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मेरी कहानी में जिसे होना चाहिए था, बस वही नहीं था…

Posted: अक्टूबर 26, 2020

माँ ने जो सिखाया था वह वही करने की कोशिश करती लेकिन तब भी हर रोज कोई न कोई कमी निकल ही जाती और पति से भी हर रोज उसकी शिकायत होती।

नोट : विमेंस वेब की घरेलु हिंसा के खिलाफ #अबबस मुहिम के चलते हमने आपसे अप्रकाशित कहानियां मांगी थीं, उसी श्रृंखला की चुनिंदा कहानियों में से पहली कहानी है आँचल आशीष की!

मेरी कहानी; मेरी कहानी तब शुरू नहीं हुई जब मेरा जन्म हुआ। मेरी कहानी काफी पहले शुरू हो गई थी। शायद मेरी कहानी तब शुरू हुई जब पहली बार किसी स्त्री ने यह मान लिया था कि वह सचमुच ही उपेक्षा की पात्र है। या शायद मेरी कहानी तब शुरू हुई जब पहली बार किसी पुरुष ने किसी स्त्री का भावनात्मक और शारीरिक शोषण किया और वह चुप रह गई थी।

मेरी कहानी तब शुरू हुई होगी जब किसी स्त्री ने पहली बार अपने ऊपर हुए अत्याचार के विरूद्ध आवाज़ तो उठाई थी लेकिन किसी ने उसका साथ नहीं दिया। मेरी कहानी तब शुरू हो गई होगी जब समाज ने एक अच्छी बेटी, अच्छी पत्नी, अच्छी बहू, अच्छी माँ होने के मापदंड तय किए। मेरी कहानी तब शुरू हुई होगी जब स्त्रियों ने समाज के बनाए मापदंडों पर खड़ा उतरना शुरू कर दिया होगा। मेरी कहानी तब शुरू हो गई होगी जब समाज में उन स्त्रियों कि भर्त्सना शुरू हो गई थी जो समाज के बनाए मापदंडों को सिरे से नकार देती थीं।

मैं और मेरी कहानी समाज के अलग-अलग समुदाय, अलग-अलग वर्गों में चलती रहती है। मैं ऐसी ही कई कहानियां हूँ जहां मैं होती हूँ, वहां शोषक होता है और शोषित हुई स्त्रियां होती हैं, नहीं होता तो कोई शोषित स्त्रियों का साथ देने वाला।

आज एक ही परिवार के कई स्त्रियों की कहानी बताना चाहूंगी जिसकी मैं साक्षी हूँ। मैं अपना परिचय तो देना ही भूल गई, मैं घरेलू हिंसा हूँ और मैं पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती हूँ क्योंकि कई स्त्रियों को पता ही नहीं होता कि वो घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं और वे अनजाने में ही अपनी आने वाली पीढ़ी की स्त्रियों को उसका शिकार बना रही होती हैं।

कई पुरुष जिनकी परवरिश घरेलू हिंसा वाले परिवेश में होती है वे आगे अपने घर में अपनी पत्नी अथवा बेटी, बहुओं के साथ वही सब दोहराते हैं। उनके हिसाब से बिल्कुल भी गलत नहीं होता क्योंकि उन्होंने अपने घर में इसका विरोध करते हुए किसी को नहीं देखा। कई स्त्री और पुरुष को तो यह तक पता नहीं होता कि घरेलू हिंसा सिर्फ शारीरिक ही नहीं भावनात्मक भी होती है। और ऐसी स्त्रियां आजीवन शोषित होती रहती हैं और ऐसे पुरुष अनजाने में ही शोषण करते रहते हैं।

राधिका जी ने जब अपने बड़े बेटे की शादी की तो वह बेहद खुश थीं। ना जाने कितनी ही बार उन्होंने अपनी रूपवती बहू की बलैया ली थी लेकिन गुजरते हुए समय के साथ उन्हें अपनी बहु में हजारों कमियां नजर आने लगी। राधिका जी की बहू सुबह सवेरे से अपने काम में लग जाती, सुबह की चाय उसके ससुर जी को ठीक छ: बजे चाहिए होती थी।

अब तक तो राधिका जी यह काम करती आईं थी लेकिन अब बहू के घर आ जाने के बाद से वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गईं थीं। अब वह बस बैठे-बैठे घड़ी देखती रहतीं, छ: से छ: बजकर दस मिनट हो जाते तो वह शुरू हो जाती क्योंकि उन्होंने अपनी सास को यही करते देखा था। उन्हें लगता कि उन्होंने तो फिर भी अपनी बहू को मिक्सर ग्राइंडर दे रखा है मसाला पीसने के लिए, कपड़े धोने के लिए भी मशीन है और तो और अब तो पानी भी चौबीसों घंटे आता है।

इतनी सुख सुविधा से रख रखी है बहू को, उस पर जब चाहे तब टी. वी देख सकती है। उन्हें तो वक्त ही कहां मिलता था अपने लिए। सिलबट्टे पर मसाला पिसती, कपड़े भी हाथ से ही धोने थे उसपर बड़ा सा परिवार, सबकी अलग-अलग फरमाइशें और हमारे टाइम तो बर्तन मांजने वाली भी नहीं थी।

उधर बहू बेचारी सारा दिन काम में लगी रहती। उसने अपनी माँ और भाभी को यही सब करते देखा था। माँ ने भी सीखा कर भेजा था, “चाहे जैसे भी हो सास-ससुर को खुश रखना।” बहू की माँ ने जो सिखाया था वह वही करने की कोशिश करती लेकिन सास थी कि हर रोज कोई न कोई कमी निकाल ही देती और अपने बेटे से भी हर रोज बहू की शिकायत करती। धीरे-धीरे बहू जो हंसती – खिलखिलाती रहती, उदास रहने लगी।

बेटे और बहू के रिश्ते पर भी इन बातों का असर पड़ने लगा। राधिका जी की बेटी राशि जो यह सब देख सुन रही थी उसे भी लगता कि भाभी के साथ जो भी हो रहा है ठीक हो रहा है। राधिका जी ने जब राशि की शादी की तो उसके ससुराल का माहौल उसके मायके के माहौल से बिल्कुल ही विपरीत था।

राशि की सास किसी एन.जी.ओ में काम करती थीं जो महिलाओं के ऊपर हुए शारीरिक और भावनात्मक घरेलू हिंसा के खिलाफ कैंपेन चला रहा था और राशि की सास इस कैंपेन का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। इस दौरान राशि ने बहुत कुछ जाना घरेलू हिंसा के बारे में। उसने अपने घर आई घरेलू हिंसा कि शिकार औरतों को बड़े ही पास से देखा और जाना कि सिर्फ हाथ उठाना ही घरेलू हिंसा नहीं है बल्कि किसी को भावनात्मक रूप से परेशान करना भी घरेलू हिंसा ही होती है। तब उसे अहसास हुआ कि आज तक जो उसकी भाभी के साथ होता आया है अनजाने में ही सही, वह भी घरेलू हिंसा ही है।

राशि को अहसास हुआ कि ज्यादातर घरों में औरतें सिर्फ इसलिए घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं क्योंकि एक औरत ही दूसरी औरत को समझ नहीं पाती हैं। अगर सभी औरतें एक दूसरे का साथ दें तो शायद कुछ हद तक इस वक्त आधी आबादी की इस समस्या से निजात पाया जा सकता है।

कहते हैं एक औरत को शिक्षित कर दो तो पूरा परिवार शिक्षित हो जाता है। जरूरत है सभी औरतों को उनके अधिकारों की जानकारी देने की। जरूरत है हर औरत को ‘ना’ कहना सीखने की, जरूरत है औरत को विरोध करना सीखने की। अगर स्त्रियां अपने अधिकार, उनके खुद के साथ पुरुष को कैसे पेश आना है जान लेंगी तो उनकी अगली पीढ़ी उनके दिए परवरिश से और बेहतर तैयार होंगी।

उनके बेटे यह सीखेंगे कि एक स्त्री के साथ उन्हें कैसे पेश आना है और बेटियां जानेंगी कि उनके साथ पुरुषों को कैसे पेश आना चाहिए। जब स्त्रियां खुद घरेलू हिंसा का विरोध करेंगी, तभी कोई भी उनकी मदद कर पाएगा तभी आने वाली पीढ़ी इस पीढ़ी से बेहतर होगी, तभी यह कहानी खत्म होगी नहीं तो यह कहानी निरंतर चलती रहेगी और मैं, मैं… मेरा अस्तित्व शायद कभी समाप्त नहीं हो पाएगा।

मूल चित्र : maura_grigollo from Getty Images Signature via Canva Pro

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