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और जब मैंने अपनी ‘बस चुप रहो’ की चुप्पी तोड़ी तो…

बहुत बड़ी शरलाॅक होम्स बनी हो? किसी को बताने की जरूरत नहीं। घर के आदमी जाकर लड़ेंगे तो नाम तो तेरा ही आएगा और तेरी बदनामी होगी। बस चुपचाप रहो!

बहुत बड़ी शरलाॅक होम्स बनी हो? किसी को बताने की जरूरत नहीं। घर के आदमी जाकर लड़ेंगे तो नाम तो तेरा ही आएगा और तेरी बदनामी होगी। बस चुपचाप रहो!

‘आय हाय! जरा इधर भी तो देखो!’

‘ए वो नीली एटलस वाली तुम्हारी भाभी है! उसको कुछ न कहना।’

‘हां भैया! हमको पता है। हम तो ऊ गुलाबी लेडी बर्ड वाली को कह रहे थे।’

स्कूल से घर आते जाते ये फब्तियां हमारी जीवन संगिनी हो चुकी थीं। कुछ आवारा किस्म के लड़के हर रोज़ गली के मोड़ पर दिख जाते थे। गंदी-गंदी फब्तियां कसना इनका प्रिय शगल था।

“मां इन लड़कों ने बहुत परेशान कर रखा है। ये बहुत गंदी बातें करते हैं।”

“बिट्टो ऐसे गुंडों के मुंह नहीं लगते। तुम लोग ध्यान ही क्यों देती हो? उनकी तरफ देखा भी मत करो। थोड़े दिन बोलेंगे फिर खुद चुप हो जाएंगे। कुत्ते तो भौंकते ही हैं तो क्या हाथी पलटकर जवाब देता है?” मां ने अपनी दलीलें देकर मुझे चुप करवा दिया।

मैं चाहती थी कि पापा से बात करूं पर दादी ने कहा, “सुनो बिट्टो! अपने पापा को बताने न चली जाना। आदमियों का दिमाग गर्म होता है। लड़ाई मारपीट हो गई और तुम्हारे पापा को कुछ हो गया तो पछताती फिरोगी।”

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अब इसके आगे कोई क्या कहे। लगभग यही जवाब हर घर से मिला। उषा की मां ने तो यहां तक कह दिया, “तुम्हें कैसे पता कि भुवन ने आंख मारी। जरूर तुम लोग ताक रही होगी। ताकोगी तो लड़के पीछे पड़ेंगे ही।”

“और उसका नाम तुमको कैसे पता चला। बात की हो तुम?” उषा की बुआ बोली।

“बुआ वो लोग आपस में नाम लेकर बुलाते हैं एक-दूसरे को तो क्या हमको नहीं पता चलेगा।” “अच्छा .. अच्छा…ठीक है बहुत बड़ी शरलाॅक होम्स बनी हो। किसी को बताने की जरूरत नहीं। घर के आदमी जाकर लड़ेंगे तो नाम तो तेरा ही आएगा और तेरी बदनामी होगी। बस चुपचाप सर झुकाकर जाना। कुछ दिन बाद ये लड़के भी चुप हो जाएंगे।”

हम लड़कियां अपने घर से निराश और भरे मन लिए स्कूल आते जाते।

गर्मी की छुट्टियों में मैं परिवार के साथ कोलकाता घूमने गई। ममेरी दी के साथ खूब घूमना फिरना होता था। दीदी ने स्नातक की पढ़ाई खत्म करके अभी अभी नौकरी ज्वाएन की थी। एक दिन हम दोनों घूमने निकले बस में एक लड़के ने दीदी के साथ छेड़छाड़ की। दीदी ने वहीं उसे खींचकर दो तमाचे मारे। आसपास के लोग भी दीदी के बचाव में आ गए और उस लड़के को खूब बुरा भला कहा और बस रोककर उसे बीच रास्ते उतार दिया गया।

मैं आश्चर्यचकित हो देखती रह गई।

“दीदी आप तो बड़ी हिम्मती है। आपको डर नहीं लगा। अगर इस लड़के ने कोई बदला लिया तो।”

“देख बहना ये लोग कायर होते हैं। जब तक इनकी हरकतें सहते रहो तो इनकी हिम्मत बढ़ती है जब इनको जवाब मिल जाए तो ये डर जाते हैं।”

“लेकिन दीदी मम्मी तो कहती हैं कि….”

“कि चुप रहो तो ये चले जाएंगे! नहीं ये और परेशान करेंगे। इसलिए इनका मुकाबला करो। इनकी हिम्मत बढ़ाने वाले काम न करो।”

दीदी से मंत्र लेकर मैं घर वापस आई, अब मैं तैयार थी। भुवन और उसके साथियों ने जब फिर हमारी साइकिल का पीछा किया तो हमने अपनी साइकिल भीड़-भाड़ जगह पर रोक दी। साइकिल से उतर कर हमने पूछा कि ‘क्या बात है?’ वहां पर एक पुलिस कांस्टेबल थे। वो और आसपास के दुकानदार आ गए। सबने उन लड़कों की खूब खबर ली, साथ ही ताकीद दी कि अब कोई दिखा तो खैर नहीं।

महीनों बाद आज हम लड़कियां आजादी महसूस कर रही थीं, साथ ही आत्मविश्वास से भरपूर भी कि अब हमें कोई नहीं सताएगा।

मूल चित्र : Canva Pro 

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