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छठ पूजा के समय महिलाएं नाक से लेकर मांग तक सिंदूर क्यों लगाती हैं?

एक ओर तो छठ पूजा के पर्व को प्रकृति का त्यौहार कहा जाता है, लेकिन उसमें परिवारवाद और मन्नत की पहुंच ने अपनी जगह बनाने का काम किया है। 

एक ओर तो छठ पूजा के पर्व को प्रकृति का त्यौहार कहा जाता है, लेकिन उसमें परिवारवाद और मन्नत की पहुंच ने अपनी जगह बनाने का काम किया है। 

हर परंपरा को महिलाएं आगे बढ़ाती हैं ताकि परिवार में चलने वाली परंपराएं चलती रहें, मगर साथ ही महिलाओं को सदियों से परंपराओं को निभाने के नाम पर दबाव को झेलना पड़ता है। कुछ परंपराएं पीढ़ी दर पीढ़ी उन पर सौंपी जाती हैं, तो कुछ परंपराओं का निर्वाहन उन्हें परिवार के लिए करना पड़ता है। यही परंपराएं जब थोपी हुई महसूस होने लगती है, तब एक दबाव को बोध होने लगता है।  

बिहार में लोक आस्था का महापर्व कहे जाने वाले छठ पूजा के पर्व में सबसे ज्यादा महिलाओं की ही भागीदारी देखने को मिलती है। महिलाएं ही पूजा-पाठ में सबसे ज्यादा और लग्न के साथ सम्मिलित होती हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि पुरुष अपनी भूमिका नहीं निभाते। पुरुष पूजा के लिए सामान इकट्ठा करने का काम करते हैं ताकि महिलाएं परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए पूजा-पाठ कर सकें, मगर महिलाओं के ऊपर दोहरी ज़िम्मेदारी होती है कि वे पीढ़ी दर पीढ़ी चल रही मन्नतों को पूरा करें। पुरुषों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे परंपराओं को आगे बढ़ाएं। उन्हें बाहरी कामों में लगाया जाता है और महिलाओं को घर के साथ-साथ परंपराओं के विधि में।  

सामान्यतः लोग कहते हैं कि छठ प्रकृति का त्यौहार है क्योंकि छठ सूर्य की उपासना और प्रकृति के पूजन का मर्म समझाती है, मगर धीरे-धीरे प्रकृति के पूजन में मन्नतों और परंपराओं की धमक बढ़ने लगी। संतान प्राप्ति की कामना के साथ शुरु हुआ छठ पूजा का पर्व, धीरे-धीरे लोगों की मन्नतों को पूरा करने का जरिया बनने लगा, जिसे देखते हुए लोग इसे करने लगे। छठ को लेकर अनेक गीत भी हैं, जिसमें परिवार के सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। किसी गाने में मन्नत मांगी जाती है कि बेटी की शादी हो जाए तो कहीं बेटे की नौकरी के लिए मन्नत की गुहार लगाई जाती है। जैसे – रुनकी झुनकी बेटी मांगी ला, पढ़ल पंडितवा दामाद।  

इस गीत का अर्थ है – हे छठ मइया हमें बेटी दो ताकि घर में रौनक आए और हमारा दामाद पढ़ा लिखा हो। हालांकि बेटी की चाहत को लेकर लोग छठ कर रहें हैं मगर बेटे की चाहत आज भी लोगों में अधिक देखने के लिए मिलती है। छठ में मनौती का हावि होना यह बताता है कि लोग अब सिकुड़ते जा रहे हैं।  एक ओर जब छठ को प्रकृति का त्यौहार कहा जाता है, उसमें परिवारवाद और मन्नत की पहुंच ने अपनी जगह धीरे-धीरे बनाकर रमने का काम किया है। 

एक बार मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा था, जब छठ प्रकृति का त्यौहार है फिर महिलाएं नाक से लेकर मांग तक सिंदूर क्यों लगाती हैं? हालांकि उन्हें लोगों ने ट्रोल कर दिया था मगर उनका सवाल बिल्कुल लाजिमी था।

मान्यता है कि नाक से लेकर मांग तक सिंदूर लगाने से पति की उम्र बढ़ती है मगर प्रकृति के त्यौहार को परिवार तक सीमित कर दिया गया। यहां महिलाओं द्वारा परिवार की चिंता प्रकट होती है मगर पुरुष ऐसा नहीं करते। क्या पुरुषों को अपने परिवार और पत्नी की फिक्र नहीं होती?

छठ में मन्नत ने अपनी ऐसी पैठ बना ली है कि अब घर की महिलाओं पर दबाव होता है कि मन्नत पूरी होनी पर छठ करना जरुरी है। महिलाएं भावनात्मक रुप से सबसे ज्यादा सोचती हैं इसलिए वे दबाव को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए करने लगती हैं, क्योंकि उनके पास कोई उपाय नहीं बचता।  

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एक ओर कहा जाता है कि परिवार की गाड़ी महिला और पुरुष साथ मिलकर खींचते हैं मगर जब परिवार के कुशल-मंगल की कामना की बात आती है, तब महिलाओं पर ही दबाव होता है कि वे हर सदस्य के स्वास्थ्य के लिए व्रत करें। 

छठ को कठोर व्रत माना जाता है क्योंकि इसमें 36 घंटे का निर्जला उपवास रखा जाता है। ऐसे में महिलाओं के लिए करना इसे मुश्किल होता है। वहीं अगर कोई महिला वर्किंग हो, तब उस पर एक दबाव की स्थिति बन जाती है। कई घरों में देखा गया है कि महिलाएं समाज के ढ़ांचे के कारण छठ पर्व को शुरु तो कर देती हैं, मगर अंदर से उन्हें बोझ महसूस होता है, जिसे वे कह नहीं पातीं। 

महिलाओं के लिए मुश्किल होता है कि वे घर के कामों को करें फिर छठ पूजा के लिए सारे काम करें। उन्हें झंझलाहट होती है, मगर परिवार और समाज के ढ़ांचे के कारण दबाव को उन्हें स्वेच्छा मानना पड़ता है। एक तर्क यह भी है कि छठ में लोगों की भीड़ होती है क्योंकि यह सामाजिक रुप से मनाया जाने वाला त्यौहार है। छठ में परिवार से लेकर आसपास के घरों के लोग इकट्ठे होते हैं, जिसमें महिलाएं सबसे ज्यादा सम्मिलित होती हैं। महिलाओं की सहभागिता के कारण महिलाएं इसमें ही रम जाती हैं और पूजा को लेकर थोपी गई जिम्मेदारी को स्वेच्छा से स्वीकार कर लेती हैं। 

किसी भी पर्व-त्यौहार या परंपरा को जब थोपा जाने लगता है या भावनात्मक रुप से जोड़कर देखा जाने लगता है, तब महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। किसी भी पर्व का उद्देश्य तभी पूरा होता है, जब उसे करने वाले स्वेच्छा से उसे स्वीकार करें।

समाज और परिवार को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल महिलाओं की नहीं होता बल्कि पुरुषों की भी समान रुप से होती है। छठ पूजा का ढ़ांचा हर त्यौहार से इसलिए अलग है क्योंकि इसमें लोगों की सहभागिता जरुरी होती है। इस त्यौहार में दूर-दूर से लोग आते हैं इसलिए महिलाओं पर दोहरी जिम्मेदारी बंध जाती है, जिसे परिवार समेत समाज के लोगों को बांटनी होगी तभी त्यौहार की खुशी होगी।

चित्र साभार : Skanda Gautam from Getty Images, via Canva Pro 

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