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शक्ति : आधा हमारा! क्या कह रही है ये शार्ट फ़िल्म?

गाँधी जयंती के अवसर पर रिलीज़ हुयी शार्ट फिल्म 'शक्ति : आधा हमारा' कम शब्दों और कम समय में औरतों के हर मुद्दे पर बात करती है।

गाँधी जयंती के अवसर पर रिलीज़ हुयी शार्ट फिल्म ‘शक्ति : आधा हमारा’ कम शब्दों और कम समय में औरतों के हर मुद्दे पर बात करती है।

गाँधी जयंती के दिन शक्ति (महिला संग़ठन) ने एक शार्ट फ़िल्म, ‘शक्ति : आधा हमारा’ (Half is Ours) रिलीज़ करी है। कम शब्दों और कम समय में एक स्ट्रॉन्ग मैसेज के साथ यह फ़िल्म औरतों के हर मुद्दे पर बात करती है। बाल विवाह से लेकर महिलाओं की प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी जैसे हर सामाजिक पहलू को लेकर राजनीती में महिला लीडर्स की संख्या पर बहुत ही गहराई से यह फिल्म महिलाओं की आवाज बनकर उभरी है। ‘शक्ति : आधा हमारा’ सिर्फ 1 मिनट 46 सेकंड की शार्ट फिल्म है जो शक्ति ग्रुप के फेसबुक पेज पर लॉन्च करी गयी है। इस फ़िल्म में अलग अलग भाषाओं में महिलाओं ने अपनी बात को कहा है।

‘शक्ति : आधा हमारा’ फ़िल्म का उद्देश्य

इस में बाल विवाह, घरेलू हिंसा, महिलाओं की प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी, शौचालय नहीं होना, पानी की पर्याप्त सुविधा न होना और छेड़छाड़ जैसे विषय लिए गए हैं, जिसमे महिलाएं पूछती हैं कि तुम ये सब कैसे देखोगे? वो ये प्रश्न हमारे चुने गए विधायकों से पूछती है। आप भी एक बार इन्हें देखिये:

1 लीटर पानी लेने 10 किलो मीटर जाना पड़ता है, तुम कहां से देखोगे?
आज मेरी गुड़िया मेरी शादी में आयी, तुम कैसे देखोगे?
मैं घर में तो थी, लेकिन घर के कागज़ों में नहीं, तुम कैसे देखोगे?
हमारी स्कूल में लड़कियों के लिए शौचालय आज भी नहीं है, तुम कैसे देखोगे?
रोटी के बदले बेल्ट पड़ती है, तुम कैसे देखोगे?
वो फिर से कॉलेज के रास्ते में ज़बरन लिफ्ट देने आ गया, तुम कैसे देखोगे?

यह फिल्म कहती है कि जब तक आप हमें नहीं देख सकते तो हमारे मुद्दे कैसे देखोगे? हमारी विधान सभा में हर 10 पुरुष पर एक से भी कम महिला है। ज्यादा महिला लीडर्स एक बेहतर लोकतांत्रिक और खुशनुमा भारत बना सकती हैं।

इस फिल्म के मैसेज से हम शत प्रतिशत सहमति रखते हैं। क्योंकि जब तक हम सिस्टम का हिस्सा नहीं है तो हमारी समस्याएँ कैसे दिखेगी और जब तक समस्याएँ नहीं दिखेगी तो हम कैसे बदलाव लाएंगे। इसीलिए बदलाव के लिए हमें ज़्यादा से ज़्यादा उसके प्रोसेस में इन्वॉल्व होना पड़ता है। तो अगर हमें भारत में बदलाव चाहिए, अगर हम चाहते हैं कि हमारी समस्याएँ भी सुनी जायें तो उसके लिए हमें भी इस सिस्टम का हिस्सा बनना होगा। हाँ, हमें भी आधा हिस्सा बनना होगा।

शक्ति – ‘महिलाओं के लिए राजनीतिक शक्ति’ मंच के बारे में जाने

तारा कृष्णस्वामी द्वारा सह-स्थापित, शक्ति – ‘महिलाओं के लिए राजनीतिक शक्ति’ उन महिलाओं का एक गैर-पक्षपाती समावेशी मंच है, जो क्षेत्र, जाति, पंथ और विचारधारा की परवाह किए बिना एक साथ करने के लिए आगे आयी हैं। इसका उद्देश्य यह है कि अधिक से अधिक महिलाओं को विधायक और सांसद के रूप में चुना जा सके यानि की महिलाओं की भी राजनीती में आधी हिस्सेदारी हो। ये राजनीतिक नेतृत्व में रुचि रखने वाले समाज के सभी वर्गों की महिलाओं को शामिल करने या अन्य महिलाओं के राजनीतिक करियर को आगे बढ़ाने के लिए भी काम कर रहे हैं।

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अब हमें भी आधा हिस्सा बनना होगा

आज हम विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, लेकिन एक क्षेत्र है जहां हमने कोई प्रगति नहीं की है, वह है राज्य और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व। संसद सदस्यों में केवल 11.8% महिलाएँ शामिल हैं। और विश्व स्तर पर बात करें तो राष्ट्रीय और राज्य स्तर की राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में 192 देशों में से 153 पर भारत का स्थान है। इसमें पितृसत्तावादी समाज का बहुत बड़ा हाथ है। और इसलिए शक्ति जैसे संगठनों की हमें बहुत ज़रूरत है जो राजनितिक दलों को अधिक से अधिक महिलाओं को सीट देने के लिए जोर डालती है और वहीं महिलाओं को आगे आकर राजनीती में हिस्सा लेने के लिए बढ़ावा दे रही हैं।

मूल चित्र : YouTube

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Shagun Mangal

A strong feminist who believes in the art of weaving words. When she finds the time, she argues with patriarchal people. Her day completes with her me-time journaling and is incomplete without writing 1000 read more...

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