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अब घरेलु हिंसा से पीड़ित पत्नी को होगा ससुराल की संपत्ति में रहने का अधिकार!

Posted: अक्टूबर 16, 2020

कोर्ट ने यह साफ़ किया है कि पत्नी का न सिर्फ अपने पति की संपत्ति पर अधिकार है, परन्तु ससुराल की संपत्ति और साझा संपत्ति पर भी उसका अधिकार है। 

2005 के घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम की विस्ताररपूर्वक चर्चा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरूवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इस फैसले में 2006 के अपने ही एक पुराने फैसले को बदलते हुए कोर्ट ने यह कहा है कि बहु को सास ससुर के घर में रहने का अधिकार है

तरुण बत्रा केस के में है यह फैसला लिया गया था कि घरेलु हिंसा अधिनियम के तहत महिला को अपने पति की संपत्ति पर अधिकार है अपने ससुराल वालों की या फिर साझा संपत्ति पर उसका कोई अधिकार नहीं है।

एक बहुत ही प्रगतिशील फैसले में कोर्ट ने यह साफ़ किया है कि पत्नी का न सिर्फ अपने पति की संपत्ति पर अधिकार है परन्तु ससुराल की संपत्ति और साझा संपत्ति पर भी उसका अधिकार है। अतः घरेलु हिंसा अधिनियम को विस्तार करते हुए यह कहा गया है कि बहु को सास ससुर के घर में रहने का अधिकार है।

भारत में घरेलु हिंसा

कोर्ट ने फैसला सुनते हुए कहा कि एक समाज की प्रगति उसकी महिलाओं की प्रगति पर निर्भर करती है और संविधान में महिलाओं और पुरुषों को सामान अधिकार देना उस प्रगति की शुरुआत थी। यह फैसला बहुत ही सराहनीय है और महिला अधिकारों को बढ़ावा देता है।

भारत में घरेलु हिंसा का बहुत ज्यादा फैलाव है। यह जुर्म समाज में इतना गहरा बैठा हुआ है कि कई लोग तो इसे जुर्म भी नहीं मानते। 2005 में घरेलु हिंसा अधिनियम आने से मामलों में बेहतरी आयी है परन्तु आज भी बहुत से महिलाएँ घरेलु हिंसा का शिकार बनती हैं। अधिनियम आने के बाद भी बहुत से जगह सामाजिक विचारधारा में बदलाव न आने के कारण महिलाओं पर ज़्यादती होती रहती है।

घरेलु हिंसा के कारण

घरेलु हिंसा का घर में हो रही हिंसा। किस्सों और कहानियों में अक्सर हम पढ़ते हैं घर का मर्द दारु पीकर आता है और अपनी पत्नी के साथ मार पीट करता है। टीवी पर कई धारावाहिकों में भी इस मुद्दे को उठाया गया है। इस हिंसा का एकमात्र कारण है सत्ता थोपना। हिंसा के सहारे औरत को यह याद दिलाया जाता है कि वह मर्द से कमतर है और पुरुष का उस पर स्वामित्व है। अपना वर्चस्व और अभिमान पुष्ट करने के लिए पुरुष हिंसा का माध्यम अपनाते हैं और महिलाओं को अपनी बात मनवाने के लिए डराते-धमकाते हैं।

क्या अधिनियम से हुआ बदलाव?

घरेलु हिंसा अधिनियम से कुछ बदलाव अवश्य आया है, परन्तु आज भी घरेलु हिंसा के किस्से कई पढ़े-लिखे घरों में भी देखे जाते हैं। इसका मुख्य कारण है महिलाओं को अपनी जायदाद समझना और उस पर रौब चलाने की कोशिश करना। महिलाओं की आर्थिक परतंत्रता के कारण आज भी बहुत सी महिलाएँ घरेलु हिंसा का शिकार होने के बाद भी उसके खिलाफ अपनी आवाज़ नहीं उठाती। हमारे सामाजिक परिवेश में पति परमेश्वर होता है और ऐसे में पति के किसी भी करणी पर सवाल उठाना नामुमकिन है। साथ ही साथ पति पर आर्थिक रूप से निर्भर होने के कारण पत्नियाँ इसकी शिकायत नहीं लिखवाती।

फैसले से आएगा सुधार

सामाजिक और आर्थिक कारणों से महिलाएँ जब रिपोर्ट नहीं लिखवाती तो पुरुष उनपर अत्याचार करते रहते हैं। हमारे समाज का लड़कियों को पराया धन मानने के कारण मायके के दरवाज़े भी शादी के बाद बंद हो जाते हैं। ऐसे में चुप-चाप सहन करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं होता। इस फैसले के अंतर्गत महिला को केवल अपने पति की संपत्ति पर ही नहीं अपितु अपने ससुराल की संपत्ति पर भी अधिकार है। इससे महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा मिल सकती है और वह गलत के खिलाफ आवाज़ उठा सकती हैं।

फैसले में महिलाओं के उत्थान लिए सकारात्मक उठाते हुए कोर्ट ने कहा कि महिला का अपने सास ससुर की सम्पति, साझा संपत्ति अथवा ऐसी कोई भी संपत्ति जहाँ वो अकेली अथवा अपने पति के साथ रहती हों या रह चुकी हैं, उसपे पूरा अधिकार है। ऐसी संपत्ति से घरेलु हिंसा अधिनियम के तहत उसे निकला नहीं जा सकता। कोर्ट के इस फैसले का सभी सामाजिक संस्थाओं ने खुले दिल से समर्थन किया है और कहा है कि यह घरेलु हिंसा के खिलाफ महिलओं की आवाज़ बुलंद करेगा।

मूल चित्र : Canva Pro 

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