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यहाँ औरत की गलती में छुपते हैं गुनाह कई…

हमारा समाज औरतों के खिलाफ हुई हर हिंसा में औरत की गलती ढूंढ ही लेता है, फिर वो चाहे उसके कपड़े हो, उसका काम या उसका रात के समय बाहर जाना।

हमारा समाज औरतों के खिलाफ हुई हर हिंसा में औरत की गलती ढूंढ ही लेता है, फिर वो चाहे उसके कपड़े हो, उसका काम या उसका रात के समय बाहर जाना।

गैंगरेप के कई केस ने पूरे देश को अपनी दरिंदगी से झकझोर कर रख दिया है। सभी उन दरिंदों की निंदा कर रहे हैं, प्रशासन की असंवेदनशीलता पर उँगलियाँ उठा रहे है और महिला सुरक्षा पर नयी बेहेस छिड़ चुकी है।

2012 में हुए निर्भया काण्ड के बाद सारे देश की जनता सड़कों पर उतर आयी थी, कहीं धरने, कहीं सरकार के खिलाफ आंदोलन और कहीं कुछ और। ऐसा लग रहा था मानो देश की जनता निर्भया को इन्साफ दिलवाकर ही मानेगी। इस आंदोलन के बाद कई बदलाव भी आये, फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाये गए और भी कई नियम बनाये गए। आखिर 8 साल के लम्बे इंतज़ार के बाद, आरोपियों को फाँसी भी दे दे गयी। पर या इस सब के बाद भी आज हमारे देश में महिलाएं सुरक्षित है ? हाथरस में हुई अमानवीय घटना ने यह साबित कर दिया है की इस देश में महिलाएं तब भी असुरक्षित थीं और आज भी असुरक्षित हैं।

कौन असुरक्षित है?

सवाल ये है कि क्या महिलाएं असुरक्षित हैं? मेरा मानना है कि महिलाओं इसलिए असुरक्षित हैं क्यूँकि ये समाज असुरक्षित है। वह समाज जो कदम कदम पर महिलाओं पर पाबंदियाँ लगत है, वह समाज जो हर एक काम में नारी के साथ भेदभाव करता है, वह समाज जिसे नारी के आगे बढ़ने से , अपने पंख फ़ैलाने से और नयी उचाईयों को छूने से डर लगता है, वह समाज असुरक्षित है।

समाज की व्यवस्था का ख्याल रखने वाले असुरक्षित हैं

सालों से चली आ रही समाज व्यवस्था जो नारी को दबाकर, उसका शोषण कर और उसे कमतर समझकर अपना वर्चस्व कायम जमाये हुए थी, आज वो धीरे-धीरे टूट रही है, बिखर रही है और उसकी कमियाँ उजागर हो रही हैं। इस खतरे में पड़ी सामाजिक व्यवस्था को ठीक करने के लिए बहुत से समाजसेवी दिन रात मेहनत करते हैं। ये समाज के ठेकेदार अपने वर्चस्व को खोने से इतना डरते है की उसको कायम रखने के लिए अमानवीयता की सारी हदें लांघ जाते है।

उनका साथ देने वाले असुरक्षित हैं

इनका साथ देने के लिए बहुत से लोग मदद को तैयार रहते हैं। और ऐसे लोग व्यवस्था को पुनः स्थापित करने के लिए अनेकों उपाय बताते है, जिससे लड़कियाँ काबू में रह, जैसे, जीन्स न पहनना, चाऊमीन न खाना, मोबाइल फ़ोन न इस्तेमाल करना आदि।

और इसमें मीडिया का योगदान

इस बिगड़ी हुई सामाजिक व्यवस्था को फिर से दुरुस्त करने में मीडिया भी अपना योगदान देती है। रेप, शोषण आदि पुरुषों द्वारा किये गए अपराधों को इस तरीके से पेश किया जाता है जैसे उसमें उनका कोई कसूर नहीं था। हमारे सारे आँकड़े, सारे रिकार्ड्स कभी ये नहीं बताते की कितने पुरुषों ने घटिया अपराध किये, बल्कि ये बताते हैं कि कितनी महिलाएं इनका शिकार बनीं। जैसे – हम कभी ये नहीं बोलते कि हर साल इतने पुरुषों ने बलात्कार किया बल्कि हम ये कहते हैं कि इस साल इतनी महिलाओं का बलात्कार हुआ।

महिलाओं के प्रति हिंसा : नारीवाद का मुद्दा?

इस सब से यह सिद्ध होता है कि यह महिलाओं का मुद्दा है, जबकि देखा जाए तो यह पुरुषों का मुद्दा है, समाज का मुद्दा है। ये एक संकुचित समाज और उसके भयाक्रांत पुरुष का मुद्दा है, जो महिलाओं की प्रगति से असहज हो जाता है, घबरा जाता है और अपना स्वामित्व वापस पाने की हरसंभव कोशिश करता है। हाथरस में हुए सामूहिक बलात्कार से भी यही परिलक्षित होता है की एक तथाकथित उच्च जाति का पुरुष किस तरह अपने वर्चस्व को एक तथाकथित निम्न जाति की लड़की पर थोपता है

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हमारा समाज औरतों के खिलाफ हुई हर हिंसा में औरत की गलती ढूंढ ही लेता है, फिर वो उसके कपड़े हो, उसका काम या उसका रात के समय बाहर जाना।

औरत की गलती ढूंढ ही लेते हैं

जैसी ही कोई अमानवीय घटना उजागर होती है, देश में उसको प्रति हंगामा होने लगता है, तो कोई ना कोई आके उस पूरे घटनाक्रम में औरत की गलती ढूंढ ही लेता है जिससे अपराधी बरी हो जाता है। हाल में हुए हाथरस गैंगरेप केस के बाद भी मारकंडे काटजू ने एक आपत्तिजनक बयान दिया जिसमें उन्होंने बेरोज़गरी को रेप का जिम्मेदारी ठहराया है और पुरुषों को बड़े सहजता से निर्दोषी मान लिया है।

समाज औरतों को कभी सामान दर्जा नहीं देता, वह उन्हें हमेशा एक वस्तु मानता है जिसपे हुक्म चलाया जा सके। हर औरत जो पुरुष की दरिंदगी का शिकार बनती है वह वास्तव में उनके प्रभुता दिखाने का शिकार बनती है। फिर वो चाहे पति द्वारा पत्नी के साथ की गई ज़बरदस्ती हो या जान  पहचान के पुरुषों द्वारा की गई हिंसा हो क्यों ना हो।

किसकी प्रभुता किस पर?

महिलाओं पर हो रही हिंसा की नीव है प्रभुता, जो आदमी औरत पे मानता है, ब्राह्मण दलित पे मानता है और इसी नींव पर महिला शोषण, दलित शोषण आदि की इमारतें कड़ी होती हैं।

आज़ादी की इतने वर्षों बाद भी, अनगिनत कानून, नियम और अभियान चलने के बाद भी आज तक महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा नहीं मिला है और इसका प्रमुख कारण है कि महिलाओं को आज भी पुरुषों के सामान नहीं माना जाता। ये सारे अपराध पुरुषों द्वारा अपनी सत्ता को प्रदर्शित करने का एक ज़रिया है। इसलिए जब तक महिलाओं को वस्तु की तरह देखा जाएगा , उस पर अधिकार जमाया जाएगा , तब तक कोई भी नियम, कोई क़ानून और कोई भी अभियान इस समाज में समानता नहीं ला सकते।

मूल चित्र : Canva Pro 

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Sehal Jain

Political Science Research Scholar. Doesn't believe in binaries and essentialism. read more...

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