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इक बार बचपन मैं फिर से जी जाऊँ…

Posted: जुलाई 10, 2020

मन करता है बिना बात के हँसु और हँसाऊँ, शीशे के आगे बन-ठन कर, मुँह तरह-तरह के बनाऊँ, अपने मन की सब्जी, माँ से कह कर बनवाऊँ, इक बार मैं बचपन जी जाऊँ।

मन करता है, इक सपना देखूँ।
सपने में ही सही, इक बार मैं बचपन जी जाऊँ।

मन को रखो काबू में, हर कोई ये कहता है।
कैसे रखूँ काबू में? ये हर वक्त मचलता रहता है।
कोई बता दे मुझको, कैसे मैं काबू पाऊँ?
इक बार मैं बचपन जी जाऊँ।

वो मेरा प्यारा सा घर, उसका छोटा सा अँगना।
मेरे छोटे-छोटे खिलौने, डिब्बी में सहेजा कँगना
इक बार नज़र भर देख आऊं।
इक बार मैं बचपन जी जाऊँ।

वो स्कूल, वो रास्ते, वो गोलगप्पे का ठेला।
वो बचपन के साथी, वो बच्चों का रेला।
इक बार उन सबसे मिल आऊँ।
इक बार मैं बचपन जी जाऊँ।

मन करता है बिना बात के हँसु और हँसाऊँ।
शीशे के आगे बन-ठन कर, मुँह तरह-तरह के बनाऊँ।
अपने मन की सब्जी, माँ से कह कर बनवाऊँ।
इक बार मैं बचपन जी जाऊँ।

मन करता है फिर से ऊँगली पकडूँ मम्मी पापा की।
समझूँ खुद को राजकुमारी, सोच-सोच इतराऊँ।
इक बार मैं बचपन जी जाऊँ।

वो बड़े भाई का प्यार और छोटी बहना का सम्मान।
वो साथ-साथ खाना, खेलना, हर ग़म से अन्जान।
किसी बात पर अड़ जाऊँ और अपनी जिद मनवाऊँ।
इक बार मैं बचपन जी जाऊँ।

बरस बीत गए, तुमको देखे माँ।
मिल जाओ इक बार अगर तो चिल्ला-चिल्ला कर रोऊँ।
छोडूँ नहीं तुम्हारा पल्लू, गले तेरे लग जाऊँ।
इक बार मैं बचपन जी जाऊँ।

बचपन की वो यादें, अमूल्य रत्नों सी हैं।
पर धुँधला सी गई है वो यादें, कैसे सहेजूँ उनको जीवन पर्यन्त।
यही सोच-सोच घबराऊँ।
इक बार मैं बचपन जी जाऊँ।

मन करता है, इक सपना देखूँ।
सपने में सही, इक बार मैं बचपन जी जाऊँ।

मूल चित्र : Canva

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Samidha Naveen Varma Blogger | Writer | Translator | YouTuber • Postgraduate in English Literature. • Blogger at Women's

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