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‘नारीवादी प्रयोग’ का एक नया ही मतलब आज मुझे समझाया जा रहा था…

Posted: July 8, 2020

देखो असली नारीवादी प्रयोग यही है, हर चीज़ चाहे छोटी हो या बड़ी, मर्द की हो या औरतों की, पर विज्ञापन में बस लड़कियाँ क्यों खड़ी की जाती हैं? बताओ! बताओ!

कुछ महीने पहले एक नामी गिरामी कवि मंच वालों ने दिल्ली में एक काव्य सम्मेलन तथा चर्चा मंच का कार्यक्रम रखा। हमें भी अपने मित्र कवि से इस आयोजन के बारे में पता लगा तो मन किया कि जाया जाएँ। छुट्टियाँ अभी हमारे खाते में पड़ी थीं तो तय कर लिया कि घूम भी आते हैं और कविता पाठ का आनंद भी उठा लेते हैं।

हमारे साथी कवि ‘संजीव कुमार, हंसोड़ जी’ का बढ़िया साथ मिल गया। तो दोनों कवि मित्र शताब्दी ट्रेन में सीट बुक करवा कर चल पड़े। सम्मेलन रविवार को था तो शनिवार की रात तक वहां पहुंच गए।  रात एक होटल के कमरे में बिताई। और फिर सुबह ठीक समय पर आयोजन स्थल पर।

कभी-कभी मज़ाक के नाम पर फूहड़-अश्लील भी होने का उन्हें पता नहीं चलता था

पर जो नज़ारा हंसोड़ जी के संग ये सफर तय करने में आया उसे हम शब्दों में बयान नहीं कर सकते। सचमुच अपने नाम के जैसे ही हंसोड़। हाँ! कभी-कभी मज़ाक के नाम पर फूहड़-अश्लील भी होने का उन्हें पता नहीं चलता था। तो अभी तक हम सहनशक्ति दिखा रहे थे।

मुझे वे तस्वीरें बेहद अश्लील दिखाई देती थीं

उनके रसिक मिज़ाज की झलक उनकी कविताओं में भी दिखाई देती है। परन्तु उनकी कविता की पृष्ठभूमि में लगी तस्वीर में अधिक दिखाई देती थी। बल्कि मुझे तो वे तस्वीरें बेहद अश्लील दिखाई देती थीं । जिनमें उनके चंचल मन की तरह चंचल, छरहरी , सुंदर, रस भीगी लड़कियों की तस्वीरें नशा बांटती नजर आती थीं।

कविता की प्रशंसा तो न के बराबर बस तस्वीरों की मादकता पर कसीदे पढ़े जाते

हमने कई बार इस सबके कारण उन्हें टोका भी कि इतनी अश्लील तस्वीरें कविताओं के संग शोभा नहीं देती। वे कहते देखते नहीं कितनी लाइक आती हैं ।और ये सच था भर-भर के कमेंट आते थे जिसमें कविता की प्रशंसा तो न के बराबर बस तस्वीरों की मादकता पर कसीदे पढ़े जाते। और देखने वाली बात थी स्त्री कवियों या प्रशंसकों के एक भी कमेंट नहीं।

हमारी कविता की शैली, शब्दावली, छंद, विधा, अभिव्यक्ति उनकी कविताओं से बेहतरीन होती थी पर फेसबुक, व्हाट्सप्प पर उनकी कविताओं की धाक थी। 5000 तक दोस्तों का उनका भरा-पूरा प्रोफ़ाईल था।

विषय था कविता में नारीवादी प्रयोग

इसी समय के दौरान ‘चर्चा मंच’ सज चुका था । विषय था, Feminist Use in poetry यानि कविता में नारीवादी प्रयोग। चलो सुनना शुरु किया बड़ी-बड़ी बातें हो रही थीं, परन्तु कोरी आदर्शवादी कि कविता जगत में नारियां नारी के लिए आवाज़ बुलंद कर रही हैं। आगे आ रही हैं। ये-वो-पता नहीं क्या-क्या।

हंसोड़ जी उस कवयित्री पर हंसे जा रहे थे

मज़े, या दुःख की बात कहें तो अच्छा, मंच पर चार कवि और एक कवयित्री थीं। जिसकी आवाज़ भी हमें सुनाई नहीं दे रही थी क्योंकि उसे बोलने का मौका ही नहीं मिल रहा था। जब भी वो बोलने लगतीं बाकी कवि ‘हाँ जी-हाँ जी’ बोलते और जोश से ऊँचे स्वर में बात करनी शुरू कर देते।
हंसोड़ जी उस औरत पर हंसे जा रहे थे। अब हमें गुस्सा आने लगा।चाय का बहाना कर, बड़ी मुश्किल से उनकी बाँह पकड़ के बाहर लाए।

हंसोड़ जी बोल नहीं, बके जा रहे थे

हंसोड़ जी बोल नहीं, बके जा रहे थे। चुप तो वो हो ही नहीं सकते। कहते ,”मैडम अगर जरूरत से अधिक मेकअप करके आती, ढंग के कपड़े पहनती, कुछ अदा दिखाती तो मजाल है वो बाकी कवि बोल पाते! उसे नजरअंदाज कर पाते! और हम भी यूँ उठ कर बाहर न आते। और तब मानते कि ‘Feminist use in poetry’ काव्य में नारीवादी प्रयोग! हो रहा है।”

हमने खीझ कर कहा, “क्या बकते हैं?”

उन्होंने कहा, “अरे! गुस्सा क्यों कर रहे हैं?”

देखो असली नारीवादी प्रयोग यही है। हम विस्तार से समझाते हैं। छोटी से छोटी दुकान और बड़े से बड़े मॉल में रिसेपशन पर यह क्यों लिखा जाता है कि आकर्षक व्यक्तित्व की लड़कियों को प्राथमिकता दी जाएगी। हर चीज़ चाहे छोटी हो या बड़ी, मर्द की हो या औरतों की पर विज्ञापन में बस लड़कियाँ क्यों खड़ी की जाती हैं? बताओ! बताओ!

वो एकदम चुप हमें लगा कि उन्हें अक्ल आने लगी

हमने कहा,”महाशय! काम पर टिकती वही लड़कियाँ हैं जो कुछ काम भी जानती हों ऐसे हथकंडों से नौकरी ली जा सकती है पर टिकने के लिए मेहनत और संबंधित काम की जानकारी ही काम आती है। ये आपकी थोथी, रूढ़ीवादी मानसिकता है। समाज में केवल आकर्षण के बल पर कर कोई लंबे समय तक सफल नहीं रह सकता। और वो एकदम चुप हमें लगा कि अक्ल आने लगी!

हंसोड़ जी धीरे से बोले,”अब रौनक लगेगी”

हंसोड़ जी की मानसिकता बदलने में हम कामयाब हो गए ! पर ये क्या वो घूर रहे थे ,एक प्रसिद्ध शायरा को जो अभी-अभी वहाँ अपने प्यादों के संग दाखिल हुई दी। कवि सम्मेलन वाली न तो वेषभूषा, मेकअप से असली नैन-नक़्श छिप चुके थे। और सब उन्हीं की तरफ टकटकी लगाए देख रहे थे ।
तभी हंसोड़ जी धीरे से बोले,”अब रौनक लगेगी! फीस लेकर कविता पाठ करती हैं और ये भी जरूरी नहीं कि रचना इन्हीं की हो!” बस वाह-वाह होनी चाहिए ।और बस वाह-वाह का ही जमाना है। बस वायरल! ‘आजकल वायरल ही हिट है वरना कुछ लोगों के लिए फिट है!’

हंसोड़ जी बोले, “अच्छा बताओ कितनी एन्ट्री फीस दी?”

हम बोले, “अच्छे आयोजन में सहयोग राशि तो देनी पड़ती है और देनी भी चाहिए। ताकि आयोजन चलते रहें।”

हम उनकी बात से उनकी शक्ल ताकते रह गए

हंसोड़ जी बोले, “पर मुख्य कारण इन मोहतरमा जैसे एक-दो विशिष्ट प्रतिभागियों की प्रस्तुति के लिए होता है। ताकि इन लोगों का खर्च उठाया जा सके। वरना आपके जैसे ज्ञानी कवि/कवयित्रियों के लिए इतना ताम-झाम कौन करेगा?” और हम उनकी शक्ल ताकते रह गए।

हंसोड़ जी की बात जो भी थी, पर हम ठहरे संस्कारी, आदर्शों पर चलने वाले आदर्शवादी कवि, जो ऐसी दलीलों से अपने आदर्श नहीं बदलने वाले थे।

पर हंसोड़ जी फिर बोले, “अदा का जमाना है, लुट जाते हैं लोग! यही सब कुछ होता है।
हम हंसोड़ बस हंसते-हंसते गंभीर बात कर रहे हैं और आप पचा नहीं सकते तो खीझ रहे हैं?”

हंसोड़ जी का नारीवादी प्रयोग का प्रवचन बिना फीस के चल रहा था

हंसोड़ जी का नारीवादी प्रयोग का प्रवचन बिना फीस के चल रहा था, “नारीवादी प्रयोग के नाम पर हम जैसे मर्दों की रुचि ही देखी जाती है और कविता पेश नहीं ‘परोसी’ जाती है। हम जैसे रसिक को ध्यान में रख कर खबरें, फिल्में, गाने,कविताएँ, तस्वीरें सब सरूर भरी बनाई जाती हैं। ताकि हम जैसे हंसोड़ खुल के और आप जैसे चुपके-चुपके मज़ा ले सकें! अगर ऐसा न होता तो ज्ञानी, सच्चे कवि और उनकी शोध भरी सच के नारीवादी प्रयोग से भरी कविताएँ वायरल होतीं।”

चोट हमें लग रही थी और हंसोड़ जी अपने नारीवादी प्रयोग पर हंसे जा रहे थे

अब हमारी सहनशीलता का रबड़ टूट चुका था। पर दुख था कि चोट हमें लग रही थी और हंसोड़ जी हंसे जा रहे थे।

तो हम फूट पड़े, ” माना ऐसे सच्चे सेवक कुछ गिने-चुने लोगों में बस सुने जाते हैं क्योंकि जो उन जैसे सच्चे कदरदान होंगे वही समय निकालेंगे। और हम संतुष्ट हैं क्योंकि हम भरे घड़े हैं आप जैसे उथले नहीं।”

इसी बीच हमारे एक और सज्जन कवि मित्र वहाँ आए जिन्हें हममें रुचि थी तो स्पष्ट था कि वो हंसोड़ जी सरीखे नहीं थे। और पूछने लगे, “अरे! मीना जी, कला जी, सुधा जी में से कोई नहीं आया?”

उनका तो कविता वाचन में नाम भी था। फोन करने की सोची और हम फोन करने लगे। हमारे कवि ग्रुप में हम एक दूसरे के लिए भाई-बहन से कम नहीं थे। आत्मीय स्नेह ,भाव स्नेह का रिश्ता। इस रिश्ते को नाम न भी दिया जाए तो भी ठीक, कोई फर्क नहीं पड़ता। बस सम्मान, आदर, आभार।
इसलिए फोन करने में झिझके नहीं। परन्तु तीनों का उत्तर एक ही था कि उन महान शायरा के कारण वो नहीं आ रही जो अभी-अभी आयोजन स्थल पर पहुँची थीं। उनका कहना था कि उस शायरा के सामने हमें कौन सुनेगा! किसी साधारण से कार्यक्रम में आ जाएंगे।

अब गुस्से में हमारा साँस लेना मुश्किल था

अब हमें पूरा गुस्सा था और हंसोड़ जी की तरफ उसी गुस्से में देखने लगे। परन्तु हंसोड़ जी और जोर से हंसे। अब हमारा साँस लेना मुश्किल था। तो हंसोड़ जी को छोड़ अपने उन्हीं कवि मित्र के संग चल पड़े।

पर सचमुच कवि सम्मेलन में रौनक, रूप, जोश सब शायरा के आने पर दिखा। जैसे ही वे अपनी प्रस्तुति देकर बैठी, हॉल में संख्या कम होने लगी। हंसोड़ जी के हंसने की आवाज़ पहली पंक्ति में से ही कहीं से आ रही थी। हम भी धीरे से बाकी लोगों संग पीछे से अपने बाद में मिले कवि मित्र के संग निकल लिए।

आयोजक के पैसे पूरे हो चुके थे। हमारी तैयार की कविता मन में सहकती रह गई वैसे ही जैसे फेसबुक, व्हाट्सप्प पर ग्रहण खाई रहती हैं। हमसे तो समझदार हमारी कवयित्री मित्र थीं।

अगर किसी कवयित्री के पति हंसोड़ जी जैसी सोच के मालिक हों तो वो तो कभी लिख ही न पाएं। अगर लिखें भी तो गुमनाम! बिना प्रोफ़ाईल फोटो के। परन्तु उनके सुंदर शब्द, भाव मन में ऐसी छवि बना देते कि जो कविता रचना की प्रेरणा बन जाती हैं।

नारीवादी प्रयोग के कई अच्छे साधक कभी सामने ही नहीं आ पाते

और ऐसी कवयित्रियाँ सच्चे तपस्वी सी अंधेरे में शब्दों के दीपक जलाती हैं कि पढ़ने वाले के दिल को,आत्मा तक को रौशन कर जाएं। पर अफसोस उनके घर के ही लोग उस उजाले से अपने मन को उजला नहीं बना पाते। परन्तु फिर भी वे जुगनू बुझते नहीं, दिन की रौशनी में गुम और रात को चमकने लगते हैं और उन जैसे शब्दों के उजाले के पारखी बिना उनकी सूरत देखे उनके शब्दों के अमृत पीकर अपनी आत्मा को तृप्त करते हैं।

कई लोग नारीवादी प्रयोग के नाम पर नेत्र संतुष्टि करके खुश हैं

जबकि नारीवादी उपयोग संबंधी गंदी, भौंडी, आदिम, रूढ़ीवादी सोच वाले हंसोड़ जैसे लोग आत्मा की संतुष्टि से दूर केवल अपनी नेत्र संतुष्टि करके खुश रह लेते हैं और अपनी मानसिकता से कला, काव्य की दुनिया को नशे की दुकान सिद्ध करने में लगे रहते हैं।

ऐसे कवि को रवि तक क्या पहुँचना है, वे अपनी सोच के अंधे कुँए में गिरे रहते हैं। और सच्चे साधकों को गुमनामी की दुनिया दे जाते हैं।

मूल चित्र : Canva 

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