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नारी तू फिर भी नारायणी : नारी का बदलता स्वरुप!

Posted: अगस्त 28, 2020

पंडित नेहरू के कथन को चरितार्थ करती हुईं आज महिलाएं स्वयं भी सशक्तिकरण की राह पर हैं और राष्ट्र को भी सशक्त कर रही हैं। सच में नारी तू नारायणी!

‘सशक्तिकरण’ अर्थात खुद से जुड़े निर्णय खुद लेने की क्षमता या स्वतंत्रता। अतः महिला सशक्तिकरण का तात्पर्य महिलाओं के उन्मुक्त हो कर खुद से जुड़े निर्णय स्वयं लेने और रूढ़िवादिता के बंधन को लांघने से है। अपने अधिकारों को जानने, समझने और उसके लिए खड़े होने से है। महिला सशक्तिकरण महिलाओं की उस क्षमता का नाम है जिससे वे अपने पैरों की बेड़ियों को स्वयं तोड़, अपनी क्षमता को पहचानती हैं और न केवल खुद के लिए बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान की ओर अग्रसर होती हैं। इस विषय में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा था कि समाज को जगाने के लिए महिलाओं का जागृत होना ज़रूरी है। और हम मानते हैं नारी तू नारायणी!

नारी तू नारायणी : वैदिक काल में भारत में महिलाओं की स्थिति

भारत में महिलाओं की स्थिति बदलती रही है, कभी स्थिर नहीं रही। यह उच्चतम से ले कर निम्नतम दर्जे को प्राप्त कर पुनः कई प्रवर्तकों और उनके संघर्षों, आंदोलनों से होते हुए वापस एक अच्छी स्थिति तक आ पाया है। वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति बेहतरीन हुआ करती थी। उस काल में महिलाओं को शिक्षा से ले कर सभाओं तक पुरुषों से बराबरी प्राप्त था। 

उत्तर वैदिक काल व मध्यकालीन भारत में महिलाओं की स्थिति

उत्तर वैदिक काल व मध्यकालीन भारत में उनकी स्थिति खराब होती गयी और कुरीतियों की जड़ें मजबूत होती गयीं। इस युग में पर्दा, सती प्रथा, देवदासी, बाल विवाह, विधवाओं के पुनर्विवाह पर रोक आदि कई रीति-रिवाज़ कई समुदायों के बीच अस्तित्व में रहा और स्त्रियों के दर्जे व स्थिति में गिरावट आती गयी, बावजूद इसके विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं ने सफलता हासिल की। इसी युग में रज़िया सुल्तान दिल्ली पर शासण करने वाली एकमात्र महिला साम्राज्ञी बनीं। गोंड की महारानी 15 वर्षों तक शासन में थीं। चाँद बीबी ने मुग़ल सम्राट के खिलाफ अहमदनगर की रक्षा की। शिवजी की माँ, जिजाबाई को उनकी क्षमताओं के लिए क्वीन रीजेंट की उपाधि मिली। झांसी की महारानी रानी लक्ष्मीबाई ने 1857 में विद्रोह का झंडा बुलंद किया। भोपाल की बेगमें भी इस दौर की महत्वपूर्ण शासकों में से हैं, जिन्होंने पर्दा प्रथा को ठुकराया और मार्शल आर्ट्स की प्रशिक्षण ली।

अंग्रेजी हुक़ूमत के दौरान भारत में महिलाओं की स्थिति

अंग्रेजी हुक़ूमत के दौरान भारत में महिलाओं की स्थिति में सबसे अधिक उथलपुथल रहा। यह समय अपनी जड़ें फैला चुकी कुप्रथाओं को मिटाने के लिए संघर्ष का-आंदोलनों का एक बड़ा और महत्वपूर्ण दौड़ था। इस युग में एक तरफ राजा राम मोहन राय सती प्रथा खत्म करने के लिए अपनी लड़ाई लड़ रहे थे वहीं दूसरी तरफ़ ईश्वर चंद्र विद्यासागर विधवाओं की स्थिति बेहतर करने लिए, परिणाम स्वरूप सती प्रथा का उन्मूलन और विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1956 सामने आया। इसी युग में ज्योति फुले और पंडित रमाबाई जैसे कई सुधारकों ने महिलाओं के उत्थान के लिए लड़ाईयां लड़ीं और महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य को हासिल करने में अहम योगदान दिया।

महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की मांग सर्वप्रथम 1917 में उठी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इसके समर्थन में थी। 1929 में मोहम्मद अली जिन्ना के प्रयासों से बाल विवाह निषेध अधिनियम पारित हुआ। महात्मा गांधी खुद बाल विवाह के बंधन में बंधे लेकिन आगे चल कर उन्होंने बाल विवाह के बहिष्कार एवं युवाओं से विधवाओं से शादी करने की अपील की। इन निरंतर प्रयासों से महिलाओं को समाज में सशक्त होने में बल मिला।

स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का योगदान

स्वतंत्रता संग्राम में भी महिलाओं का योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा, भिकाजी कामा, डॉ॰ एनी बेसेंट, प्रीतिलता वाडेकर, विजयलक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृत कौर, अरुना आसफ़ अली, सुचेता कृपलानी और कस्तूरबा गाँधी कुछ प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल हैं। कवयित्री सरोजिनी नायडू भी प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से हैं जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्य्क्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला थीं और साथ वह भारत के किसी राज्य की राज्यपाल बनने वाली पहली महिला भी थीं।

नारी तू नारायणी के चलते भारत में नारीवाद

भारत में नारीवाद 1970 के दशक में सक्रिय हुआ और इसने तेज़ी से विस्तृत रूप धारण किया। 1990 के दशक में कई NGO अस्तित्व में आए जिससे नारीवाद और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला। 2001 को भारत सरकार ने महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया और इसी वर्ष महिला सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति पारित की गयी। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन बाद, 9 मार्च 2010 को राज्यसभा ने महिला आरक्षण बिल को पारित कर दिया जिसमें संसद और राज्य की विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की व्यवस्था है।

मीरा कुमार पहली महिला स्पीकर बनी। साथ ही सुमित्रा महाजन और प्रतिभा देवी सिंह पाटिल देश मे सुशोभित करती रहीं। बिहार की पटल पर देखे तो बिहार ही नहीं पूरे देश में 1963 में सुमित्रा देवी पहली महिला कैबिनेट मंत्री बनीं। बिहार जैसे पुरुष प्रधान राज्य में राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया गया।

नारी तू नारायणी : आज महिलाएं स्वयं ही सशक्तिकरण की राह पर हैं

सच में नारी तू नारायणी! आज महिलाएं संविधान में दिए गए अपने अधिकारों के लिए खड़ी हो रही हैं और अपने हक की लड़ाई लड़ रही हैं। कला एवं संस्कृति, साहित्य, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, शिक्षा, राजनीति, मीडिया, सेवा क्षेत्र, खेल कूद आदि हर क्षेत्र में आज महिलाएं अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं। ज़मीनी स्तर से ले कर अंतरिक्ष तक, आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां महिलाओं की पहुंच नहीं है। देश को सशक्त करने के लिए महिला सशक्तिकरण अतिआवश्यक है, पंडित नेहरू के इस कथन को चरितार्थ करती हुई आज महिलाएं स्वयं भी सशक्तिकरण की राह पर हैं और राष्ट्र को भी सशक्त कर रही हैं।

हर रूप में अपनी भूमिका निभाते हुए महिलाएं विकास के पथ पर निरंतर बढ़ रही हैं। घर संभालने के बाद समाज, राष्ट्र संभालने की बीड़ा उठा रही हैं। सच कहा जाता है, नारी तू नारायणी! नारी शक्ति को सलाम!

मूल चित्र : Pexels

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