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और वो एक दुल्हन बनी उसके सामने खड़ी थी…

Posted: अक्टूबर 2, 2020

सीमा आज शाम को मैं तुम्हे दुल्हन की तरह सजा देखना चाहता हूँ। तुम वही लाल बनारसी साड़ी पहनना जो शादी के दिन पहनी थी और सोलह सिंगार भी करना।

आज बहुत तेज़ बारिश हो रही थी। दरवाजे से झांकती सीमा का मन बहुत बेचैन हो रहा था। अभी तक जय नहीं आये थे और फ़ोन भी नहीं लग रहा था।

वहाँ जय डॉक्टर के पास बैठा अपने नबर का इंतजार कर रहा था। बाहर भी तूफान आया था और जय के सीने में भी एक तूफ़ान सा मचा था, “ना जाने ऐसा क्या लिखा है इस रिपोट में जो लैब असिस्टेंट ने तुरंत डॉक्टर से मिलने को कहा है।” ये विचार चल ही रहा था की मिस्टर जय नर्स ने आवाज़ दी।

“सिस्टर, मैं जय हूँ”, और सिस्टर ने जय को डॉक्टर के केबिन में भेज दिया।

रिपोट्स पढ़ते हुई डॉक्टर बहुत गंभीर लग रहे थे और कई तरह के भाव उनके चेहरे पे आ जा रहे थे।

“क्या बात है, क्या हुआ है मुझे डॉक्टर साहब?” जय ने पूछा तो अपना चश्मा टेबल पे रख डॉक्टर जय के पास गए और कंधे पे हाथ रखा। जय का कलेजा मुँह को आ गया वो समझ गया कुछ तो गंभीर बात होंगी।

“जय आपको बहुत हिम्मत से काम लेना होगा। मैं जनता हूँ कम उम्र है आपकी पर इलाज भी है और हम करेंगे।”

“पर मुझे हुआ क्या है?” डॉक्टर की बात बीच में काट जय पूछा।

“बहुत अफ़सोस है मुझे जय आपको ब्रेन ट्यूमर है।”

“लेकिन मुझे तो सिर्फ सिर में दर्द है डॉक्टर”, जय बेचैन हो गया।

“ये मैं नहीं रिपोर्ट्स बता रहे है जय।”

इसके बाद डॉक्टर ने क्या बोला कुछ सुन नहीं पाया जय ऐसा लगा कोई विस्फोट हुआ कानो में, चुपचाप फ़ाइल उठाई और चल दिया।

आँखों के आगे सिर्फ सीमा और नन्ही विधि का चेहरा घूम रहा था। आज जय के दुःख में ईश्वर भी दुखी थे शायद तभी तो आंसुओ की बारिश कर रहे थे। जैसे ही दरवाजे की घंटी बजी भाग के सीमा ने दरवाजा खोला। सामने जय को देख दिल को तसल्ली मिली।

“कहाँ रह गए थे आप? इतने देर कोई करता है क्या? फ़ोन क्यूँ नहीं लग रहा था आपका?” तभी बोलते बोलते सीमा रुक गई, “ये आपकी आँखे क्यूँ लाल है आप रो रहे थे क्या?”

“पगली मैं क्यूँ रोऊँगा ये तो बारिश के कारण कुछ आँखों में चला गया था। अच्छा तुम खाना लगाओ मैं कपड़े बदल लेता हूँ”, और बहुत ही सफाई से झूठ बोल जय बैडरूम में चला गया और सीमा खाना गर्म करने।

साल भर की नन्ही विधि बेफिक्र हो सोई थी, उसे दुलार कर अपने रेनकोट में छिपा कर रखी डॉक्टर की फ़ाइल को जय ने अपने कपड़ो के अलमारी में छिपा दी और कपड़े बदल खाने चला गया।

“खाना खाते खाते जय ने सीमा को देखा पसीने से उसका सिंदूर माथे पे फ़ैल गया था जैसे शादी के दिन उसके माथे पे सिंदूर फ़ैल गया था बिलकुल वैसे ही।  गुलाबी सूट में कितनी प्यारी लग रही थी। खाना खा दोनों सोने चले गए। दिन भर की थकी सीमा तुरंत सो गई लेकिन जय की आँखों में नींद कहा थी।

विधि को बाहों में लिए यही सोचता रह गया की ‘कैसे दोनों रहेंगे मेरे जाने के बाद। अभी तो इतनी सेविंग भी नहीं हुई है। कितने दिन ही हुए नौकरी को पांच साल और चार साल की शादी। सीमा कितनी बेफिक्र सोई थी, उसे क्या पता था आने वाला समय ये नींद उड़ा देगा।’ ये सब सोचते सोचते पता नहीं कब आँख लग गई जय की।

“उठो ऑफिस नहीं जाना कितना सोओगे?” आज सीमा की आवाज़ से नींद खुली जय की, देखा तो विधि भी उठ के पापा पापा कर रही थी। प्यार से विधि को गोद ले जय ने कहा, “मैंने छुट्टी ली है एक हफ्ते की।”

जय की बात सुन सीमा टुकुर टुकुर जय को देखने लगी। सीमा को यूं देखते देख जय ने उसे बाहों में भर लिया, “क्यूँ रोज़ लड़ती थी मुझसे की मैं बिलकुल टाइम नहीं देता। अब छुट्टी ली तो तुम्हें पच नहीं रहा?”

“अरे! नहीं मैं तो बहुत ख़ुश अब तो हम खूब मस्ती करेंगे! क्यूँ विधि?” विधि ने जाने क्या समझा लेकिन ख़ुश हो तालिया बजाने लगी।

जय ने सोच लिया था अपने जाने से पहले सीमा और विधि को इतनी खुशियाँ देगा जितनी आज तक ना दे पाया था। सिर में अभी भी दर्द था और दिल में एक डर पता नहीं कब बुलावा आ जाये। हे प्रभु जब मौत ही लिखी थी तो एक झटके में आ जाती इस तरह तड़प तड़प के क्यूँ?

दोपहर को विधि को सुला जय ने सीमा को अपने पास बिठा लिया। जय के सीने पे अपना सिर रखा सीमा बोली, “कितने दिनों बाद आज विधि ख़ुश है।”

“और तुम?” जय ने सीमा के चेहरे को अपने हाथों में ले पूछा।

“मैं भी जय कितने टाइम के बाद आज सुकून के दो पल हमें मिले है और कल हमारी एनिवर्सरी भी है याद तो है ना आपको?”

चौंक गया जय, “ओह्ह, मैं तो भूल ही गया।”

आँखे फिर से लाल होने लगी बहुत मुश्किल से अपनी भावनाओं पे काबू किया जय ने किसी भी कीमत पे सीमा को कुछ पता नहीं चलने देना चाहता था। वो तो तिल तिल मर ही रहा था सिर का दर्द कभी कम तो कभी तेज़ हो जाये। डॉक्टर से दवा भी नहीं ले पाया था। पागल हुआ जा रहा था जय। कैसे सीमा को बताये या फिर ना बताये कुछ समझ ना आये। फिर सोचा जब थोड़े ही पल लिखें है तो क्यूँ ना खुशियाँ दूं। अपनी विधि को अपनी सीमा को।

जय ने सोच लिया ये अंतिम सालगिरह वो सीमा के लिए यादगार बना देगा। सुबह चाय के साथ सीमा को जगाया। सीमा की खुशी उसके चेहरे की चमक बता रही थी। अपनी पत्नी के चेहरे को सिर्फ जय ताकता रहता, “सीमा आज शाम को मैं तुम्हे दुल्हन की तरह सजा देखना चाहता हूँ। तुम वही लाल बनारसी साड़ी पहनना जो शादी के दिन पहनी थी और सोलह सिंगार भी करना।”

आश्चर्य से सीमा जय को देखने लगी, “क्यूँ? इतना क्यूँ जोकर बना रहे हो मुझे?”

“प्लीज् सीमा मेरे लिए”, जय ने कहा तो सीमा ने हाँ कर दिया।

“कोई बात है क्या जय, आज कल आप कुछ बदले लग रहे हैं।” सीमा ने पूछा तो जय ने हँसते हुए कहा, “तुम औरतों को तो शक की बीमारी होती है”, और बात बदल दिया जय ने।

चाय पी दोनों मंदिर गए। वहाँ ईश्वर से पता नहीं सीमा ने क्या क्या माँगा पर जय ने तो सिर्फ सीमा और विधि की हिफाज़त मांगी। जब पंडित जी ने सदा सौभाग्यवती का आशीर्वाद दिया तो जय की आंखे छलक उठी। विधि को गोद में उठा धीरे से आँखों को पोछ लिया और भगवान से लाचार हो पूछा, “क्यूँ ईश्वर मैं ही क्यूँ?”

शाम को सीमा ने जय से कहा, “आज बाहर खाना खाने चलें?”  धीरे से सिर हिला दिया जय ने। मोबाइल की रिंग सुन जय ने देखा हॉस्पिटल से कॉल था। जय को लगा आगे के इलाज और दवाओं के लिए होगा लेकिन दूसरी तरफ से नर्स ने जय को तुंरत हॉस्पिटल आने को कहा।

सीमा को टाइम से तैयार होने को कह जय हॉस्पिटल निकल गया। एक भी मौका छोड़ा नहीं चाहता था जय अपने ठीक होने का। डॉक्टर के केबिन में नर्स ने बिना अपॉइंटमेंट भेज दिया अंदर एक और शख्श बैठे थे बहुत बीमार से। अभी जय उन्हें देख ही रहा था की डॉक्टर ने जय को गले लगा लिया। अचानक से डॉक्टर को गले लगता देख जय डर गया पता नहीं क्या बात होंगी।

“हमें बहुत खेद है मिस्टर जय आपकी रिपोर्ट्स इन साहब के साथ बदल गई थी।”

“क्या?” आश्चर्य से जय कभी डॉक्टर को देखे, कभी उस शख्श को, “क्या कह रहे है आप डॉक्टर, लेकिन वो सिर दर्द आपने तो कहा था कि…”

“नहीं नहीं जय आपको सिर्फ माइग्रेन की प्रॉब्लम है। नाम एक होने के कारण फ़ाइल बदल गए वो तो आज जब ये आये तब हमें पता चला और आपको हमने बुलाया।”

डॉक्टर की बातों को सुन जय को समझ नहीं आ रहा था रोये किहँसे। अब तो बस उसे घर जाना था अपने सीमा के पास। एक एक पल एक बरस लग रहे थे लग रहा था किसी ने सीने पर से पत्थर हटा दिया हो।

घर पहुंच जैसे ही दरवाजा खोला जय ने सामने सीमा खड़ी थी, दुल्हन बनी, हाथों में सिंदूर की डिब्बी लिए लाल साड़ी, पैरों में आलता, भरी भरी लाल चूड़ियां, बड़ी बड़ी आँखों में गहरा काजल और बालों में मोगरे के फूलों के गज़रे। जय को देख सीमा शर्माते हुए कहा, “देख लो फिर ना कहना अच्छे से तैयार नहीं हुई।”

डबडबाई आँखों से जय आगे बढ़ा और सिंदूर हाथों में ले भर दिया अपनी सीमा की मांग लाल सिंदूर से, कुछ छींटे माथे पे भी गिर गए जैसे शादी के दिन गिर गए थे और कस के भींच लिया अपनी बाहों में अपनी सीमा को, अपनी खुशियों को। आँखों से आँसु रुक नहीं रहे थे लेकिन ये खुशी के आँसु थे और जय इन्हें रोकना नहीं चाहता था और सीमा भी आश्चर्य से जय को ताकती समा गई अपने जीवनसाथी के बाहों में।

मूल चित्र : Ankur Kumar via Pexels

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