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कल्पना एक प्रेम की…

Posted: अक्टूबर 7, 2020

मैं कल्पना में उसकी तस्वीर साथ रखती हूँ, चलो आज मैं तुम सब से उसकी बात करती हूँ। चलो आज मैं उसे तुम सब पहचान करती हूँ…

मैं कल्पना में उसकी तस्वीर साथ रखती हूँ,
चलो आज मैं तुम सब से उसकी बात करती हूँ।

रहता नहीं है साथ वो, पर उसे अपने दिल के पास रखती हूँ,
चलो आज मैं उसे तुम सब पहचान करती हूँ।

है लंबा कद में, आंखो में चमक उसकी दिवाकर जैसी,
देखे तो आँख पर धुंध, ना देख तो नमी इन आँखों में है उनकी।

शांत सा स्वरूप है, पहचान रखता है वह अलग,
मिलता नहीं है वह जल्दी किसी से बस रहता है वो सब विलग।

नहीं भूख है उसे नाम की, ना गम है सब खत्म हो जाने का,
जो है उसका, जितना उसका सब पर है एकाधिकार उसका।

सुबह से शाम में उसके साथ करती हूँ,
रहती हूँ दूर उसे नज़रों पर दिल में उसके राज करती हूँ।

मनमोहनी उसकी बाते, दिल को भाए उसकी बस मेरे लिए हीं शरारतें,
कब ना वो मुझे कर पाया है, जो मेरे दिल में हो

बस वो उसके दिल तक बिन कहे जाने पहुंच कैसे पाया है।

भीड़ से है रहता दूर, दुनिया से है अलग उसका वजूद,
खुद को ही हार कर वो खुद को ही जीत कई बार पाया है।

धीर है गंभीर है घमंड में नील है, होके धनवान सबसे
रहता अति सामान्य वो, कोई नहीं है जैसा उसके,
इसलिए मुझे अभी तक वो कहा यहां मिल पाया है।

गलत पर है वो तेज़ बोलता, प्रेम में वो अति धीर रखता,
सबके लिए गर्व, और अपने लिए पागल बन कर रहता

उसका है ऐसा फैशन मानो वो कहीं और का रहता।

इसलिए अभी तक मुझे कहा वो इस भीड़ में दिख पाया है।
खोजती है निगाह गर मिले ऐसा तो बताना मुझे
पता तुम्हे अपने दिल का मैंने राज आज देती हूँ।

रंजनी(आंनद) चित में बस जाएं वो बिन कहे सब वो कह जाए,
खर्च ना करू शब्द मैं अपने, आती हो उसको भी मन की भाषा
कुछ नहीं मन में मेरे ही वो बस जाए, बिन कहे मुझे समझ जाए।

इस कल्पना को मैं अत्मसद्य करती हूँ।
मिलो तुम मुझे बस अब यही ऊपर वाले से फरियाद करती हूँ।

मूल चित्र : Pexels

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