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और उसकी ये लड़ाई अपनी बेटी के लिए थी…

Posted: अक्टूबर 27, 2020

वह इस बात का अनुभव कर चुकी थी कि एक औरत, चाहे वो जो भी हो, किसी की पत्नी हो, बहु हो या माँ हो, हर रूप में उसका शिक्षित होना बहुत ज़रूरी है।

आज घर में सुबह से ही कोलाहल का माहोल था और इसकी वजह से दीपा को उसकी माँ स्कूल भेजना चाहती है।

दीपा के घरवाले यहाँ तक की उसके पापा भी उसके माध्यमिक स्कूल जाने के ख़िलाफ़ है। उन सब का कहना है कि दीपा को कौन सी नौकरी करनी है और क्या उसे अपने पैसों से घर चलाना है या आर्थिक मदद करनी है जो उसे स्कूल जाना है।

लेकिन दीपा की माँ इस बात पर अड़ी हुई थी कि वो दीपा को स्कूल भेजकर ही रहेगी।

आज तक नदी की तरह शांत रहने वाली सरिता ने सुनामी का रूप ले लिया था क्योंकि वो अपने जीवन में इस बात को अनुभव कर चुकी थी कि एक औरत, चाहे वो किसी भी रूप में हो, किसी की  पत्नी हो, बहु हो या माँ हो हर रूप में उसका शिक्षित होना बहुत ज़रूरी है। तभी वो अपनों का सुख दुःख में हर तरह से साथ दे सकती है।

अभी पिछले वर्ष की ही बात ले लो, उसकी अम्मा जी (सास) की बहुत तबियत ख़राब हो गयी थी। (उन्हें शुगर और बी पी की बीमारी है।) सरिता ने दवाई तक नहीं ढूँढ पायी थी अम्मा जी की। क्योंकि दवा का डिब्बा गिर जाने के कारण सारी दवाइयाँ मिक्स हो गयी थीं। वैसे तो सुरेश सारी दवाइयाँ अलग-अलग रखता था।

परसों ही उसके मायके से चिट्ठी आयी थी। लेकिन वो उसे पढ़ने में असमर्थ थी। बिटिया के स्कूल से आने का इंतज़ार कर रही थी कि कब वो आए और चिट्ठी पढ़ कर सुना दे। कहीं जाना हो तो भी किसी ना किसी का सहारा चाहिए था।

ये तो कुछ पल है जो यहाँ साँझा किए गए हैं। ऐसे ही अनगिनत रोज़ रोज़ उसके जीवन में सिर्फ़ पढ़े लिखे ना होने के कारण छोटी छोटी बातें बड़ी बड़ी चुनौतियों के रूप में सामने ज़ाया करती थी।

एक शिक्षा की वजह से वो चाह कर भी सबका ध्यान पूरी तरह नहीं रख पाती थी

इन मुश्किलातों के चलते ही उसने दिया (उसकी बेटी) के पैदा होने पर ही प्रण कर लिया था कि दिया को अच्छे से पढ़ा लिखकर ही उसका ब्याह करेगी। इसलिए आज वो ज़िद पर अड़ गयी थी। बात बहुत बिगड़ने पर पंचों को बुलाया गया।

तब सरिता ने अपनी आप बीती को सबके सामने रखा,किस तरह हम बिना पढ़े-लिखी औरतें रोज़ ही बड़ी बड़ी चुनौतियों से जूझती हैं। पढ़ाई लिखाई का मतलब सिर्फ़ आर्थिक मदद तक ही सीमित नहीं है। घर की औरत अगर पढ़ी लिखी होगी तो वो आपके आगे की पीढ़ी को भी सही मार्गदर्शन दे पाएगी और आजकल हमें घर में रहते हुए भी पढ़ाई की उतनी ही ज़रूरत है जितना की बाहर पैसे कमाने के लिए।”

सबने उसकी बातें सुनीगाँव की सारी औरतें जो रोज़ रोज़ ना जाने कितनी चुनौतियों का सामना कर रही थीं। ये बात उन सब के मन की भी थी जो कहना तो चाहती थी पर डर की वजह से कह नहीं पा रही थीं। आज सरिता के माध्यम से उन्हें भी अपनी बात कहने का मौक़ा मिल गया था।

पंच अभी परामर्श कर ही रहे थे कि गाँव की सारी औरतें एक स्वर में ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगीं, “हमारी बेटियों को भी शिक्षा का अधिकार चाहिए। सरिता अकेली नहीं है हम सब उसके साथ हैं। आज इस बात का फ़ैसला होकर ही रहेगा नहीं तो हम आज से चूल्हा चौका सब बंद कर देंगे जब तक आप लोग हमारी बेटियों को शिक्षा का अधिकार नहीं देते।

ऐसा मंजर देखकर गाँव के पुरुषों सहित पंच भी दंग रह गए। नारी का ये दुर्गा रूप देखकर उन्हें समझ गया था कि आज फ़ैसला उनके हक़ में ही करना पड़ेगा नहीं तो ये इंक़लाब का रूप ले लेगा।

और तभी पंचों ने सबको शांत करते हुए अपना फ़ैसला सुना दिया, “आज से सभी लड़कियों का स्कूल जाना अनिवार्य होगा। शिक्षा का अवसर बेटियों को भी बेटों की तरह ही दिया जाएगा।”

वर्षों से चली रही रूढ़िवादी परम्परा ने आज दम तोड़ दिया था। चारों तरफ़ हर्ष उल्लास का माहौल गया था। किसी भी ग़लत रूढ़िवादी परम्परा के लिए हमें एकजुट होना होगा तभी इस समाज में बदलाव आएगा।

मूल चित्र : Deepak Sethi from Getty Images Signature via CanvaPro 

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