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मैं अपनी मम्मी को तो नहीं बचा सकी इस मारपीट से लेकिन आज…

रोज़ रोज़ आती आवाज़ों में नेहा को अपनी माँ की सिसकियाँ दिखती और उसकी आत्मा तड़प उठती। लेकिन अब बस हो चुका था...

रोज़ रोज़ आती आवाज़ों में नेहा को अपनी माँ की सिसकियाँ दिखती और उसकी आत्मा तड़प उठती। लेकिन अब बस हो चुका था…

नोट : विमेंस वेब की घरेलु हिंसा के खिलाफ #अबबस मुहिम की कहानियों की शृंखला में पसंद की गयी एक और कहानी!

एक फैसला किया और निकल पड़ी घर से।

“उफ़! मैं तो थक गई”, सोफे पे बैठते हुए निशा ने अपने पति नविन से कहा।

“अभी तो थकने की कोई गुंजाईश नहीं है मैडम जी पूरा घर सजाना बाकी है।”

नविन की बात सुन नेहा ने चारों तरफ नज़र दौड़ाई, पूरा फ्लैट बॉक्स से भरा था। आज ही तो शिफ्ट हुए थे दोनों इस फ्लैट में; नविन का ट्रांसफर हुआ था और इंदौर से सारा सामान ट्रक से आया था।

मूवर्स वाले तो सिर्फ बड़े सामान ही सेट करते हैं छोटे तो नेहा को ही करने थे।

अगले कुछ हफ्ते नेहा को बिलकुल फुर्सत नहीं मिली। घर अच्छे से सजा के रखने का शौक भी था नेहा को और ये फ्लैट भी बहुत खूबसूरत था।

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जब फ्लैट सज संवर गया तो नेहा ने सोचा अब अपने पड़ोसियों से भी थोड़ी जान पहचान बढ़ाई जाये, तो एक छोटी सी चाय पार्टी पर आपने फ्लोर की लेडीज को बुलाने का सोचा नेहा ने।

उसी दिन अपने फ्लोर के चारों फ्लैट में निमंत्रण दे आयी। पांचवी फ्लैट का डोर बेल दो तीन बार बजाने पर दरवाजा हल्का सा खुला और एक औरत ने झांक कर देखा।

“नमस्ते! मैं नेहा आपकी नई पड़ोसन हूँ। आज शाम को एक छोटी सी पार्टी रखी है मुलाक़ात के लिये आप भी जरूर आईयेगा।”

“ठीक है!” बस छोटा सा ज़वाब दे उस औरत ने दरवाजे को बंद कर दिया। नेहा को थोड़ा अजीब सा लगा उस महिला का बर्ताव। बहुत अजीब औरत है ऐसे कौन दरवाजा बंद करता है? ये सोचते वो वापस अपने फ्लैट पे आ गई।

शाम को सभी महिलायें आयीं लेकिन वो महिला नहीं आयी; जब नेहा ने इस बात की चर्चा की तो सारी महिलायें कहने लगीं, “ये तो हमें पहले से पता था आरती नहीं आयेंगी। उनके घर में कुछ प्रॉब्लम है पति पत्नी के बीच।” लेकिन स्पष्ट रूप से किसी ने कुछ नहीं बताया तो नेहा ने भी बात को तूल नहीं दिया।

नेहा के फ्लैट की एक खिड़की आरती के बालकनी के पास थी। जब से नेहा इस घर में आयी थी अकसर आवाजे आती रहती थी; लेकिन इधर कुछ दिनों से आवाज़े ज्यादा आने लगी थी।

नेहा का ऐसा स्वाभाव ना था की दूसरों के मामलो में दखल दे या पड़ोस में ताक झांक करें; लेकिन बार बार आती आवाज़ों से उसका ध्यान चला ही जा रहा था।

मन थोड़ा बेचैन सा हो जाता एक शाम को नीचे पार्क में चली गई तो वहाँ मिसेस शर्मा मिल गई। औपचारिक बातचीत के बाद मिसेस शर्मा ने निशा को कहा, “निशा तुम नई हो इसलिए बता रही हूँ आरती से दूर ही रहना।”

“क्यों?” नेहा ने आश्चर्य से पूछा। 

“ऐसा है कि आरती और उसके पति में कुछ ख़ास बनती नहीं। हफ्ते के सातों दिन खटर पटर लगी रहती है। सारी बिल्डिंग जानती है और हम तो एक फ्लोर पे है तो सब सुनते रहते हैं।”

“तो आप सब ने कुछ किया नहीं?” नेहा ने चौंक कर पूछा।

“लो भला हम क्या कर सकते है। मियाँ बीवी के बीच की बात है हमें इससे क्या? और मेरी मानो तो तुम भी दूर ही रहना।”

नेहा ने कुछ ज़वाब नहीं दिया और वापस आ गई। रात को नविन आये तो नेहा ने सब कुछ बताया।

“देखो नेहा! अब फिर से समाज सेवा का भुत मत चढ़ा लो सिर पे; नई जगह है हम किसी को जानते भी नहीं यहाँ तो इन चक्करो से दूर ही रहो तुम।”

नविन को भी मिसेस शर्मा की भाषा बोलते देख नेहा मन मसोस के रह गई और कर भी क्या सकती थी।

रोज़ आवाज़े आती और नेहा बेचैन हो उठती। एक दो बार लिफ्ट में आरती मिली भी तो उसने निशा से ज्यादा बात नहीं की। हाँ निशा ने उसका चेहरा जरूर पढ़ लिया था। मनोविज्ञान की पढ़ाई यहाँ काम आ रही थी।

एक दोपहर आवाज़े कुछ ज्यादा ही तेज़ आ रही थी और नेहा बेचैन हो चक्कर काटने लगी। बचपन की यादों ने घेरना शुरू कर दिया जब मुक्कों और लातों से नेहा ने अपनी माँ को पीटते देखा था। आज नेहा को आरती की चीखों में अपनी माँ की चीख सुनाई दे रही थी। आरती की रोज़ रोज़ आती सिसकियों की आवाज़ों में नेहा को अपनी माँ की सिसकियाँ दिखती, नेहा की आत्मा तड़प उठती।

एक फैसला किया और निकल पड़ी घर से।

“आरती दरवाजा खोलो!” नेहा तेज़ आवाज में आरती को आवाज़े लगाने लगी और जोर जोर से दरवाजे की घंटी भी बजाने लगी।

अंदर से आवाज़े आनी बंद हो गई और पांच मिनट दरवाजा पीटने के बाद गेट खुला तब तक इस शोर गुल से पूरा फ्लोर आरती के घर के सामने इक्कठे हो गया था।

जैसी ही दरवाजा खुला, नेहा ने दरवाजे को धक्का मार घर के अंदर चली गई। अंदर ला दृश्य नेहा के रूह को कंपा दिया; मार मार के अधमरा कर दिया था आरती को उसके पति ने।

नेहा कुछ सोचती या आरती को संभालती तब तक आरती का पति आ नेहा से लड़ने लगा, “कौन हो तुम ऐसे कैसे मेरे घर में घुस आयीं? निकलो बाहर।”

गुस्से से लाल आँखों से नेहा ने उसे देखा। वो इंसान कुछ और करता तब तक पुलिस आ गई। नेहा ने पहले ही घरेलू हिंसा की ख़बर पुलिस में कर दी थी।

पुलिस आरती के पति को थाने ले गई और तुरंत आरती को हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया।

नेहा की प्रशंसा करते हुए लेडी पुलिस ऑफिस ने पूरी सोसाइटी के सामने कहा, “शर्म आनी चाहिए आप सब को। आप सब खुद को पढ़ा लिखा कहते हैं। आज अगर नेहा जी सही समय में एक्शन नहीं लेती तो एक निर्दोष लड़की घरेलु हिंसा की बलि चढ़ जाती। आपके नज़रों के सामने एक महिला पे अत्याचार होता रहा और आप सब मूक बने बैठे रहे। नेहा जी से सबक ले आप सब।”

सबने नेहा की मुक्त कंठ से सराहना की नविन अपनी पत्नी को गर्व से देख रहे थे।

“माफ़ कर दो नेहा मेरे से भी गलती हुई है।”

नेहा हंसने लगी, “कोई बात नहीं नविन देर आये दुरस्त आये। आरती ठीक है बस मुझे इस बात की तस्सल्ली है। मैं मेरी मम्मी को तो नहीं बचा सकी इन मारपीट से लेकिन आज आरती को बचा ऐसा लगा मैंने मेरी मम्मी को बचा लिया आज वो जहाँ भी होंगी ख़ुश होंगी।”

“सही कहा”, नेहा और नविन ने नेहा को गले लगा लिया। 

“मुझे गर्व है कि मैं तुम्हारा पति हूँ”, और नविन की बातों को सुन नेहा खिलखिला उठी।

मूल चित्र : Still from short film Dark Skin/Content ka Keeda, YouTube

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