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जयश्री रायजी के, बेवफा पति को जेल की सजा दिये जाने के, प्रस्ताव का बहुत विरोध हुआ…

Posted: अक्टूबर 26, 2020

जयश्री रायजी दहेज विरोधी, बच्चों को गोद लिए जाने, महिलाओं के अवैध व्यापार रोकने और महिलाओं के तलाक संबंधी विधेयकों के लिए अधिक सक्रिय रहीं। 

सविनय अवज्ञा आंदोलन में  भाग लेने वह अपनी तीन माह की बेटी के साथ गिरफ्तार हुईं। उन्हें कहा गया अगर वह भविष्य में स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा नहीं होगीं तो उनको रिहा कर दिया जाएगा, उनका पहला दायित्व उनकी बच्ची के प्रति होना चाहिए।

हंसा मेहता की बहन – जयश्री रायजी

उन्होंने जब यह सुना तो अपनी तीन महीने की बच्ची को अपनी बहन को सौंप दिया और कहा वह क्षमा चायना नहीं करेंगी, न ही आश्वासन ही देंगी और न ही बेटी को साथ रखेंगी। बाद में पुलिस अधिक्षक ने उनको रिहा कर दिया क्योंकि पुलिस अधिक्षक को बच्ची के प्रति मां की जिम्मेदारी अधिक जरूरी लगी। उस महिला की बहन थी हंसा मेहता और वह महिला थी – जयश्री रायजी।

दर्शनशास्त्र में अपनी पढ़ाई की

बड़ौदा के दीवान सर मनुभाई मेहता की पुत्री और गुजराती महाकाव्य ‘करन घेली’ के प्रणेता नंदशंकर मेहता की पोती और हंसा मेहता की बड़ी बहन जयश्री का जन्म 26 अक्टूबर 1895 को हुआ। परिवार में प्रगतिशील और लिखने-पढ़ने का महौल होने के कारण जयश्री को भी पढ़ने का मौका मिला। वह बड़ौदा कालेज में पढ़ी जो उस वक्त बंबई विश्वविधालय से जुड़ा था। उन्होंने दर्शनशास्त्र में अपनी पढ़ाई की और विवाह के बाद बबंई आ गई एन.एम.रायजी चार्टर्ड एकाउटेंट थे। बंबई में जमने के बाद वह घर में कैद होकर नहीं रहना चाहती थी। उन्होंने स्वयं को सामाजिक कार्यों से जोड़ लिया।

वह बंबई नगर-निगम की सदस्य रहीं

शिक्षा और रोजगार के माध्यम से महिलाओं के उत्थान के लिए वह मुख्य रूप से सक्रिय रहीं, विशेषकर हरिजन समुदाय के महिलाओं के प्रति। वह बंबई नगर-निगम की सदस्य भी रहीं । 1930 में उन्होंने स्वयं को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ लिया और महात्मा गांधी के साथ आंदोलन में सक्रिय हो गईं। भारत छोड़ों आंदोलन में जब शीर्ष के नेताओं की गिरफ्तारी हो चुकी थी तब आंदोलन को फिर से पुर्नजीवित करने के उद्देश्य से उन्होंने  9 सितंबर 1942 को एक विशाल जुलूस का नेतृत्व किया और फिर गिरफ्तार कर ली गईं। छह महिने की सजा के बाद वह जेल से रिहा हुईं।

वह समाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थीं राजनीतिज्ञ नहीं

जयश्री एक समाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थीं राजनीतिज्ञ नहीं। पर आजादी मिलने के बाद कांग्रेस ने उनको  प्रथम लोकसभा-निर्वाचन में अपना टिकट दे दिया। उन्हें उत्तर-बबंई से एक अत्यंत शक्तिशाली उम्मीदवार कमला देवी चट्टोपाध्याय का सामना करना पड़ा। दोनों एक-दूसरे की मित्र भी थीं। दोनों ने एक साथ सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियां की थी। उन्होंने कांग्रेस आलाकमान को मना भी किया पर उनकी चली नहीं।

कमला देवी अखिल भारतीय स्तर की नेता थीं। पर चुनाव परिणाम ने उनको भी चौंका दिया वह देवी को 12000 मतों से हराने में कामयाब हो गईं। उनकी सादगी और समान्य रूप से जीवन जीना लोगों को अधिक पसंद आया।

संसद में वह महिलाओं और बच्चों के कल्याण से सबंधित विषयों पर अधिक मुखर रहीं। दहेज विरोधी विधेयक, बच्चों को गोद लिए जाने के विधेयक, महिलाओं के अवैध व्यापार को रोकने और महिलाओं के तलाक संबंधी विधेयक के लिए अधिक सक्रिय रहीं।

उनके उस विधेयक का काफी विरोध हुआ जिसमें बेवफा पति को जेल की सजा दिये जाने का प्रस्ताव किया। जब हिंदू-विधि के संहिताकरण संबंधी विधेयक पर बहस हो रही थीं तब वह संसद की सदस्य नहीं थीं  परंतु विधिक महिला संगठनों की प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने उन चर्चाओं में सक्रिय भाग लिया तथा तलाक एवं उत्तराधिकार से संबंधित महिला-अधिकारों के विषय पर महत्वपूर्ण योगदान दिया।

लोकसभा में अपना कार्यकाल पूरा होने पर जयश्री पुन: चुनाव में भाग नहीं लिया और समाजिक कार्य में लौट आई। 1980  में 85 साल के उम्र में उन्होंने बलसाड़ क्षेत्र के उडवाड़ा में 90  गांव को गोद लेकर एक नयी परियोजना शुरू की। इस परियोजना को यूनीसेफ ने भी मान्यता प्रदान की जिसमें 600 आदिवासी लड़कियों को शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदान किया।

महिला और बच्चों के कल्याण के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें जानकी देवी पुरस्कार भी मिला। वह अपनी परियोजना से लाभान्वित आदिवासी लड़कियों को मिले लाभ को देखने के लिए जीवित नहीं रह सकी। 28 अगस्त 1985 को वह शांतिपूर्ण चिरनिंद्रा में लीन हो गई।

बलसाड़ क्षेत्र के लोग आज भी जयश्री रायजी को उनकी सादगी और उनकी भद्रता के लिए याद करते है। भद्रता ही उनकी शक्ति थी जो कई लोगों के दिल में उनकी याद में बसती है।

 नोट- जयश्री के बारे में जानकारी Women Pioneers in India’s Renaissance किताब से जुटाई गई है जिसको Sushila Nayar, Kamla Mankekar लिखा है।

मूल चित्र : Google 

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