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विदाई से शुरू होता है ससुराल का पहला सफर…

विदाई की रस्म शुरू हुई, सारी रस्में निभाते पिया जी के साथ गठबंधन किए, रोते-रुलाते जा बैठी मैं कार में और शुरू हुआ मेरे मायके से ससुराल का वो पहला सफर...

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विदाई की रस्म शुरू हुई, सारी रस्में निभाते पिया जी के साथ गठबंधन किए, रोते-रुलाते जा बैठी मैं कार में और शुरू हुआ मेरे मायके से ससुराल का वो पहला सफर…

एक उम्र के बाद हर लड़की को अपना मायका छोड़ ससुराल के आँगन को अपना घर बनाना होता है। लड़कियाँ मायके में  जहां बाबुल की चिड़िया बन चहकती रहती हैं, ससुराल में परम्परा और ज़िम्मेदारियों के बीच खुद ही समझदार बन जाती हैं, ऐसा ही मन जाता है। 

मायके से ससुराल का ये सफर ना जाने कितने रस्मों, अनकही कितनी परम्पराओ को खुद में समेटे हुए होता है।

मायके से ससुराल का वो पहला सफर

आज ब्लॉग लिखने बैठी, तो मायके से ससुराल का वो पहला सफर अनायास ही यादों के गलीचे से निकल, शब्दों का कारवां बुनने लगा..

संयोगवश पढ़ाई पूरी होते मेरी शादी तय हो गई थी। अरेंजड मैरिज थी हमारी, घर वालों ने जोड़ी बनाई थी और जैसे की हर अरेंज्ड मैरेज में होता है, लड़का लड़की एक दुसरे को ठीक से जाने बिना विवाह सूत्र में बंध जाते हैं।

शुभ मुहुर्त में मेरी भी विवाह की रस्मे संम्पन हो चुकी थी।

पांव में पाजेब, हाथों में मेहँदी, पीले सिंदूर से भरी मांग, पूरे सोलह सृंगार कर लाल रंग के जोड़े में सजी, विवाह मंडप से अपने कमरे में आ कर बैठी ही थी, कि थोड़ी ही देर में बुआ ने आ कर बोला तैयार हो जा विदाई का समय हो गया है।

विदाई के नाम पर लगा कि सब छूट गया 

अभी तक तो सब अच्छा अच्छा लग रहा था। हंसी ख़ुशी से सारी रस्में सम्पन हुई थीं, पर विदाई शब्द से ही मन दुःख के समुद्र में डूबा जा रहा था। मम्मी पापा को छोड़ कितनी बार मैं शहर से बाहर गई थी पर न जाने क्यों विदाई कर जाना, ऐसा लग रहा था.. अपना बचपन, अपने रिश्ते, अपना घर सब पीछे छोड़ जा रही हूँ।

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विदाई की रस्म शुरू हुई। सारी रस्मे निभाते पिया जी के साथ गठबंधन किए, रोते रुलाते जा बैठी मैं कार में। समय निकला जा रहा था तो सबको रोते छोड़ कार चलाने को बोल दिया गया और शुरू हुआ मेरे मायके से ससुराल का वो पहला सफर…

कार में बस, मैं, मेरे पतिदेव और ड्राइवर थे। नवम्बर की सर्दी का महीना था, मैं अभी भी अपने घुंघट में सिसकियाँ ले रही थी। मेरे पिया जी को मुझे चुप करवाने का कोई उपाय न सुझा, तो मेरा हाथ अपने हांथो में ले, हांथो में रची मेहँदी में अपना नाम देखने लगे। फिर क्या था सारी रुलाई एक पल में भूल, मैं खुद में ही सिमट कर बैठ गई थी। मेरे चुप होते जब हाथ छोड़, पतिदेव  बोले, “आराम से बैठ जाइये।” तब पतिदेव के इस केयर से मन प्रेम की फुहारों से भींग चुका था।

जीवनसाथी के साथ का एहसास, बाबुल का आंगन छोड़ने के दुःख पर मरहम लगा रहा था। 2 घंटे के उस प्यारे सफर में पतिदेव इधर-उधर की बातें करने की कोशिश करते रहें।

परम्परा थी डोली में बैठने की 

थोड़ी देर में मेरा ससुराल आ गया था। घर से थोड़ी दूरी पर कार रोक दी गई और मेरे सामने, फूलों से सजी खुबसूरत सी डोली खड़ी मेरा इन्तजार कर रही थी। ससुराल की परम्परा थी दुलहन पहली बार डोली में बैठ कर ही ससुराल के आंगन में जाती थी। मेरे ससुर जी की इच्छानुसार ये परम्परा निभाई गई और मैं डोली मैं बैठ गई थी।

ससुराल का पहला सफर वो भी डोली में बैठ कर, उसकी यादें मुझे आज भी उतना ही रोमांचित करती हैं। ससुराल के आँगन में पहुचँ सारी रस्में निभाई गयीं और मुझे मेरे कमरे में आराम करने के लिए छोड़ दिया गया।

मायके से ससुराल के उस सफर में पतिदेव का जो साथ मिला। जीवन के हर सुख दुःख के सफर में उन्होंने वो साथ बखूबी निभाया।

मूल चित्र : Canva 

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Khushi Kishore

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