न साधनों के बारे में उन्हें प्रशिक्षण के दौरान जानकारी मिली थी। इसमें बहुत सारे साधन बिल्कुल नए, कम साइड इफेक्ट और प्रभावी थे। खुद की छह संतानों को पैदा करने, उनका लालन पालन करने में हुई दिक्कत उन्हें भली भांति अवगत थी।

उन्होंने परिवार नियोजन के बारे में प्रचार प्रसार करने का बीड़ा उठाया और सिर्फ महिलाओं को इसकी जिम्मेदारी ना दी जाए एवम् पुरुषों को भी इस कार्य से जोड़ा जाए। इस पर काम करना शुरू किया। पुरुष नसबंदी के ऊपर समाज में व्याप्त अवधारणा, कुशल चिकित्सकों की कमी को देखते हुए उन्हें लगा कि कंडोम का इस्तेमाल सुनिश्चित करवा कर बच्चों में अंतर रखा जा सकता है एवम् परिवार नियोजन के उद्देश्य को पूरा किया जा सकता है।

परिवारों से बातचीत पर उन्हें पता चला कि कंडोम के बारे में तो बहुतों को पता है, पर इसका सही उपयोग को बताने की जरुरत है। दुकान से कंडोम खरीदने, स्वास्थ्य उपकेंद्र के कंडोम बॉक्स से निकलने, आरोग्य दिवस के दिन मांगने में अभी भी ज्यादातर पुरुष (क्या पढ़ा लिखा, क्या अनपढ़, क्या पैसे वाला क्या गरीब) असहज महसूस करते हैं।

इसके बाद वे आशा, ए एन एम से कंडोम का संग्रह करती, अपनी पल्लू में बांधती और निकल पड़ती सभी घरों की ओर ताकि वे लोगों की जरूरत को पूरा कर सकें। शुरुआत में लोगों को इनसे भी कंडोम लेने में झिझक हुई पर उन्होंने प्रयास जारी रखा।

Sitapati Devi while diatribut

इनके प्रयास से वार्ड में आज बहुत से परिवार कंडोम के इस्तेमाल करने लगे हैं। अब कई सारे पुरुष भी किसी हिचक के इसकी खरीद या कंडोम बॉक्स से लेकर उपयोग कर परिवार नियोजन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करवा रहे हैं।

कोरोना महामारी के दौरान परिवार नियोजन साधनों की अनुपलब्धता के कारण जब गर्भधारण करने वाली महिलाओं की संख्या में विश्वस्तरीय इजाफा देखा गया था, उस समय भी कंडोम चाची सीतापती देवी व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह नहीं करते हुए अपने अभियान को जोर शोर से अपने पंचायत में जारी रखी हुई हैं। उनके अभियान के कारण लोगों में परिवार नियोजन साधनों के ऊपर जागरूकता के साथ साथ इसके इस्तेमाल को लेकर प्रेरणा भी मिली है।

बकौल सीतापति देवी, बहुत लोगों ने मुझसे कहा कि तुम्हें शर्म हया नाम की चीज नहीं बची है जो तुम ये सब घिनौना काम करती फिर रही हो, मेरा सिर्फ यही जवाब था कि मैं तो वार्ड के लिए अपना फर्ज अदा कर रही हूं एवम् वार्ड सदस्य के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने का ईमानदारी पूर्वक प्रयास भर कर रही हूं।

मूल चित्र : Provided by the author

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