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अब मैं आपकी बहु नहीं बेटी बन कर रहूंगी…और आगे वही हुआ…

मैं इस घर को अपना नहीं समझती हूँ? शिवानी मन ही मन एक निश्चय कर चुकी थी।  बस बहुत हुआ, अब वो इस घर की बहु नहीं बेटी बन कर रहेगी...

मैं इस घर को अपना नहीं समझती हूँ? शिवानी मन ही मन एक निश्चय कर चुकी थी।  बस बहुत हुआ, अब वो इस घर की बहु नहीं बेटी बन कर रहेगी…

इस घर की बहु बनने में न जाने कितने दर्द मिले हैं मुझे, परिवार के हर सदस्य की बस एक ही शिकायत होती थी, मैं इस घर को अपना नहीं समझती हूँ। मैं हमेशा एक बहु बन कर रहती हूँ, मुझे बेटी की तरह रहना चाहिए…

शादी के 2 सालों के बाद भी शिवानी, अपने ससुराल वालों को खुश रखने में नाकाम रही।

आशीर्वाद की जगह तानों की बरसात

आज शादी की सालगिरह की बधाई देते हुए, एक बार फिर विमला जी(शिवानी की सासुमा) ने शिवानी पर आशीर्वाद की जगह तानों की बरसात शुरू कर दी थी, “हम तो तुझे ब्याह कर लाये थे ताकि हमारे घर में बेटी की कमी पूरी हो जाए। बहु नहीं बेटी चाहिए थी हमें। पर तूने तो, ना कभी हमें माँ समझा, ना इस घर को अपनाया। हमारी ही किस्मत ख़राब थी।”

इतना कुछ सुनाते हुए विमला जी को कभी भी शिवानी के मनोभावों की कोई परवाह नहीं होती थी।

शिवानी के लिए तो ये रोज का था पर आज ना जाने क्यों, उसकी आँखे बरस जाने को व्याकुल हो उठी थी। पास में खड़े पति स्वप्निल से अपने आंसू छुपा, शिवानी अपने कमरे की बालकॉनी में जा खड़ी हुई।

तूफान चल रहा था उसके अंतर्मन में

एक अलग ही तूफान चल रहा था उसके अंतर्मन में। क्या कुछ नहीं किया उसने ससुराल में सबको खुश करने के लिय? सुबह की चाय से रात के खाने तक, हर वक्त वो घर के सभी सदस्यों की सेवा में लगी रहती है। लेकिन मम्मी जी ने उसकी तारीफ करने के बदले हमेशा उसे तानों से ही नवाजा है। आंसू अपना बाँध तोड़ गालों पर लुढ़क चले थे। शिवानी मन ही मन एक निश्चय कर चुकी थी।  बस बहुत हुआ, अब वो इस घर की बहु नहीं बेटी बन कर रहेगी…

अपने आत्मसम्मान की रक्षा खुद

शिवानी अपने आंसू पोछ सीधा विमला जी के रूम की तरफ चल पड़ी। अपने आत्मसम्मान की रक्षा खुद करने के ख्याल मात्र से उसमे गजब का आत्मविश्वास आ गया था। विमला जी के रूम के नजदीक पहुचते उसे विमला जी की आवाज सुनाई दी। वो अभी भी फोन पर अपनी बेटी रिया से, उसके बेटी नहीं बहु बन कर रहने का दुखड़ा सुना रही थीं, “अब क्या करें रिया बेटा हमारी ही किस्मत खराब थी। तेरे जाने के बाद शिवानी के रूप में बहू नहीं बेटी मिलने की चाहत दिल की दिल में ही रह गई। अच्छा चल अब फोन रखती हूं।”

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आज से आपकी बहु नहीं बेटी बन कर रहूंगी

रूम से सासू मां की आती आवाजें उसके मन को और दुखी कर रही थीं। अपने मन को शांत कर शिवानी कमरे के अंदर चल पड़ी। फिर  कमरे के अंदर रखी कुर्सी ले ठीक विमला जी सामने जा बैठ गई। फिर उसने विमला जी से कहना शुरू किया, “माँ मैं आपसे कहने आई हूँ की आज से मैं आपकी बहु नहीं बेटी बन कर रहूंगी…” इतना बोल शिवानी ने अपने सर से पल्लू हटा दिया।

ये देख कर जैसे ही  विमला जी कुछ बोलने को हुईं, शिवानी ने फिर से मुस्कुराते हुए अपनी बात कही, “अब जब मैं बहु नहीं आपकी बेटी बन गई तो फिर ये घुंघट अच्छा नहीं लगता ना माँ।  हाँ और भी कुछ बातें हैं जो बेटी बनने के बाद मेरा अधिकार हैं। अब मैं आपकी बेटी बन कर रहूंगी तो कुछ बातों का ख्याल आपको भी रखना होगा..”

“जैसे आप सब रिया दीदी की छोटी से छोटी उपलब्धियों की खुशिया मानते हैं, तो आज से मुझे नोकरी में मिली सफलता पर भी आप सब  उसी तरह से खुशिया मनाएंगे। आख़िरकार मैं अब बहु नहीं आपकी बेटी हूँ।”

मेरे लिए भी अपने बेटे से इन्ही सब बातों की उम्मीद

“जिस तरह से आप रिया दीदी को आशीर्वाद देती रहती हैं, उनके पति उनकी हर बात माने, उन्हें घुमाने ले जाए, शॉपिंग करवाए, उन्हें खूब सारा प्यार करे, उनकी किसी बात पर गुस्सा न हो, मैं भी अब रिया दीदी की तरह आपकी बेटी बन गई हूँ, आप मेरे लिए भी अपने बेटे से इन्ही सब बातों की उम्मीद रखेंगी।”

आराम करने का पूरा हक मिलेगा

“तीसरी और आखरी बात, अब जब मैं आपकी बेटी बन गई हूँ, मेरे बीमार होने पर मुझे भी रिया दीदी की तरह आराम करने का पूरा हक मिलेगा…मुझे आप उसी तरह प्यार से रखेंगी जैसे मैं अपने मायके मैं रहती थी। बेटी बनने का मतलब बेटी की तरह प्यार पाना भी तो होता है न माँ?”

विमला जी हैरान हो शिवानी को देख रही थी।  क्या ये वही शिवानी है जिसे वो पल पल ताने देती थी और वो गर्दन नीची किये बस सुनती रहती थी? विमला जी तो बस उसे नीचा दिखाने के लिए, उसे बेटी नहीं बन पाने के ताने सुनाती थीं। वैसे तो कोई कमी नहीं थी शिवानी में, एक अच्छी बहु के सारे फर्ज़ निभाती थी वो। बस विमला जी को ही उसकी तारीफ करना कभी नहीं सुहाता था।

शिवानी को विमला जी के बदलते चेहरे का भाव खूब समझ में आ रहा था। मन ही मन उसने सोचा, वो तो बस अपनी सासु माँ को उनकी ही खींची तस्वीर का आईना दिखाना चाहती है।  फिर शिवानी विमला जी के हावभाव को नजरअंदाज  कर उनसे बोली, “ठीक है माँ, मैं जा रही हूं शादी की सालगिरह की तैयारियाँ करने”, और शिवानी अपने आंचल को हवा में लहराते हुए  कमरे से बाहर चल दी।

क्या शिवानी ने सही कदम उठाया?

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या शिवानी ने सही कदम उठाया? हम कितनी बार अपने ससुराल में सुनते हैं कि हमें बहु नहीं बेटी बन कर रहना चाहिए। पर क्या ससुराल वाले बहु को एक बेटी की तरह प्यार और अधिकार दे पाते हैं? अपने विचार कमेंट कर के जरुर बताएं।

मूल चित्र : Canva Pro

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Khushi Kishore

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