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काश! मैं भी लड़की नहीं, लड़का होती…

Posted: अक्टूबर 4, 2020

हर लड़की कम से कम एक बार जरूर सोचती है, “काश! मैं भी लड़की नहीं, लड़का होती।” क्या ये इस खूबसूरत दुनिया की भयावहता को नहीं दर्शाता?

समानता के नाम का हम डंका चाहे कितना भी पीट लें। चाहे कितनी भी बातें कर लें हम अधिकारों की। हम चाहे दे दें अधिकार भी उन्हें सपने संजोने का, पढ़ने का, अपनी मंज़िल खुद ही तय करने का। या फिर हम बना दें कड़े कानून उनके सम्मान और सुरक्षा की खातिर। चाहे क्यूं ना दे दें हम उन्हें अपने ख्वाबों के पंखों से उड़ने की आजादी और इजाज़त अपनी पसंदीदा मंज़िल तक पहुंच जाने की ही। लेकिन ये सब फिर भी दुनिया की भयावह स्थिती को छुपा नहीं पाते हैं।

एक 3-4 साल की नन्हीं सी बच्ची और एक 3-4 साल के नन्हें बच्चे में नन्हीं सी बच्ची थोड़ी ज्यादा नटखट होती हैं। वो छोटी सी बच्ची थोड़ी ज्यादा शैतान, थोड़ी बातूनी सी, जिसके पास होते हैं ढेर सारे सवालों की झड़ी, जो बरबस ही बेझिझक होकर बरस पड़ते हैं किसी पर भी। लड़ पड़ती हैं कभी, तो कभी बेबाक अंदाज में छोटी सी बात पर ही लगाती हैं खूब जोर-जोर से ठहाके, कभी पूछ बैठती हैं बिना सोचे समझे, कुछ भी जो भी मन में हो उसके और वो बच्चा होता है थोड़ा कम नटखट।

लेकिन जब उसी नन्हे बच्चे और बच्ची से मिलते हैं 14-15 सालों बाद, दुनिया की समानता के रंग वहीं कहीं से आने लगते हैं नज़र। वो चंचल सी बच्ची हो जाती हैं शांत, समझदार और मर्यादित, जो शायद बेबाकी से कह नहीं पाती अपनी बात। और ठहाके बदल जाते हैं हल्की सी मुस्कुराहट में।  और वो बेबाक सवाल भी हो जाते हैं मर्यादित और सोच समझ के पूछे जाने वाले। वहीं वो नन्हा बालक हो जाता हैं बेबाक और बेझिझक।

वो लड़की ऐसे ही तो नहीं होती हैं। शांत उसे कर दिया जाता है रोक-टोक के साथ। सिखा-पढ़ा के तमीज के पाठ, हम उस बना देते हैं शांत और समझदार। और फिर खो जाती है उसकी चंचलता कहीं, और हो जाती है वो समझदार और थोड़ी खामोश।

हम कहते तो हैं ये दुनिया बहुत खूबसूरत हैं, लेकिन क्या कभी हम दुनिया भयावहता को सच में कभी पूरी तरह से नकार पाएंगे?

किसी लड़के ने अपने पूरे जीवन काल में सोचा हो या ना सोचा हो, लेकिन हर लड़की अपने पूरे जीवन काल में कम से कम एक बार जरूर सोचती है, काश! मैं भी लड़की नहीं, लड़का होती।”

ये दुनिया तब थोड़ी और भयावह सी लगती है। जब एक मासूम सी बच्ची, कोई युवती या कोई अधेड़ उम्र की महिला किसी खिड़की के कपाट पर अपना सर टिका कर, खिड़की से बाहर देखते हुए भारी मन से मौन साधे हुए विधाता से कहती हैं कि, “हे विधाता! अगले जनम में फिर लड़की ना बनूं।”

ये हर उम्र, हर वर्ग, हर जाति, हर धर्म, हर देश की महिलाओं का इस तरह से भारी मन से सोचने पर मजबूर होना क्या इस खूबसूरत दुनिया की भयावहता को नहीं दर्शाता है?

मूल चित्र : gawrav from Getty Images Signature via Canva Pro

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