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अब बस! अपने लिए आवाज़ तुमको ही उठानी है…

कई लड़कियां हैं जो अपने ऊपर हुए अत्याचार पर आवाज नहीं उठाती, समाज क्या कहेगा सोचकर। लेकिन समय को बदलना होगा, अब बस हो चुका है। 

कई लड़कियां हैं जो अपने ऊपर हुए अत्याचार पर आवाज नहीं उठाती, समाज क्या कहेगा सोचकर। लेकिन समय को बदलना होगा, अब बस हो चुका है। 

नोट : विमेंस वेब की घरेलु हिंसा के खिलाफ #अबबस मुहिम की कहानियों की शृंखला में पसंद की गयी एक और कहानी!

“प्रिया मेम! एक नया केस आया है, वह लड़की और उसके माँ बाप आपसे मिलना चाहते हैं।”

“लेकिन स्नेहा! अभी तीन केस हैं मेरे पास, तुम तो जानती ही हो।”

“लेकिन मेम! ये केस शायद बहुत ज़रुरी है। आप मिल लें।”

“ठीक है, भेजो उनको…. बात करती हूँ मैं।”

स्नेहा ने जाते ही उन लोगों को मेरे पास भेजा, एक 13-14 साल की लड़की और उसके मम्मी पापा अंदर आये।

लड़की के चेहरे पर मासूमियत के साथ साथ डर झलक रहा था। मैंने उनको बैठने को कहा, लेकिन वे हाथ जोड़े खड़े ही हुए थे। लड़की की माँ ना जाने क्या आस लिए मुझे देख रही थी।

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मैंने फिर भी उनको बैठाया और अपनी बात बताने को कहा? लड़की की माँ ने आँखों में आँसू लिए घबराते हुए कहा… “मैडम! मेरी बेटी नीरजा के साथ कुछ लोगों ने मिलकर जबर्दस्ती की है। हमने पुलिस में शिकायत की तो वो हमको धमकी दें रहे हैं मारने की। हम छोटे लोग हैं और वे बहुत पैसे वाले। मेरी बेटी तेरह साल की है। स्कूल से आ रही थी, कुछ मनचले लड़के इसे उठा कर ले गये और…” सब बता कर वह रोने लगी। और नीरजा डरी सहमी सी कुर्सी में गढ़ी जा रही थी। वह मासूम सी बच्ची बोलने की हालात में भी नहीं थी।

मैं उसकी माँ से बोली “आप मुझसे क्या चाहते हैं”

“मैडम आप मेरी बेटी का केस लड़ो, हमने सुना हैं आप लड़कियों के न्याय के लिए लड़ती हैं।” नीरजा की माँ ने हाथ जोड़कर कहा।

मैं नीरजा से बात करके निर्णय लुंगी। आप बाहर बैठे। नीरजा के माँ बाप के बाहर जाने के बाद मैंने नीरजा से पूछा….

“बेटा मुझे सब बताओ क्या हुआ था, और तुम दोषियों को सजा दिलवाना चाहते हो ना?”

मेरी बात सुनकर उसके अंदर जो दर्द था छलक पड़ा। वह मेरा हाथ पकड़ कर फुट फुट कर रोने लगी। उसने मुझे अपनी कमर पर लगे निशान दिखाए जिन्हें देख मेरी रुंह तक काँप गई। उन दोषियों ने उसकी कमर को सिगरेट से जगह जगह जलाया था।

वह मासूम सी बच्ची अंदर तक हिल गई थीं, आंखे लाल हुई थीं। ऐसा लग रहा था कि उसे बहुत मारा गया था। जगह जगह मार के निशान भी थे।

वह कहने लगी  “मैं उन लोगों के खिलाफ नहीं लड़ूंगी, बहुत बड़े लोग हैं वो। अपने देखा ना उन्होनें कितना मारा भी है। माँ बापू नहीं जानते उनको। सब लोग क्या कहेँगे। मैं कुछ नहीं करना चाहती।”

इतनी बात कर वह वहाँ से उठ कर भाग गई। मैंने उसके मम्मी पापा को बुलाकर समझाया अभी वह बहुत घबराई हुई है। मैं खुद बात करुँगी उससे और आपका केस भी जरूर लडूँगी। वो लोग वहाँ से चले गए लेकिन मेरा मन बहुत विचलित हो रहा था।

स्नेहा से कॉफ़ी मंगा कर मैं सोचने लगी, मेरे सामने पुराने चलचित्र घूमने लगे। नीरजा की कहानी मुझसे ही तो मिलती जुलती है। यूँ लगा मानो मेरे पुराने जख्म फिर से ताज़ा हो गए थे।

मैं अपने अम्मा और बाऊ जी के साथ मेरठ शहर में रहती थी। बाऊ जी कपड़ो की दुकान थी और अम्मा स्कूल में पढ़ाती थीं। मैं उनकी एकलौती बेटी हूँ इसलिए बहुत लाडली भी थी। बाऊ जी की तो मुझे देखें बिना सुबह नहीं होती थी।

मैं माँ से ज्यादा बाऊ जी के करीब थी और बाऊ जी भी बेटी नहीं अपना बेटा मानते थे मुझे। एक दोस्त की तरह सब बातें बताते थे। अम्मा कहती भी थीं… “ज्यादा प्यार ना जताओ बेटी को, पराये घर जाना है और जब ब्याह के जाएगी तो आप ही रोओगे।”

मैं नहीं जाऊंगी ससुराल, दूल्हा यही रह लेगा। मैं ऐसा कहकर बात को बदल देती और अम्मा बाऊ जी हंस पड़ते थे। मैंने जैसे ही बारहवीं पास की और कॉलेज में दाखिला लिया अम्मा को मेरी शादी की चिंता सताने लगी। बार बार बाऊ जी को कहती “कोई लड़का देखलो, लड़की बड़ी हो रही हैं।”

“अम्मा अभी मुझे पढ़ना है और आप एक अध्यपिका होकर ऐसी बात करती हैं। मैं पढ़ना चाहती हूँ आगे शादी नहीं चाहती।”

“लेकिन बेटा तेरी उम्र में मेरी शादी हो गई थी और आगे की पढ़ाई और नौकरी बाद में की।”

“लेकिन माँ…”

“लेकिन वेकिन कुछ नहीं, तुमको दुनियादारी नहीं पता, आजकल का जमाना बड़ा खराब है।”

माँ के बार बार कहने पर बाऊ जी ने भी रवि जो कि सरकारी नौकरी पर थे और बाऊ जी के मित्र के बेटे थे उनसे मेरी शादी तय कर दी। रवि बहुत अच्छे थे। परिवार भी जाना पहचाना था तो मुझे कोई परेशानी नहीं थी रिश्ते से और रवि ने मुझे आगे पढ़ने का वादा भी किया था।

बहुत ख़ुश थीं मैं, नये जीवन के नये सपने संजोने लगी थीं। आँखों में दुल्हन बनने का का ख्वाब था। अम्मा बाऊ जी भी मुझे देखकर बहुत ख़ुश थे, अच्छा सा मुहूर्त देखकर मेरी और रवि की सगाई हो गई और ठीक एक महीने बाद की शादी की तारीख रख दी गई।

मैं अम्मा बाऊ जी सब तैयारी में लग गए। गांव में सभी रिश्तेदारों को खबर दे दी गई। पूरा परिवार ख़ुश था लेकिन तभी हमारी खुशियों को ग्रहण लगा गया। एक दिन मैं खरीदारी कर घर लौट रही थी, शाम का समय था, हल्का अंधेरा होने लगा था। अम्मा भी बार बार फ़ोन करके पूछ रही थीं, “कहां हो कहां हो?”

जल्दी के चक्कर में मैंने घर जाने के लिए एक शॉर्टकट ले लिया लेकिन मुझे नहीं पता था वहां पहले ही कुछ गुंडे जैसे लड़के खड़े शराब पी रहे थे। उनको देख मैंने कदम तेज कर लिए, मुझे देख वो लड़के फब्तियां कसने लगे मुझे डर लग रहा था फिर भी डर पर काबू पाते हुए मैंने उनको बहुत जोर से डांटा।

मेरी डांट का उन पर कोई असर नहीं हुआ और वे मेरा पीछा करने लगे और मेरा रास्ता रोककर खड़े हो गए। मैंने भागने की कोशिश की लेकिन सब नाकाम रही। वे लोग जबरदस्ती मुझे उठाकर ले गए और मेरे साथ…

मैं 3 घंटे बेहोश पड़ी रही और जब होश आया तो सब ख़त्म हो चुका था। मेरे अस्तित्व को नोंच कर वे दरिंदे जा चुके थे। किसी तरह खुद को संभाल मैं घर पहुँची। माँ मेरी हालात देख सब समझ चुकी थीं अपने आँचल में समेट मुझे अंदर ले आयी।

मेरा सब खत्म हो चुका था। बाऊ जी तो जैसे जिन्दा लाश बन गए थे और माँ का रो रो कर बुरा हाल था। रवि के परिवार को जब यह सब पता चला उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया और समाज मुझे दोषारोपण करने में व्यस्त था।

मुझ पर जो बीती थी कोई नहीं समझ रहा था लेकिन मैंने ठान लिया था की मैं अपने लिए लड़ूंगी। अम्मा ने मना किया की समाज क्या कहेगा पहले ही इज्जत जा चुकी है लेकिन मैं पीछे हटने वालों में से नहीं थी।

बाऊ जी ने मेरा साथ दिया और मैंने अपना केस दर्ज कराया लेकिन वे लड़के बहुत पैसे वाले थे उन्होंने मुझपर बहुत दबाव डाला, मारने की धमकी देते थे रोज। बाऊ जी की दुकान पर तोड़ फोड़ कराते थे। मुझपर तेजाब फेंकने को बोल बोल कर डराते थे लेकिन इन सब के बावजूद भी मेरे इरादे को नहीं हिला सके।

जब मैं कोर्ट पहुंची वहाँ वकीलों के ऐसे ऐसे सवाल होते थे कि कोई भी शर्म से मर जाये। मैं फिर भी हारी नहीं लेकिन इन सब बातों का मेरे बाऊ जी पर गहरा असर हुआ, उनको दिल का दौरा पड़ा और बीच लड़ाई में ही मेरा साथ छोड़ कर चले गए।

मैं अंदर ही अंदर टूट गई थी लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ी थी। बाऊ जी ना होते हुए भी मेरे साथ थे।बहुत कठिनाइयों के बाद मैं उन दोषियों को उनके अंजाम तक पंहुचा पाई। अपना सब खोकर भी मैं खड़ी रही अपने आत्मसम्मान के लिए और इस केस के बाद मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की और वकील बन गई।

अपनी जैसी ही लड़कियो को न्याय दिलवाने के लिए मैं वकील बनी। अम्मा आज भी मेरे साथ थी और मेरी हर कोर्ट केस में भी साथ होती। आज नीरजा के यूँ डरने पर मेरा मन विचलित हो गया था लेकिन मैंने ठान लिया था कि उसके दोषियों को सजा जरूर दिलवाऊंगी और मैं नीरजा को समझाने के लिए निकल गई।

मैं ऑफिस से निकल कर सीधा नीरजा के घर पहुंच गई और उससे बात करने की कोशिश की लेकिन वह इतना डर गई थी और उसके अंदर जो दर्द था मैं महसूस कर पा रही थी लेकिन दोषियों को सजा दिलवाना जरुरी था।

मैंने नीरजा से कहा… “नीरजा जी तुम पर बीती है मैं समझ सकती हूँ लेकिन अगर तुम चुप रहोगी तो वे लोग तुम्हारी जैसी किसी और लड़की को अपना शिकार बनाएंगे। मैं ये सब बर्दाश्त कर चुकी हूँ इसलिए कह रही हूँ। तुम्हारी व्यथा मुझे बेहतर कोई नहीं समझ सकता है।”

मेरी बात सुन नीरजा कुछ देर के लिए स्तब्ध हो गई और बोली “मैडम आपके साथ भी?”

“हाँ नीरजा ये सब मेरे साथ हो चुका है लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और ये मुकाम पाया है” और मैंने उसे अपनी कहानी सुनाई। मेरी कहानी सुनकर उसकी आँखों में चमक सी आ गई।

“नीरजा! तुम एक औरत हो और औरत अगर ठान ले तो क्या नहीं कर सकती। आज तुम्हारे साथ गलत हुआ है, कल किसी और के साथ गलत होगा।  लेकिन तुम्हारी एक चुप्पी उन लोगों की हिम्मत और बढ़ा देगी। उठो और अपने लिए आवाज उठाओ, एक योद्धा की तरह अपने सम्मान के लिए लड़ो।”

“नीरजा यहाँ कोई साथ नहीं आएगा, अपने लिए आवाज तुमको ही उठानी होगी।”

मेरी बात सुन नीरजा में आत्मविश्वास जाग्रत हुआ और वह बोली “दीदी आप मेरा केस लड़ो, मैं उनको सजा दिलवाकर रहूंगी”

आज मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा जीवन सफल हो गया। नीरजा जैसी कई लड़कियां हैं जो अपने ऊपर हुए अत्याचार पर आवाज नहीं उठाती, समाज क्या कहेगा सोचकर। लेकिन समय को बदलना होगा अब हमें लड़ाई लड़नी होगी ऐसे दोषियों से भले ही हमें चंडी बनना पड़े या दुर्गा।

मूल चित्र : Lazyartistgallery via Unsplash

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