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सिंदूर-चूड़ी का कानून, पति और पत्नी, दोनों पर लागू होना चाहिए!

पुरुष को भी विवाह के बाद साज-सिंगार करने और विशेष पहनावे को लेकर कानून बनना चाहिए, या फिर स्त्री को भी इन सब से आजादी मिलनी चाहिए।

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पुरुष को भी विवाह के बाद साज-सिंगार करने और विशेष पहनावे को लेकर कानून बनना चाहिए, या फिर स्त्री को भी इन सब से आजादी मिलनी चाहिए।

अभी हाल ही में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक तलाक के मुकद्दमे की सुनवाई करते हुए कहा है कि “अगर पत्नी चूड़ियाँ पहनने और सिंदूर लगाने से मना करे तो इसका मतलब है कि उसे शादी मंजूर नहीं है।” कोर्ट ने इस आधार पर तलाक के लिए याचिका डालने वाले इंसान को तलाक दे दिया भी है। जबकि फैमिली कोर्ट ने इसके उलट में फैसला सुनाया था, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुँचा।

समता का अधिकार क्या फ़र्ज़ी है?

हाईकोर्ट के इस निर्णय पर मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि हमारे कानून, भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों में से एक है – समता का अधिकार।

अब हम हाईकोर्ट के इस फैसले को कानूनों के हिसाब से देखते हैं। सबसे पहले हम समता के अधिकार के आधार पर यदि बात करें तो इस मामले में या कहें स्त्री-पुरुष के अन्य मामले समता कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आती।

विवाह के बाद साज-सिंगार सिर्फ स्त्री के लिए क्यों?

स्त्री-पुरूष भेदभाव की खाई तो समाज में और गहरी है। जब हाईकोर्ट ही स्त्री और पुरुष में भेदभाव करेगा तो समाज का कहना ही क्या। जब एक स्त्री को विवाह के बाद साज-सिंगार करने, जैसे, माँग में सिंदूर लगाना, कलाई में चूड़ियाँ पहनना, गले में मंगलसूत्र पहनना आदि-आदि, को कानूनी तौर पर सही माना जाता है, तो ऐसा विधान पुरूषों के लिए क्यों नहीं है?

पुरुष को भी विवाह के बाद साज-सिंगार करने और विशेष पहनावे को लेकर कानून बनना चाहिए। या फिर स्त्री को भी साज-सिंगार और विशेष पहनावे से आजादी मिलनी चाहिए। स्त्री को साज-सिंगार आदि के आधार पर कुँवारी या विवाहित नहीं मानना चाहिए। आज का समाज बदलाव चाहता है।

इस मामले को स्वतंत्रता के अधिकार के आधार पर आँकते हैं

अब इस मामले को स्वतंत्रता के अधिकार के आधार पर आँकते हैं। जब सबको अभिव्यक्ति, वृत्ति, प्राण और दैहिक आदि की स्वतंत्रता है। तब कोई स्त्री को साज-सिंगार करने आदि को विवश नहीं कर सकता और न ही उस पुरुष से अगल रहने से मना कर सकता है।

समाज में सम्पत्ति के मामले में स्त्री और पुरुष में काफी भेदभाव

इस मामले को मैं संपत्ति के अधिकार के आधार पर भी विश्लेषित करना चाहता हूँ । सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए एक निर्णय में नागरिकों के निजी संपत्ति पर अधिकार को मानवाधिकार घोषित किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार भले ही संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं रहा इसके बावजूद भी राज्य किसी व्यक्ति को उसकी निजी संपत्ति से उचित प्रक्रिया और विधि के अधिकार का पालन करके ही वंचित कर सकता है।

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दरअसल, समाज में सम्पत्ति के मामले में स्त्री और पुरुष में काफी भेदभाव देखने को मिलते हैं। और सबसे दुःख की बात ये है कि आज भी पुरुष औरत को अपनी निजी सम्पत्ति समझता है और इससे भी ज्यादा दुःखद ये है कि पुरुष औरत को भोग-विलास की वस्तु समझता है। ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। न ही औरत पुरुष की सम्पत्ति है और न ही पुरुष औरत की। अब पुरुष औरत को भोग-विलास की वस्तु समझना बन्द करे वर्ना कहीं ऐसा न हो कि औरत पुरूष को भोग-विलास की वस्तु समझने लगे।

मैं चाहता हूँ कि जमीनी स्तर पर पुरुषों की भाँति स्त्रियों को भी संपत्ति का मालिकाना हक मिले। चाहे कृषि योग्य भूमि हो या फिर निवास योग्य, हर भूमि में पुरूष की भाँति स्त्री को भी यानि 50- 50% मालिकाना हक मिले। जमीनी कागजातों पर पुरुष किसान यानि किसान से साथ महिला किसानों यानि किसानिनों का भी नाम दर्ज हो। तभी दुनिया की आधी आबादी को अपना हक मिल सकेगा।

वक्त है स्त्री और पुरुष दोनों को अपनी सोच में बदलाव लाने का

अब वक्त आ गया है, स्त्री और पुरुष दोनों को अपनी सोच में बदलाव लाने का। समाज में असमानता को मिटाकर समानता लाने का क्योंकि स्त्री और पुरुष में सामंजस्य जरूरी है। आपसी सामंजस्य से ही ये दुनिया चलती है।

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