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मनमानी आप करो तो ठीक…मैं करूँ तो बेइमानी?

Posted: July 11, 2020

औरतें नाक-मुँह बंद किए निर्जीव पड़ी रहें तो सुशील! और अगर कहीं सब ठीक करने के लिए आगे बढ़ कर कमान संभाल लें तो मनमानी? विरोध?

सुगढ़, सुशीला, सलोनी सी मंद-मंद मुस्कान चेहरे पर सजाए , मेहंदी लगे हाथों से सबके दिलों पर अपनेपन की दस्तक देती। हमेशा निश्चिंत रहने वाली वो सुकुमारी समिता आज कुछ रस्मों की गवाही में परिपक्व सोच-समझ वाली बहू बन गई थी।

यह आधारभूत परिवर्तन केवल रस्मों-रीतियों के कारण हुआ?

यह आधारभूत परिवर्तन केवल रस्मों-रीतियों के कारण हुआ? नहीं! यह उसकी उम्र भर की परवरिश का कमाल है, जिसमें रिश्तेदारों, पड़ोस, घर के सब सदस्यों और सबसे अधिक माँ के कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन के कारण संभव हुआ था़। इसी की बदौलत आज वो अपने जीवन के इतने बड़े मूलभूत परिवर्तन को सहज ही अपना गई थी।

नई बहू की उपाधी सिर पर एक मुकुट की तरह लगती है 

और ये नई बहू  की उपाधी समिता अपने सिर पर एक मुकुट की तरह महसूस करती है।

तभी मोहल्ले की औरतें मुँह दिखाई के लिए बहू समिता को मिलने आईं! और उनके मुँह से निकलता है कि,”बहू खूबसूरत तो बहुत है, पर….”

यह सुन कर नई बहू सोचती है कि, “अरे! यह इनकी शंका का इजहार है या खुशी?” और बाकी बात इशारों में पूर्ण हुई कि, “बाकी गुणों में भी कमाल है कि नहीं?” उसके आस-पास से कहीं आवाज़ आती है कि “देर किस बात की यहीं रहना है, सब पता चल ही जाएगा!” और तभी मंथरा मुस्कराहट आँगन में बिखर जाती है!

लड़की किसी से उम्मीद लगा सकती है कि  नहीं?

सत्य है , लड़की की बेटे की नज़र में रूपसी हो!  सास की नज़र में हर कार्य में दक्ष! बाकी परिवार के सदस्यों की उम्मीदों पर पूरी खरी उतरने के लिए एक अकेली लड़की, हर प्रयास करती है। पर भूले से भी उसका दिमाग यह नहीं सोचता कि क्या वो भी किसी से उम्मीद लगा सकती है कि नहीं?

और ये उम्मीद की बात केवल ससुराल के नजरिए से ही नहीं अपितु उस घर के नजरिए से भी देखी और महसूस की जा सकती है, जो पहले लड़की का घर और अब मायका है। वहां के भी शब्द दिमाग में कौंधते हैं कि “तुम्हारा असली घर वही होगा! तो यहाँ बहुत अधिक उम्मीदें मत पाल लेना! वगैरह! वगैरह! और यह सब कोई और नहीं अपितु उस लड़की की स्वजातीय माँ, दादी बड़े अधिकार से अपने ही जिगर के टुकड़े को व्यवहारिक बनाने की होड़ में कह जाती हैं।

जरूरी नहीं कि हर ससुराल में बहू के लिए यही हालात हों! परन्तु अगर सब ठीक भी हो तो श्रेय अधिकतर किसे जाता है? यही कि ‘ससुराल वाले बहुत अच्छे हैं। बड़े अच्छे से रखा है।’ बस लड़की इतना ध्यान रखे कि वह कोई उम्मीद पति, सास, ननद, बाकी सदस्यों से नहीं लगा सकती। ब्रहम वाक्य, “क्योंकि यही दुःख का मुख्य कारण है!”

जब भी प्रश्न खड़े किये जाएंगे, तो लड़की याद रखे कि उसको स्वयं को सींचने वाले पिता, पति , पुत्र के साथ अपने जीवन के लिए, खुद उनसे तारतम्यता बना कर रखनी पड़ेगी। तो कोई रास्ता नहीं? हो भी सकता है। जैसा कि समिता ने चुना!

जब समिता को इस तरह के धर्म संकट से गुजरना पड़ा तो उसने कुछ अलग ही तरीके से उन प्रश्नों का जवाब दिया!

तो बेहद खुबसूरत समिता, जो खूब उपहार, आलिशान शादी के आयोजन के बाद विदाई के समय  जब अपने पापा के गले मिलती है तो पापा कहते हैं,”बेटा सबका ध्यान रखना! शिकायत का मौका न आने देना!”

पर क्या ऐसी शिक्षा ससुराल पक्ष को भी किसी ने दी होगी? और ऊपर से समिता नौकरी भी करती है। वाह! सुंदरता, सम्पन्नता मुख्य गुणों से विभूषित बहू! ससुराल वालों की तो लॉटरी लग गई! और तभी कहीं मसख़री सी आवाज़ आई कि, “अम्मा! तेरा तो राज़ गया! अब तो बेटा गया, माडर्न बहू के हाथों में!”

बेचारी माँ! ये बात सुन उसके दिल पर क्या गुजरी होगी कोई नहीं समझ सकता!

माँ जो दो महीने से सुंदर ख्वाब का कसीदा अपने मन की चादर पर रंग- बिरंगे फूलों सा निकाल रही थी वो क्या उजड़ जाएगा! और मन ठंडी आह भरता है कि , मेरा बेटा भी अब मेरा ना रहेगा।

अब तक जो एक माँ थी, सास की रस्में अनजाने में ही निभाने लगेगी

यह काँटा जो आज एक माँ के दिल में गढ़ गया ये किसी और पुष्प को अब कहाँ खिलने देगा?

पर समिता की सुंदर सूरत देख नई सास ये सब कुछ देर के लिए भूल जाती है। परन्तु कब तक? लगातार कोचिंग से इतना डॉटा फीड हो जाएगा कि ये माँ, सास की रस्में अनजाने में ही निभाने लगेगी! और जहाँ से कोचिंग मिल रही है वो भी किसी दूसरी दुनिया की थोडे ही है!  नहीं! कोई अनोखी नहीं! अजी! उनका भी यही इतिहास है। बस चल रहा सब क्रम से!

बूँद-बूँद पानी की चोट बहुत खतरनाक होती है। और यह चोट तो उसी चोटिल औरत(सास) को भी कभी लगी थी! जो उस समय से अपने प्रश्नों का एक भी उत्तर नहीं ले पाई थी। इसलिए मन में आत्म ग्लानि, पछतावा,  क्षोभ और शायद फिर बदला ! कुछ परिभाषित नहीं! कुछ प्रत्यक्ष नहीं! पर अंतिम निष्कर्ष यह कि बहू को ही समन्वय करना होगा !

मैं सास! बहू के कारण भी मैं ही क्यों ढलूं?

सास की मनोदशा कि,”मैं सास! बहू के कारण भी मैं ही क्यों ढलूं? तो “घर में खाना-पीना, कपड़े, दिनचर्या सब नियम से ! तथा अब ये नियम और भी सख्ती से पालन करवाए जाएंगे । बहू के अनुसार कुछ परिवर्तन नहीं हो सकता। नहीं! कुछ बदल नहीं सकता!

यहां तक कि शो केस में रखे सजावटी सामान में रखी गई चीजें साफ करने के बाद वहीं उसी जगह पर रखनी हैंं! तिल भर भी परिवर्तन नहीं! कहा ना ! वहीं तो बस वहीं।

हमारे यहाँ ऐसे नहीं बनता ! हमारे यहाँ ऐसे नहीं चलता!

पर समिता नौकरी पर जाएगी तो गहनों से असुरक्षा का डर। भारी कपड़ों में असुविधा होगी! तो आगे से उत्तर मिलता है कि,”नहीं! पर लोग क्या कहेंगे? और बहुत से नियमों में से एक सख्त नियम कि,”नौकरी से घर, घर का काम, बस रात को ही आराम!” सब नियम से, नौकरी से भी अधिक अनुशासन का पालन घर में।

अभी समिता संतुलन करने के लिए अपने आप को भूल कर, थकावट भूल कर, सब कर रही थी।कभी-कभी बहुत थकी होने के कारण एक क्षण लेटने का मन करता! पर नहीं, अच्छा नहीं लगेगा!परन्तु निरंतर पड़ने वाला शरीर पर बोझ, जो धीरे-धीरे मन पर, फिर आत्मा पर और फिर यह अनजाने ही सबको दिखने लगेगा।

क्यों दिखने लगेगा? अरे! क्योंकि वह भी इंसान  है!

क्यों दिखने लगेगा? अरे! क्योंकि वह भी इंसान  है! खाना पचाने के लिए तो जानवर भी दम भर बैठ लेते हैं

और एक दिन ऐसा ही हुआ! क्रमवार, लंबी, निरंतर थकावट ने उस दिन कमर सीधी करवाते हुए समिता को समय का पता ही नहीं लगने दिया! और एक घंटा बीत गया, समिता अभी भी सो रही थी!

उस दिन शाम को जब पति आए तो उससे बोले ही नहीं! रोज़ समिता को चाय बनाने को कहते थे! पर आज माँ को कह दिया। समिता को लगा, चलो! फिर क्या हुआ! परन्तु कमरे में भी बिलकुल नहीं आए।

समिता ने फिर सोचा, “चलो! मैं भी वहीं उनके साथ ही बैठ जाती हूँ।” परन्तु  कमरे में कर्फ्यू जैसा माहौल देख, समिता वापिस अपने कमरे में आ गई। कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि समिता का क्या हाल हुआ होगा!

हम अक्सर बहू को इसी भाषा में समझाते हैं 

उस दिन मायके की बहुत याद आई। बातें सुनाने वाली माँ,  दादी की नसीहतें दिमाग में घूम गईं। और शायद समझ गई कि इसी तरह की परीक्षा के लिए वो दोनों उसे तैयार करती रहतीं थीं। परन्तु स्पष्ट पता लगे ना कि अपराध क्या हुआ है? भोली समिता इतना भी नहीं समझी कि बहू को इसी भाषा में समझाया जाता है।

रात को पति को कमरे में देख बहुत खुश थी। और सब भूलना चाहा! पर जैसे ही समिता कुछ बोलने को हुई तो पति देव बोले, “देखो जैसे चल रहा है, ना! चलने दो! तुम्हारी मनमानी यहाँ नहीं चलेगी!” और समिता वहीं चित्रवत्! मन किया कि अपने अर्धांग से दिल की बात कह दे! पर नव प्रत्यारोपित अंग को ही यहाँ सब संभालना होगा! इसलिए समिता ने ससुराल वालों के हिसाब से सब ठीक करने की सोची।

अब बहु की कमाई पर सबका हक़ सिवाय उसके?

अब समिता की शाम, रात, सुबह सब फिर से सुहानी हो गईं! एक दिन ससुर जी ने चाय पीते हुए समिता से पूछा, “बेटा! इस महीने की सैलेरी नहीं आई?” तो समिता ने अगले दिन दफ़तर में पूछा! पर जवाब नहीं मिला! तो सोचने लगी कि अपनी ही मेहनत की कमाई संबंधी क्या आज घर में फिर प्रश्नवाचक नजरों का उसे सामना करना पड़ेगा!” और इसी धर्म संकट से बचने की कवायद में दफ्तर में क्लर्क से कहा सुनी हो गई।

घर आई तो सासू माँ किसी और ट्रैक पर चलते हुए कह रहीं थीं, “तुमने सुबह बेटे की शर्ट अच्छी तरह इस्त्री नहीं की थी तो दोबारा करनी पड़ी थी।”

सास: “लो! अभी अच्छी तरह कर दो! “

बहू: “माँ जी, अभी?”

सास: “चाय पीकर कर दो!”

बहू: “माँ जी! अभी सब्जी बना लूँ फिर रात को कर दूंगी!”

उसे लगा माँ मान गई! तो निश्चिंत सी काम निपटाने लगी!

आज फिर पति नहीं बोले

शाम को पति आए, आज फिर नहीं बोले! फिर से माँ को चाय के लिए कहा। समिता ने फिर सोचा कि शायद आज माँ के हाथों से चाय पीनी होगी! पर कमरे में वही माहौल देख कर समिता डर गई। रात को कमरे में आए तो समिता ने बहुत पूछा! रोई भी कि भूल हो गई। आगे से माँ को कभी कुछ नहीं कहूँगी। अपराध का दंड मिलता ही है तो फिर बातें सुनीं।

जब अपनी बात रखनी चाही! तो पति बोले, “थका मांदा आता हूँ, तुम्हारी बातें सुनने की हिम्मत नहीं होती! और अगर तुमने सफाई देनी है तो मतलब तुम मनमानी ही करोगी! बस इतना समझ लो कि, “एक चुप सौ सुख।”

बहुत गुस्सा आया परन्तु तभी पिता जी के शब्द याद आ गए कि, ” शिकायत का कोई मौका न देना।” और समिता ने फिर कबूल-कबूल-कबूल कर। मुस्कुरा दी और सुहास को मना लिया। शपथ भी खा ली कि नहीं। अब ऐसी कोई गलती नहीं करूंगी। और फिर सब ठीक-ठाक!

पत्नी की मर्ज़ी उसकी मनमानी और पति की मर्ज़ी सबकी मर्ज़ी?

समिता के आफिस में मालिनी उसकी सहेली भी कई बार बातों ही बातों में बताती थी कि, “पति के अनुसार दिन और रात केवल उनकी मनमानी, उनकी जरूरतों का ध्यान। परन्तु कहीं गल्ती से भी उसकी मर्ज़ी दिखाई दे तो उसे मालिनी की मनमानी का नाम दे दिया जाता है!” फिर घर में अप्रत्यक्ष युद्ध रूपी मन-मुटाव जिसका सजातीय सास, ननद , देवरानी खूब फायदा उठाते हैं और कनखियों से हंसती भी हैं।

मगर समिता उसे भी समझाते हुए हमेशा कहती कि, “सहनशील होने से सब ठीक हो जाता है। और देखना! समय बीत जाएगा! जब हमारे बच्चे होंगे तो वो सब ठीक कर देंगे!

इसी बीच कुछ दिनों बाद समिता कि ट्रांसफर हो गई! शहर से दूर जाना पड़ता था। सैलेरी पर तो अपना अधिकार था नहीं। तो एक शाम समिता ने मुस्कान बिखेरते बड़े प्यार से सुहास से कहा कि, “अगर मुझे कार ले दें तो आसानी हो जाएगी।”

सुहास: “पर कार कहां से आएगी?”

समिता: “मेरे पिता जी ने शादी के समय जो मेरे खाते में पैसे डलवाए थे उन पैसों से आ जाएगी।” सुहास: “पहले पिता जी और माँ से बात कर लो वो आज्ञा दे दें तो ले लेते हैं?”

समिता: “मैं बात करूँ? आप करेंगे ना!”

सुहास: “मुझसे क्लेश नहीं होता। तुम्हें जरूरत है तो खुद बात करो। मुझे इन सबसे दूर रखो!”

समिता: “पर सुहास मैं तुमसे नहीं कहूँगी तो और किससे कहूँगी ?”

सुहास: “तो तुम चाहती हो कि तुम्हारे लिए मैं घर वालों के सामने जोरू का गुलाम बनके ये कहूँ कि मेरी पत्नी को कार चाहिए। वो भी अपने पिता के पैसों से लेगी।”

समिता: “तो तुम ले दो!”

सुहास: “क्या बकवास कर रही हो?”

समिता: “क्यों अगर जरूरत पड़े तो अपनी सैलेरी में से कुछ ले नहीं सकती?” और मुड़ के देखा तो माँ सामने खड़ी थी!

सास: “तुम सब ले लो। हमें देकर एहसान कर रही हो! तुम्हारा दिया थोड़ा ही ना खाते हैं!” (सास ऊँची आवाज़ में) “हाँ जी सुनते हो!” 

समिता: “माँ जी छोड़िए! ससुर जी को मत बुलाइए। मैं शब्द वापिस लेती हूँ मैं तो ऐसे ही इनको कह रही थी!”

सास: “नहीं! नहीं! आज बात खुल ही लेने दो! हम तो तुम पर अत्याचार करते हैं। तुम्हें कुछ नहीं देते ना।”

अधिकारों की बात ने सबकी नजरों के कमान चढ़ा दिए थे

समिता ने बात संभालने के लिए, आगे बढ़कर सास के पैर पकड़ लिए। परन्तु अधिकारों की बात ने सबकी नजरों के कमान चढ़ा दिए थे! तो समिता ने माँ-पिता की खूब बातें सुनीं! समिता ने माफी भी मांग ली थी! परन्तु उस रात भी उसके पति कमरे में आए ही नहीं ।

समिता बहुत रोई थी ! आँखें सूज गई! सुबह आफिस के लिए तैयार हुई। सब रोज़ की तरह।

शाम को घर आई। तो सामने माँ और पिता जी मायके से आए हुए थे। पता नहीं क्यों! समिता उनसे मिल कर, गले लग कर बहुत रोई! पर फिर कुछ अजीब सा अहसास हुआ! और चाय के टेबल पर पता चला कि समिता की शिकायत करने के लिए उसके माता-पिता को बुलाया गया है।

ससुराल वालों ने अपनी ताकत बहु को दिखा दी थी

शिकायत नहीं! ये घोर बेइज्ज़ती थी उसकी! ससुराल वालों ने अपनी ताकत दिखा दी थी! समिता ने मायके से आई माँ को बहुत समझाया कि,”कोई बात नहीं है! मैं संभाल लूंगी ।” और समिता की माँ, “तुम्हें पहले ही कहती थी की मनमानी मत करना! पर तुम कहाँ मानती हो!” और माँ रोने लगी।

समिता के मायके वाले उसका साथ देने की बजाय प्रश्नों के तीर उस पर ही बरसा रहे थे। परन्तु जाते समय पापा को समिता ने कह दिया कि,” पापा! अगर आपको मुझ पर विश्वास है तो आगे से यहाँ मत आना!”

पर अब तो महीन काँच की दीवार टूट चुकी थी

इधर ससुराल वालों और समिता के बीच की महीन काँच की दीवार टूट चुकी थी। जिस बात की धमकी दी जाती थी! कि तुम्हारे माँ-बाप को बताएँगे! वो धमकी उन्होंने पूरी कर दी थी। और अब कोई डर नहीं था। जो डर था वो आज की इस दुर्घटना से खत्म हो गया।

इससे बुरा एक बेटी के लिए कुछ नहीं हो सकता कि जिन माता-पिता के लिए उसने बहुत से त्याग किए हों, ताकि उनकी बेटी के कारण उनकी कभी नजर ना झुकें! आज समाज के अनुसार चलते हुए भी वो नजरें उसी बेटी के कारण झुकी ही नहीं अपितु पाताल मे धंस रही थीं। उसी धंसती जमीन में सभी समिता को भी गिरा देखना चाहते थे ।

और फिर बहु बदल गयी….

पर समिता बदली-बदली सी। पता नहीं किन ख्यालों में खोई! रात का खाना बनाया। सबको खिलाने गई। पर जब सबने उसे देखना भी मुनासिब ना समझा तो समिता ने खाना खाया और सुहास की प्रतीक्षा करते-करते सो गई।

सुबह सास ने देखा तो समिता के सिर का पल्लू , सिर की शोभा न बनते हुए गले में सरक आया था। सास ने आदेश दिया, “दुपट्टा सिर पर लो। तुम्हारे ससुर जी आ रहे हैं।” और समिता मासूम से ढीठ बच्चे की तरह मुस्कुराने लगी! मगर दुपट्टा वहीं का वहीं!

सास: “पागल हो गई है! शर्म ही पी गई है!” परन्तु समिता कुछ ना बोली!

फिर समिता ने सबका खाना बनाया! जवाब न मिलने पर खुद खाना खाया और फिर रात को दरवाज़े की चिटकनी लगा कर निश्चिंत सो गयी!

फिर सुबह आफिस! सबका नाश्ता तैयार किया!

शाम को समिता जब घर आई तो मंद-मंद मुस्काती सी सासू के हाथ में आकर तेल की कुप्पी पकड़ा कर कहने लगी, “सासू माँ! मैं आपके लिए गाड़ी लाई हूँ! आप ही स्वागत करेंगी! और अब हम इकट्ठे घूमने जाएंगे!”

परन्तु तेल की कुप्पी! वहीं धम्म!! जब तक सासू जी अपने पति देव को बतातीं! तब तक समिता गाड़ी अंदर ला चुकी थी ।

घर के आंगन में गाड़ी खड़ी कर समिता ने जब हार्न बजाया जो सबको युद्ध घोष सा प्रतीत हुआ।

कटी पतंग की तरह छतों पर लटकते पड़ोसी घर वालों से अधिक खुश लग रहे थे। जब तक पति आए देखा तो रक्तरहित (ब्लडलैस) क्रांति हो चुकी थी! रक्त  तो बहा था पर बस दिखाई नहीं दे रहा था! खून हुआ था पर बिना एफआईआर  के!

टेबल पर नई कार की खुशी में समिता द्वारा लाई गई मिठाई पड़ी थी और आसपास की जहर कड़वी नज़रें मक्खी बन घूम रहीं थीं!

अब घर की काया पलट गई

घर की काया पलट गई । रात को समिता ने खाना पकाया, बाकियों से सादर पूछा गया, पर आवाज़ नहीं आई। तो समिता खुद खाना खाकर, वही चिटकनी लगा कर, निश्चिंत सोने चली गई। अब तो ये रोज का क्रम था!

सास-ससुर की तरफ से लड़ाई का पूरा माहौल बनाया जाता! मायके में फोन जाते पर पिता जी फोन उठाते, सब सुनते पर, वहीं मायके में ही रह जाते!

इधर समिता अपने कमरे में या अपनी दिनचर्या में मगन! पर सबको समय पर पूछना , खाना बनाना, सब काम सही से! कई बार तो सास समिता को संतुष्ट देख खीझ की मारी उसके हाथ से बेलन, चकला छीन लेती और समिता को कई बार बिन खाए ही सोना पड़ता।

पौधे को अब गमला नहीं खुली ज़मीन चाहिए थी अपनी जड़ों के लिए 

ये नहीं कि समिता को कानून की जानकारी नहीं थी, उसके माता पिता भी थे, सब थे! क्योंकि बस अब पौधे ने ठान लिया था कि वह वहीं रहेगा! अब गमला नहीं ! खुली जमीन चाहिए! जड़ों को पैर पसारने को खुली जमीन चाहिए। और आकाश भी कभी ना कभी तो मिल ही जाएगा।

इस गृह युद्ध में पिघलेगा कौन? ये तो समय ही बताएगा! शायद सैलेरी आते ही सास ससुर या पति! जिस दिन कुंडी लगने से पहले कमरे में आ गए ! ये सब सकारात्मक ही नहीं कुछ नकारात्मक भी हो सकता है!

समिता भी जीत सकती है! पति भी!

क्यों सब कर्तव्य निभाते हुए भी उम्मीद की परीक्षा में औरत को शत प्रतिशत अंक नहीं मिलते!

वैसे पति और पत्नी की हार जीत इकट्ठे ही हो तो ही सफलता मिलती है ! है ना!

पर अगर कोई इस रहस्य को अनदेखा कर पति-पत्नी को अलग-अलग समझे, तो वो अज्ञानी !परन्तु यहाँ प्रश्न उठता है कि क्यों सब कर्तव्य निभाते हुए भी उम्मीद की परीक्षा में औरत को शत प्रतिशत अंक नहीं मिलते!

क्यों पेंट रंगी सजावटी दीवारों के नीचे उमस भरी, खोखली दीवारें हैं? जो बिमारी, घुटन पैदा कर देती हैं! और ऐसे घर के वातावरण में सांस कैसे लेंगे?

औरतें नाक-मुँह बंद किए निर्जीव पड़ी रहें तो सुशील! और अगर कहीं सब ठीक करने के लिए आगे बढ़ कर कमान संभाल लें तो मनमानी? विरोध?

सोचने वाली बात है कि हमारी पढ़ाई, जीवन स्तर के विकास के साथ-साथ इस तरह की सोच में विकास क्यों नहीं होता? इस सोच में कब बदलाव आएगा?

क्यों औरतें अपने साथ रस्मों की बंदिशों के रूप में ये बोझ खुद की आत्मा और दूसरों की आत्मा पर डालती रहेंगी? सोच की गुलामी औरत क्यों नहीं छोड़ती? क्यों खुद के निर्जीव जीवन की विरासत क्रमशः वह आगे-आगे यही निर्जीविता बाँटती जाती हैं?

आप कहेगें सब ससुराल में ऐसा नहीं होता! तो पता अवश्य करें कि वहाँ पर कोई समिता तो नहीं थी?

हाँ! तो हार जीत की बात कर रहे थे! तो समिता भी जीत सकती है! और उसके सास ससुर भी!परन्तु असली जीत सारे घर की खुशहाली है। और ध्यान रहे कि पूरी स्पष्ट जीत तो कभी नहीं हो सकती! कुछ न कुछ बर्तन तो आवाज़ करेंगे ही करेंगे!

मनमानी तुम करो तो ठीक! औरत करे तो बेइमानी?

अगर सब कर्तव्य निभा कर, अपने मन से धोखा करके भी ससुराल में कोई खुश नहीं तो फिर थोड़ी सी मनमानी ही कर ली जाए। वो भी मर्यादा वाली! 

पर कोई नहीं समझेगा!

अजी ना समझे !

परन्तु अब पौधे को अपना अस्तित्व के लिए जमीन के साथ-साथ आकाश भी चाहिए! उड़ना ना भी आए ! पर आकाश में उड़ते पंछी तो देखे ही जा सकते हैं! मन पतंग तो उस छोर तक पहुंच ही सकती है।

तो कुल मिला के अब मायके में पिता आश्वस्त थे और अब माँ भी खुश! मगर प्रार्थनाएं करनी न छोड़ीं। फिर समिता के आँचल में एक किलकारी गूँजी! सुहास रात के समय उठ कर समिता की मदद करने लगा है।

सास मुँह बनाती है पर पोती की खूब बलाएँ भी लेती है! तो मन तो साफ नहीं हो सकते पर दिन रात तो शालीन हो सकते हैं तो चलो वही सही!

“बहुत नहीं, थोड़ा सा जहां चाहिए! मेरी नज़र को भी आसमां चाहिए।”

मूल चित्र : Canva 

 

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