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स्कूलों में बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कौन है ज़िम्मेदार?

Posted: अगस्त 18, 2020

विद्यालय प्रांगण में जहाँ, एक ओर दिन का आरंभ सरस्वती पूजन से किया जाता है, वहीं बच्चों के बचपन तथा नारी अस्मिता को तार-तार किया जा रहा है!

‘बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ’ भारतीय सरकार द्वारा 2015 में चलायी गयी मुहिम ने, महिला साक्षरता में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया। जिसके चलते महिला साक्षरता के प्रति लोगों को, जागरूक किया गया । इस योजना के पश्चात भारत में महिला साक्षरता के प्रगतिशील आंकड़े सामने आए हैं।

अपने घर की चार दीवारी से निकलकर, अपने पैरों पर खड़े होने का सपना सजाये, बालिकाएं विद्यालय प्रांगण पहुँच रहीं हैं। इसके साथ ही वर्तमान में निजी, सरकारी व सहकारी क्षेत्रों में एक बड़ा महिला वर्ग कार्यरत है। आज ये महिलाएं अपने घर-परिवार के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी के साथ एक सशक्त महिला वर्ग की निर्माता भी हैं। परंतु वहाँ भी महिलाओं को, एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। ये कामकाजी महिलाएं अक्सर अपने सहकर्मियों व अधिकारियों द्वारा किये जाने वाले, यौन शोषण को सह रहीं हैं।

यौन उत्पीड़न की कानूनी परिभाषा

1997 में सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा बनाम राजस्थान सरकार के मामले की सुनवाई करते हुए यौन उत्पीड़न को परिभाषित किया। यौन उत्पीड़न एक अनिष्ट, असहनीय, अपकारक यौन बर्ताव है जो आप पर शारीरिक व मानसिक रूप से हानिकारक प्रभाव डालता है। किसी भी व्यक्ति द्वारा असहज तरीके से आपको घूरना, स्पर्श करना, अपकारक यौन टिप्पणी करना, किसी भी प्रकार के अश्लील चित्र व चलचित्र दिखाना, असहज इशारे करना या शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए दबाव डालना यौन उत्पीड़न में शामिल हैं। इनके अलावा भी यदि कोई किसी व्यक्ति की कोई हरक़त सहज ना लगें, मानसिक रूप से पीड़ित करे, यौन उत्पीड़न कहलाता है।

महिला और बाल विकास मंत्रालय की हैरानी जनक रिपोर्ट

  • महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2014 से 2018 के बीच कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में 43 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है । साल 2014 में यह संख्या 371 थी। वह 2017 में 570 पहुंच गई । इन पाँच वर्षों में यौन उत्पीड़न के कुल 2,535 मामले दर्ज हुए।
  • ये मात्र वो आँकड़े हैं जो सामने आये हैं, जबकि ऐसे कितने ही ऐसे मामले हैं जो दर्ज ही नहीं करवाए जाते हैं। आये दिन न्यूज़ चैनलों, अखबारों व सोशल मीडिया पर ऐसी अनेक घटनाएँ देखने को मिल रहीं हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अनुसार पिछले तीन वर्षों में विद्यालयों के परिसर में बच्चों के साथ होने वाले यौन शोषण, दुर्व्यवहार और हत्या के मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है।
  • महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा कराए गए, एक अध्ययन के बाद भयावह आँकड़े सामने आए हैं। इस अध्ययन के अनुसार हर तीन में से दो स्कूली बच्चे यौन उत्पीड़न के शिकार हो रहें हैं। यह समस्या बहुत ही गम्भीर रूप लेती जा रही है।
  • पंजाब में शिक्षक द्वारा सात वर्षीय बच्ची, कोलकाता में नर्सरी में पढ़ने वाली चार वर्षीय बच्ची, तमिलनाडु के इरोड जिले में आठवीं में पढ़ने वाले छात्रा, केरल के एर्नाकुलम में सौलह वर्षीय छात्र, राजस्थान में दस वर्षीय छात्रा, बेंगलुरु में आठ वर्षीय छात्रा, महाराष्ट्र के बीड जिले में एक अध्यापक द्वारा, एक ही विद्यालय की कई छात्रों के साथ, यौन शोषण के मामले सामने आए हैं। आंकड़े दिन प्रतिदिन इतनी गति से बढ़ रहे हैं कि विवरण किया जाना असम्भव है।

शिक्षा के मन्दिर और महिला कर्मचारी व बालक-बालिकाओं के साथ होते दुष्कर्म

अध्यापक किसी पद मात्र का नाम नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी है। यदि इसे ठीक से नहीं निभाया जाए, तो भविष्य निश्चित ही अंधकारमय होगा। विद्यालय- शिक्षा का मन्दिर, वह स्थान जहाँ हमारे समाज के उज्जवल भविष्य का निर्माण होता है। देवतुल्य कहे जाने वाले शिक्षक अपने जीवन भर का ज्ञान सार रूप में अपने विद्यार्थियों को देकर उन्हें एक बेहतर नागरिक बनाते हैं।

एक बालक के व्यक्तित्व का वास्तविक निर्माण विद्यालय में ही होता है। हमारे समाज के प्रति हमारे क्या कर्तव्य हैं और किस प्रकार हमें उनका निर्वहन करना है? इन सभी प्रश्नों का ज्ञान हमें हमारे गुरुजन ही देते हैं। परन्तु क्या हो, यदि देव स्वरूप कहे जाने वाले, ये गुरुजन ही शिक्षा मन्दिरों को शर्मसार करने लगें?

बच्चों के वर्तमान और भविष्य के निर्माता कहलाने वाले कहलाने वाले शिक्षक व विद्यालय कर्मचारियों द्वारा क्रूरता की हर सीमा पार कर देने की अनेक घटनाएं सामने आ रहीं हैं। निजी व सरकारी विद्यालयों में मोटी तनख़्वाह लेने वाले कई अध्यापक इस सम्मानित पद की गरिमा को कलंकित कर रहें हैं। इन विद्यालयों में महिला कर्मचारी व बालक-बालिकाएं इस दुष्कर्म के शिकार हो रहें हैं। विद्यालय प्रांगण में जहाँ एक ओर दिन का आरंभ सरस्वती पूजन से किया जाता है वहीं नारी अस्मिता को तार-तार भी किया जा रहा है।

सरकारी विद्यालय जहां हमारे समाज के पिछड़े वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं। उनके माता पिता खेती व दैनिक मजदूरी पर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। ऐसे में अपने बच्चों के साथ दो घड़ी बैठना तक मुश्किल है। ना ही वे अपने बच्चों को इस विषय पर बात कर पातें हैं, न उन्हें जागरूक कर पातें हैं। बच्चे अपने साथ हो रहे इस दुर्व्यवहार को सहज मान कर सहन करते रहते हैं। छोटे-छोटे गांवों में चल रहे, ये विद्यालय जागृति से बहुत दूर हैं।

आज भी समाज की पुरुष प्रधान धारणा को मानते हुए, ये अपने अधिकारों से अनभिज्ञ हैं। उन्हें डर रहता है कि उनके समाज द्वारा उन्हें ही नकारा जाएगा, उन्हें ही दोषी ठहराया जाएगा। यहां तक की शिकायत किये जाने पर उनकी पढ़ाई लिखाई बन्द करवा कर घर की चार दिवारी में कैद कर दिया जाता है और वे भी इसे ही अपनी ज़िंदगी मान लेते हैं या इस दुव्यर्वहार को सहन करते रहते हैं और शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित होते रहते हैं। बहुत से अभिभावक जानकारी मिलने पर भी मामला दर्ज नहीं करवाते या मामला दर्ज किये जाने पर भी लम्बी अदालती कार्यवाही के शिकार हो जाते हैं।

आये दिन ऐसी शिकायतें दर्ज़ करवायी जा रहीं हैं, जिसके अनुसार विद्यालयों में अध्यापकों व अन्य अधिकारियों द्वारा अध्यापिकाओं तथा महिला कर्मचारियों का यौन शोषण किया जा रहा है। कार्य के दौरान, पुरुष सहकर्मियों द्वारा अक्सर अश्लील, दोहरे अर्थ निकलने वाले शब्दों को दोहराया जाता है। काम के बहाने बार-बार बुलाकर असहज बर्ताव किया जाता है। बिना किसी आवश्यक कार्य के फोन व एस. एम .एस. करते हैं। अध्यापिकाओं के वस्त्रों पर अभद्र टीका-टिप्पणियां करना तो, जैसे उनके लिए सामान्य सी ही बात है। अश्लील मानसिकता लिए ये लोग, सदैव इस ताक में रहते हैं कि बस किसी भी तरह छूने का मौका मिल जाये। परन्तु इतने भर से भी उनका मन नहीं भरता। विरोध ना किये जाने पर उनके हौसले इतने बढ़ जाते हैं कि वे बलात्कार जैसे घिनौने दुष्कर्म को अंजाम देते हैं।

कहीं खामोशी का मतलब ‘हाँ’ तो नहीं?

अपने साथ हो रही, इन अप्रिय घटनाओं का विरोध करने पर, इन अध्यापिकाओं को मानसिक प्रताड़ना को भी सहन करना पड़ता है। उनके कामों में रुकावटें लायी जाती है या अत्यधिक कार्यभार उन्हें दे दिया जाता है। इसीलिए वे यौन उत्पीड़न के, इस घिनौने दुष्कर्म को सामान्य व आम समस्या मान कर, ख़ामोशी साध लेती हैं। और तर्क देती हैं कि आज कल समय बहुत खराब है? ये तो हम लड़कियों के साथ होता ही है? हम कर भी क्या सकते हैं? लोग तो हमें ही गलत कहेंगे? परन्तु इतना पढ़े-लिखे होने के बाद भी इस तरह के रूढ़िवादी तर्क का सहारा लेकर, ये अध्यापिकाएँ खुद को सांत्वना तो दे देती हैं।

लेकिन क्या यह ठीक है? कहीं ऐसा तो नहीं की, हमारी इस ख़ामोशी को ‘हाँ’ समझ लिया जाता है? तथा हमारी यह बर्दाश्त करने की आदत ही, उनकी हिम्मत को बढ़ावा दे रही है? प्रश्न विचारणीय हैं। आये दिन विद्यालयों में हो रही, बलात्कार की घटनाओं के पश्चात, यह प्रश्न अब विचारणीय है कि विद्यालयों में बच्चे सुरक्षित हैं?

संविधान और कानून?

  • बच्चों के साथ हो रहे इन यौन उत्पीड़न मामलों को रोकने के लिए एक मजबूत कानून व्यवस्था की आवश्यकता है। जिसके लिए 2012 में पोक्सो एक्ट लाया गया । इस कानून के जरिए नाबालिग बच्चों के साथ होने वाले यौन शोषण व छेड़छाड़ के मामलों में कार्यवाही की जाती है ।
  • भारतीय सविंधान ने हम सभी को यह अधिकार दिया है की हम सभी अपना जीवन न्यायपूर्ण तथा सम्मानपूर्ण ढंग से बिताएं। हम सभी को अनिष्ट, असहज यौन उत्पीड़न से मुक्त रहने का अधिकार है।
  • यदि आपके साथ या किसी अन्य के साथ ऐसा होता है तो उसके खिलाफ जल्द से जल्द शिकायत व कार्यवाही की जानी चाहिए, ताकि इसके दोहराये जाने को रोका जा सके।

अन्य सावधानियाँ

किसी भी प्रकार के यौन उत्पीड़न को सहन करना आपको और अधिक मुश्किल में डाल सकता है।  किसी भी प्रकार का यौन उत्पीड़न न केवल शारीरिक बल्कि, मानसिक रूप से भी आपको आहत करता है।

  • अतः आवश्यक है कि इसके खिलाफ आवाज़ उठायी जाए।
  • इसके लिए अपने विश्वसनीय व्यक्ति को आपके साथ हो रहे अप्रिय बर्ताव के बारे में बताएं व उनसे परामर्श करें। परिस्थिति की गम्भीरता को समझते हुए प्रबन्धक, यौन उत्पीड़न सलाहकार को शिकायत करें।
  • संघ प्रतिनिधि या कानूनी सलाहकार से भी परामर्श करें। डर कर इन परिस्थितियों को सहन करते रहने से परिणाम भयावह हो सकते हैं।
  • सामाजिक लाँछन, मान प्रतिष्ठा की हानि जैसी पूर्वाग्रहों को नकार कर अपने सम्मान व अधिकारों के लिए उठ खड़े होने का समय आ गया है।
  • सबसे आवश्यक यह है कि बिना हताश हुए यौन उत्पीड़न के खिलाफ लैंगिक संवेदनशीलता व न्याय के लिए दीर्घकालिक प्रयास किये जाते रहें।

अर्थात् एक मजबूत कानून व्यवस्था के साथ ही यह आवश्यक है कि बच्चों व अभिभावकों में जागरूकता लायी जाए। इस क्रम में पालन पोषण व शिक्षा के स्तर का भी निर्धारण आवश्यक है। शिक्षा पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा को शामिल किया जाए, विद्यालयों में एक सलाहकार समिति बनाई जाए तथा विद्यार्थी, अभिभावक व शिक्षक इस विषय पर, वार्ता व परामर्श करें।

मूल चित्र:- Canva

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