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समलैंगिक विवाह को विवाह अधिनियम में शामिल करने पर ज़ल्द आयेगा फैसला

Posted: अक्टूबर 15, 2020

दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक विवाह पर केंद्र की प्रतिक्रिया मांगते हुए उनके विवाह के पंजीकरण के लिए एक दिशा निर्देश की मांग की।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को, दो समान-लिंग (Same-Sex Couple)  वाले जोड़ों द्वारा अलग-अलग दलीलों पर केंद्र की प्रतिक्रिया मांगते हुए उनके विवाह के पंजीकरण के लिए एक दिशा निर्देश की मांग की। जहां एक जोड़ा विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act), 1954 के तहत शादी करना चाहता है, वहीं दूसरा विदेशी विवाह अधिनियम (Foreign Marriage Act), 1969 के तहत अमेरिका में अपनी शादी के पंजीकरण की मांग कर रहा है।

समलैंगिक विवाह पर अगली सुनवाई  8 जनवरी, 2021 को होगी

जस्टिस आरएस एंडलॉ और आशा मेनन की बेंच ने केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर कहा कि एसएमए के तहत शादी करने की मांग करने वाली दो महिलाओं द्वारा याचिका पर अपना पक्ष रखें। इसके अलावा दूसरी याचिका जिसमे दो पुरुषों ने अमेरिका में शादी की थी, लेकिन भारत में एफएमए के तहत उनकी शादी के पंजीकरण से इनकार कर दिया गया था को लकेर अदालत ने न्यूयॉर्क में केंद्र और भारत के महावाणिज्य दूतावास (Consulate General) को भी नोटिस जारी किया। बेंच दोनों मामलों की अगली सुनवाई  8 जनवरी, 2021 को करेगी। 

LGBTQIA+ के सदस्यों को विवाह अधिनियम में शामिल न करना उनके मौलिक अधिकारों के खिलाफ है

याचिकाकर्ताओं के मुख्य तर्क है कि समलैंगिक विवाह को विवाह अधिनियम में शामिल न करना उनके संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। 

दो महिलाओं, जिन्हें अरुंधति काटजू, गोविंद मनोहरन और सुरभि धर ने रिप्रेजेंट करा है, ने अपनी याचिका में कहा है कि वे 8 साल से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं, एक दूसरे के साथ जीवन के हर मोड़ को साझा कर रहे हैं, लेकिन शादी नहीं कर सकते क्योंकि वे समलैंगिक हैं। दोनों महिलाओं ने यह दलील दी कि विवाह नहीं करने देने से उन्हें कई अधिकारों से वंचित कर दिया गया है – घर खरीदना, बैंक खाता खोलना, परिवार का जीवन बीमा – जिनके लिए हेट्रो सेक्सुअल जोड़ों को तो अनुमति है।

उन्होंने आगे कहा, “शादी केवल दो व्यक्तियों के बीच का एक रिश्ता नहीं है, ये दो परिवारों को एक साथ लाता है। लेकिन यह अधिकारों का बंडल भी है। विवाह के बिना, याचिकाकर्ता कानून में अजनबी हैं। भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 किसी को भी अपनी पसंद से शादी करने का अधिकार देता है। और ये हेट्रोसेक्सुअल जोड़े की तरह ही होमोसेक्सुअल दम्पति पर भी लागु होता है।” 

LGBTQIA+ समुदाय के लिए इसका क्या मतलब है?

हालाँकि यह निर्णय किया जाना बाकी है, लेकिन केंद्र तक समलैंगिक विवाह की बात पहुंचना भी बहुत बड़ी जीत है। यहाँ लड़ाई कानूनी रूप से अपने साथी से शादी करने का अधिकार शामिल करना है। जिन अधिकारों से होमोसेक्सुअल कपल वंचित रहते आये हैं, उन्हें इस फैसले के बाद समान अधिकार मिलेंगे। और इससे एक बार फिर हम LGBTQIA++ कम्युनिटी को अपनाने के तरफ एक कदम बढ़ाएंगे।

#YesHomoVivah से लोग समलैंगिक विवाह का समर्थन जाहिर कर रहे हैं

सोशल मीडिया पर भी इस फैसले के लिए आवाज उठायी जा रही है। ट्विटर पर  #YesHomoVivah ट्रेंड कर रहा है जिसमें सेलेब्रिटीज़ से लेकर आम जनता अपना समर्थन जाहिर कर रहे हैं। भारत के लिए यह एक ऐतिहासिक फैसला होगा जिससे होमोसेक्सुअल कपल के लिए सारे अधिकारों के दरवाज़े खुल जायेंगे। अभी होमो सेक्सुअल कपल को न ही फैमिली राइट्स मिलते हैं और न ही एक दूसरे के लिए फैसले ले सकते हैं। इन सब कारणों के चलते आज भी बहुत से लोग कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। तो इंतज़ार है अब उस वक़्त का जब इन्हें भी हेट्रो सेक्सुअल दंपति के तरह सारे अधिकार और सबसे बढ़कर सम्मान मिलेगा। 

मूल चित्र : SolStock from Getty Images Signature via CanvaPro

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