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मैं से मां तक का सफर : एक हसीन अहसास या कुछ और?

झुंझलाहट उस वक़्त होती,जब सारा काम खत्म करने के बाद खाना खाने बैठो तो पता नहीं बच्चों को कैसे पता चल जाता है। उसी वक़्त नैपी गंदी करके रोना शुरू!

झुंझलाहट उस वक़्त होती,जब सारा काम खत्म करने के बाद खाना खाने बैठो तो पता नहीं बच्चों को कैसे पता चल जाता है। उसी वक़्त नैपी गंदी करके रोना शुरू!

“ओहो बेटा ये सब मांओं के साथ होता है! तुमने भी किया था तुम्हारे तो दो ही बच्चे हैं। मैंने तो चार चार को पाला है। एक को खाना चाहिए होता तो दूसरे को बिस्कुट।”

“माँ! ये सब आप हजारों बार बता चुकीं हैं! मेरे अंदर आपके बराबर बरदाश्त करने की हिम्मत नहीं है, मैं सच बोल रहीं हूँ! मैं भाग जाऊँगी सबको छोड़कर।”

इशिता की बात सुनकर मम्मी हंस दी। जब भी इशिता के बच्चे उसे परेशान करते, वो चिड़चिड़ा जाती। आज भी जब वो कमरे को साफ़ करके चादर बदल कर तीन साल की परी और चार साल के आशू को छोड़ कर किचन में काम करने गई और वापस आई, तो एक नया काम उसका इंतज़ार कर रहा था। बेड की चादर को गायब कर दिया गया था, कमरे के कोने से कुछ खुसरफुसर की आवाज आई तो इशिता ने दबे पाँव से उधर का रुख किया वो दोनों बात कर रहे थे।

“अगर मम्मा ने नहीं दिया तो?”

“थोड़ी देर रिक्वेस्ट करेंगे तो दे हीं देंगी!”

“मगर भाई!”

“अरे एक ही बेडशीत की ज़रूरत है। देखो ना तुम्हारा रूम तो बन गया है मेरे में एक ही बेडशीत की ज़रूरत है। फिर जब दोनों बन जायेंगे तो तुम अपने रुम में मैं अपने में रहूंगा।”

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“अच्छा तो चादर यहाँ पर लग चुका है!” इशिता ने देखा उसके बिछाए चादर से टेंट बन चुका था। मगर शायद परी को अलग टेंट चाहिए था इसलिए धीरे धीरे बात हो रही थी।

“तुम दोनों को पता था ना कि मैं अभी सब सही करके गई थी फिर भी सारा रूम उलट पलट कर दिया!” इशिता ने गुस्से में कहा।

“कहाँ मम्मा सिर्फ चादर ही तो लिया है!”

तभी मोबाइल की घंटी बजी और इशिता ने और बहस करना छोड़ दिया। देखा तो मम्मी थीं, फिर क्या सारी झुंझलाहट मम्मी पर ही उतार दी। बेचारी उसे समझाती रह गई थीं।

इसमें ज्यादा गलती इशिता की भी नहीं थी। शादी के एक साल बाद ही आशू आ गया, कहाँ तो मैडम को गंदगी ज़रा सी भी बरदाश्त नहीं होती थी। दीदी अपने बच्चों के साथ आ जाती तो सबसे ज्यादा दिक्कत उसे ही होती क्योंकि उनके बच्चे सारे घर को उलट पलट कर देते। वैसे तो दीदी जब तक बच्चे छोटे रहते थे तब तक तब उन्हें पैक ही रखतीं थीं मगर गलती से पॉटी वगैरह दिख जाती तो इशिता को उल्टी करना जरूरी हो जाता। दीदी नाराज भी होतीं कि इसके बच्चे होंगे तो ये क्या करेगी।

जब आशू पैदा हुआ तो कुछ दिन माँ के पास रहकर पति के पास वापस आ गई। ससुराल वो जा नहीं सकती थी क्योंकि सास थीं नहीं। एक जेठानी थीं जिनका खुद का बच्चा ही अभी छोटा था इसलिए वो खुद ही नहीं गई।

वैसे तो सब हो ही जाता था, पता नहीं दिल अपने आप ही मजबूत हो गया था या अपने बच्चों की गंदगी गंदगी नहीं लगती। खैर जो भी था, काम चल जाता था। मगर झुंझलाहट उस वक़्त होती जब सारा काम खत्म करने के बाद खाना खाने बैठो तो पता नहीं बच्चों को कैसे पता चल जाता है। उसी वक़्त नैपी गंदी करके रोना शुरू। अब समझ में नहीं आता है कि खाना दोबारा आकर कैसे खाएं।

खुद तो हर हाल में नींद पूरी कर लेते हैं मगर जैसे ही इशिता को नींद आती उनके खेलने का टाइम हो जाता। मगर क्या कर सकते हैं बच्चे को कुछ कह भी तो नहीं सकते। आशू के बाद परी थोड़ा जल्दी आ गयी। परी के आने की खुशी तो बहुत थी, मगर साथ ये सब भी फिर शुरू।

खैर! इन सब से गुजरने के बाद उनकी शैतानियां उफ्फ्फ! कोई सामान नीचे नहीं रह गया था, सब उनकी पहुँच से ऊपर। ज़रा सी नज़र हटी और फिर क्या से क्या हो जाता था। जब भी संजय के पास टाइम होता वो बच्चों के साथ खेलता, उन्हें घुमाने ले जाता। इशिता को भी साथ में आने के लिए कहता मगर उसे लगता उतनी देर में वो कितना काम खत्म कर लेगी।

संजय समझाता भी, “क्या यार! ऊपर वाले ने फिर से हमें अपना बचपन जीने के लिए इन बच्चों को भेजा है। इस तरह झुंझलाहट निकालने के बजाय इन्हें एंजॉय करना सीखो। अगर ये लोग कुछ फेक देते हैं तो उसी वक़्त ना सही करने लगा करो, उससे तुम्हें और गुस्सा आएगा।”

“लेक्चर मत दीजिये, चौबीस घंटे आप भी गुजारिये इनके साथ तब समझ में आएगा।”

“लेक्चर नहीं दे रहा हूँ! मैं मानता हूँ कि हमारे बच्चे ज़रुरत से ज्यादा शैतान हैं मगर क्या करोगी? जिनके बच्चे ही नहीं हैं उनसे पूछो। ये हमारी जिंदगी का सबसे खूबसूरत तोहफा हैं। बस कुछ साल और फिर देखना कैसे वक़्त भागता है। इनकी बाहर की पढ़ाई नौकरी। आगे क्या होगा पता नहीं।”

संजय की बात ने इशिता को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया था। एक दिन दोपहर में आकर लेटी तो नींद आ गई। तभी परी उसके पेट पर गिरी थी, शायद कुछ उठाने के लिए चढ़ी थी। ऊपर ना पहुंच पाने के बाद इशिता के पेट पर चढ़ रही थी। जब गिरी तो दर्द से उसके आंखों में आंसू आ गया था।

“क्या हुआ मम्मा? आप रो रहीं हैं क्या?”

मासूम सी परी अपने नन्हें हाथों से उसके चेहरे को साफ करते हुए बोली, “कहाँ दर्द हो रहा है?” फिर उसके गालों पर प्यार करके अपने तोतली ज़बान में बोली, “दर्द गायब हो गया ना? जैसे आप गायब करतीं हैं।”

“हाँ, गायब हो गया।” उसने भी परी को प्यार किया, फिर बाहों में भरकर बोली, “सारी दुनिया की खुशी एक तरफ और माँ बच्चों का प्यार एक तरफ। अब हम मिलकर खेलेंगे और शरारत भी करेंगे।”

और वो खुद पर हंसी थी।

मूल चित्र : Canva 

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