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‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ में माँ- बेटी का एक संवाद आज मुझे बहुत ख़ास लगा!

Posted: अक्टूबर 22, 2020

हाल ही में सुपरहिट फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ ने 25 साल पूरे किये और कहते हैं ना कि फिल्में समाज का आईना होती हैं, तो इसमें भी इसी समाज का सच है।

हाल ही में सुपरहिट फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ ने 25 साल पूरे किये। मराठा मंदिर में अभी तक लगी हुई इस फिल्म ने सबसे लम्बी चलने वाली फिल्म का रिकॉर्ड बनाया है। यह फिल्म राज और सिमरन की प्रेम कहानी है जिसमें बहुत से मुश्किलों के बाद दिलवाले दुल्हनिया ले ही जाते हैं। इस फिल्म की टैगलाइन है कम फॉल इन लव और इस लाइन से जैसे सब पर जादू ही कर दिया। सभी लड़कियाँ अपने राज का इंतज़ार करने लगी और प्यार के सपने देखने लगी।

1990 के दशक में पैदा होने के कारण मैंने भी यह फिल्म देखी और मुझे भी ये फिल्म खूब पसंद आयी। इसके गाने और वो जादुई प्यार का एहसास कुछ अलग सा लगता था। तब तक न तो इतनी समझ थी, न ही फ़िल्मों को लैंगिक दृष्टि से देखने की कोई ट्रेनिंग थी। इसलिए जब आखिरी सीन में अमरीश पुरी काजोल को कहते हैं ‘जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िन्दगी’ तो लगा बस सब ठीक ही है क्योंकि नायक और नायिका एक साथ हैं।

फिल्म में कुछ तो गड़बड़ है

मैं इस फिल्म की बहुत सालों तक दीवानी रही। शायद अभी भी हूँ पर कुछ हिस्सा इस फिल्म में दिखाई गयी पितृसत्ता को मानता ही नहीं और उससे नाराज़ भी है। दिल्ली में फेमिनिज्म और लिंग पर बड़ी बड़ी शिक्षाविदों को पढ़ने के बाद यह समझ आया कि कैसे हर फिल्म और सीरियल में पितृसत्ता है और किस तरह से समाजीकरण की मदद से हमें उस पितृसत्ता को अच्छा मनवाया जाता है।

लैंगिक दृष्टि से फिल्म को देखा तो काजोल और उनकी माँ के बीच हुआ एक संवाद मुझे बहुत ख़ास लगा।

एक संवाद में छुपा सारा सच

फिल्म का काजोल और फरीदा जलाल का एक संवाद होता है जिसमें माँ अपनी बेटी को बताती है कि कैसे यह समाज लड़की और लड़की के बीच फर्क करता है और कैसे लड़कियों को हर मोड़ पर कुर्बानी देनी होती है जलाल कहती है कि जब उन्होंने सिमरन को पहली बार गोद में लिया था तब उन्होंने खुद से यह वादा कर लिया था कि उनकी बेटी माँ, बीवी और बहन बनकर कोई क़ुरबानी नहीं देगी और वो अपनी ज़िन्दगी अपनी मर्ज़ी से जीएगी। आगे दुःख के साथ वो कहती हैं कि वो गलत थी क्योंकि औरत को तो वादा करने का भी हक़ नहीं होता और वो तो सिर्फ मर्द के लिए क़ुरबानी देने के लिए पैदा होती हैं।

‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ फिल्म में पितृसत्ता

इस संवाद में इस फिल्म और हमारे समाज की सच्चाई छुपी है। पूरी फिल्म में सिमरन की इच्छा और पसंद का कदम-कदम पर गला घोटा जाता है। यहाँ तक कि एक यूरोप की ट्रिप के लिए भी उसे अपने पिता से मिन्नतें करनी होती है। उसकी शादी एक अनजान युवक से बिना उसकी मर्ज़ी के तय कर दी जाती है।

इतना ही नहीं, जब अंत में वह राज से शादी करने की इच्छा जताती है तब राज और उसके मंगेतर में उसके लिए लड़ाई हो जाती है। मानों जैसे दोनों किसी वस्तु को पाने के लिए लड़ रहे हों। कोई उसकी इच्छा न तो पूछता है और न ही उसको पूरा करता है। अंत में जब उसे अपनी पिताजी से अपने प्रेमी के साथ जाने की अनुमति मिलती तो उसके पीछे भी उसके पिताजी की संतुष्टि होती है उसकी इच्छा नहीं।

क्या औरत के पास अपने फैसले लेने की एजेंसी भी नहीं है?

यह पूरी फिल्म हमारे समाज का एक आइना है कि कैसे लड़की को एक निष्क्रिय वस्तु की तरह देखा जाता है जिसके सारे फैसले उसके पिता/पति या भाई लेगा। फिल्म में प्यार को एक ऐसी ताकत के रूप में दिखाया गया है जो सभी मुश्किलों को पार कर सकता है। परन्तु फिल्म में एक लड़की की इच्छा और उसकी एजेंसी और सत्ता को पूरी तरह से गौण कर दिया है और इस पर किसी ने आपत्ति भी नहीं जताई है। क्योंकि प्यार के जादू से इस सत्य को ढक दिया गया है।

हमारे समाज की भी यह ही सच्चाई कि औरत को तो वादा करने का भी हक़ नहीं है। उसकी ज़िन्दगी, उसके फैसले और उसके वादे मर्दों पर टिके होते हैं। पहले पिता पर, फिर पति पर और फिर बेटे पर। समाज में औरत अपने आप में कुछ नहीं सिर्फ पुरुष की सहायक है जिसे पुरुष के लिए और ज़िन्दगी के लिए बनाया गया है। इसी सोच के साथ हमारा समाज चलता है और कहते हैं ना कि फिल्में समाज का आईना होती हैं, तो दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे भी इस समाज का सच है।

क्या ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ के 25 साल में कुछ बदला है?

फिल्म के 25 साल के बाद भी आज राज और सिमरन की प्रेम कहानी सबके दिलों में छपी हुई है और सभी इस फिल्म को पसंद भी करते हैं। पसंद करने में कोई बुराई नहीं है पर बुराई है फिल्म की हर बात को सच और सही मानने में।

फिल्म को 25 साल बीत गए हैं और हमारा समाज और हमारी फिल्में भी 25 साल में बहुत आगे बढ़ी हैं। आज कल फिल्मों में नायिकाओं को मेन रोल दिए जा रहे हैं पर फिर भी फ़िल्मी दुनिया में और हमारे समाज में लैंगिक असामनता जारी है।

आज हमें ज़रुरत है एक ऐसे समाज की रचना करने के कि जहाँ कोई दिलवाला या दिलवाली दूल्हे या दुल्हन को वस्तु समझकर ले जाने का प्रयास न करें बल्कि सबकी सहमति से सबको बराबर मान कर दोनों एक साथ चलने का वादा करें।

मूल चित्र : Still from the film Dilwale Dulhaniya Le Jayenge 

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Political Science Research Scholar. Doesn't believe in binaries and essentialism.

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