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वो एक देशभक्त की पत्नी थी और उसके आगे उसका देश था…

Posted: जुलाई 7, 2020

हाँ मैं हूँ! मैं एक बहादुर…देश के लिए जान देने वाले इंसान की पत्नी हूँ…मैं कमज़ोर कैसे हो सकती हूँ? वो एक सच्चे देशभक्त की पत्नी थी…

“मानी! आज मेरे सपने में फिर वही आया था! कितना हैंडसम लगता है यार। गजब! दिल करता है वो मेरे सामने बैठा रहे और मैं उसको देखती रहूँ, बिना पलके झपकाये। ये आर्मी वाले इतने हैंडसम क्यों होते हैं! जब वो चलते हैं तो कसम से क्या बताऊँ…!” धानी अपने सपनों के बारे में अपनी बहन मानी को बता रही थी और मानी ने उकता कर ब्लैंकेट अपने मुंह तक ओढ़ लिया।

“ना सुनना मेरी बात! सो जाओ तुम…”

“तो क्या करुं हर दिन कि तो तुम्हारी कहानी है! थक गई हूँ। ऊपर वाला भी ना कोई आर्मी वाले का रिश्ता भी नहीं भेज रहा है तेरे लिए।”

“भेजेगा भेजेगा! एक दिन जरूर आएगा”, धानी ने दिल पर हाथ रखते हुए कहा।

और एक दिन सचमुच आर्मी आफिसर का रिश्ता आ भी गया। वो पापा के दोस्त के दोस्त का बेटा था। बाद में पता चला मानी ने ही मम्मी को बोल कर धानी का रिश्ता भिजवाया था। जिसे उन लोगों ने कबूल कर लिया, क्यों कि वो लोग खुद भी अपने बेटे के लिए लड़की ढूंढ रहे थे।

धानी में कोई कमी भी नहीं थी, बस थोड़ी सी फिल्मी थी। जब भी फिल्म देखती खुद को उस फिल्म की हिरोइन समझ लेती। फिर रात भर ख्वाबों की दुनिया में रहती…

सब कुछ फटाफट हो गया, चट मँगनी, पट ब्याह। शादी से पहले वो रौनक को नहीं जानती थी।  एक बार देखा था वो भी फौरी तौर से, लेकिन जब शादी के बाद पहली बार देखा तो पलकें झपकाना ही भूल गई।

“मैंने मानी से कहा था, आर्मी वाले बिना यूनीफॉर्म के भी बहुत हैंडसम और स्मार्ट लगते हैं!” वो बोल गई थी।

“अच्छा मतलब मैं हैंडसम हूँ स्मार्ट हूँ”, वो मुस्कुराया तो धानी झेप गई।

दिन कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। अब वो खुद को रौनक की हिरोइन समझने लगी थी। खुद भी बहुत सलीके से तैयार होती और रौनक को भी तैयार करवाती। फिर जब रौनक की मम्मी के सामने दोनों खड़े होते तो वो बलाएँ ही लिए जातीं।

रौनक की छुट्टी ज्यादा दिन की नहीं थी। जब वो वापस ड्यूटी ज्वाइन करने जाने लगा तो धानी बहुत रोई थी। रौनक भी उदास था। उसने वादा कहा कि वो बहुत जल्द उससे मिलने आएगा। वो आया भी मगर जल्द ही बुलावा आ गया इसलिए जल्दी जल्दी वापस भी जाना पड़ा।

रौनक के घर वाले बहुत अच्छे थे। उसका बहुत ख्याल रखते थे।  मगर रौनक के बिना उसे कुछ भी ना अच्छा लगता। एक दिन रौनक ने बताया कि वो अपना सामान पैक कर ले, वो उसे लेने आ रहा है। वो खुश तो बहुत हुई मगर थोड़ा उदास भी हो गई क्योंकि यहाँ भी तो सब प्यार करने वाले थे।  रौनक की मम्मी ने उसकी खुद की मम्मी ने और मानी ने बहुत समझाया तब वो थोड़ा नार्मल हुई, और पैकिंग करने लगी।

वो रौनक का इंतजार कर रही थी। ज़रा सी आहट पर भी वो भाग कर जाती सुबह से दोपहर हो गई।  शाम होते होते उसे बहुत घबराहट होने लगी। कभी वो कमरे में, कभी मम्मी के पास, कभी ऊपर चली जाती, मगर घबराहट कम ही नहीं हो रही थी। फोन लगाया तो रौनक ने उठाया नहीं।  फिर भाग कर मम्मी के पास चली आई और उनके कदमों में बैठ गई।

“क्या हुआ बेटा?” उन्होंने बहुत प्यार से उसके बालों में उंगलियाँ फेरी।

“मम्मी! मुझे बहुत ज्यादा उलझन हो रही है। क्या रौनक ऐसे ही करते हैं? जिस टाइम आना होता है उस टाइम नहीं आते? और…”, वो और कुछ बोलने वाली थी, जब एक गाड़ी आकर रुकी।

मम्मी का चेहरा एकदम सफेद हो गया था। उसे कुछ समझ ही नहीं आया। वो मम्मी के उठते हुए कदमों को देख रही थी। उसे लगा जैसे वो गिर जाएंगी। तभी पापा ने उन्हें संभाला और पकड़ कर थोड़ी दूर रखी चेयर पर बैठा दिया।

कुछ आवाजें आ रहीं थीं, जो अब ज्यादा हो गयीं। उसे लगा जैसे उसने मानी मम्मी-पापा सबको देखा। वो अभी भी वहीं उसी जगह जमीन पर बैठी थी। उसका दिमाग़ काम ही नहीं कर रहा था।  दिल बैठा जा रहा था। मानी उसके पास आकर बैठ गई थी। शायद रो रही थी और मम्मी वो भी…

मगर उसके कान ने, दिमाग ने, सोच ने काम करना बंद कर दिया था। उसे कुछ और दिखा, सफेद चादर में? फिर उसे होश नहीं रहा। बस अपने दिल को कमजोर होते हुए महसूस किया था।

पता नहीं कब तक वो बेहोश थी। आंख खुली तो खुद को हास्पिटल में पाया। मम्मी उसके पास ही स्टूल पर बैठीं थीं। उसे होश में आता देखकर उसके करीब चली आई।

“दो दिन बाद होश आया है तुमको…”, वो उसका हाथ पकड़ कर बता रहीं थी और प्यार कर रहीं थी।

“मुझे क्या हुआ था मम्मी? और सब कुछ…मम्मी! रौनक? वो कहाँ हैं?”

“बेटा! तुम्हारे लिए बहुत बड़ी खुशखबरी है। मैं नानी बनने वाली हूँ…”, उन्होंने उसकी बात बीच में ही काट दी जैसे सुना ही नहीं।

“मम्मी मैं कुछ पूछ रही हूँ…”

“सब खत्म हो गया धानी। तेरा रौनक…तेरी खुशियाँ…सब कुछ…”, मम्मी कुछ नहीं बता पा रहीं थी।  जब मानी ने सब बता दिया कि कैसे क्या हुआ था। वो उसे लेने आ रहे थे जब रास्ते में छुपे हुए दुश्मनों ने कैसे घात लगाकर हमला किया था। उन्होंने मुकाबला भी किया मगर वो इस हमले के लिए तैयार नहीं थे। जाने से पहले उन्होंने अपने दुश्मन को खत्म कर दिया था मगर उनको भी गोली लगी थी।  खून बहुत निकल गया था। हास्पिटल पहुँचने से पहले ही…

“तू रोना मत धानी।  तू तो शहीद की पत्नी है और शहीद की पत्नियां तो बहुत बहादुर होतीं हैं। अब तो तुझे जीजू की निशानी को…उनके मम्मी पापा को भी तो संभालना है ना…”

हाँ! मैं सबको संभालूँ, मगर? कैसे? मैं खुद को कैसे संभाल पाऊंगी? वो रोना चाहती थी चिल्ला कर बहुत तेज़ आवाज में…वो रौनक को देखना चाहती थी…उनसे पूछना चाहती थी – उन्होंने तो उससे वादा किया था कि हमेशा साथ में रहेंगे। फिर?कैसे?

अभी तो पूरा साल भी तो नहीं बीत पाया। वो तो रौनक को ठीक से देख भी नहीं पाई। उनको समझ भी नहीं पाई। एक ही बार तो आए थे बीच में।

उन दोनों ने मिलकर अपने बच्चें का ख्वाब देखा था फिर वो अकेले कैसे? वो तो उनको बता भी नहीं पाई…उनके चेहरे पर आने वाली खुशी को देख ही नहीं पाई…वो तो उसके हीरो थे… हीरो तो हमेशा अपनी हिरोइन के साथ होता है… हमेशा जीत जाता है… तो वो अपनी हिरोइन के पास वापस क्यों नहीं आए? मैं कैसे सब कुछ अकेले अपने रौनक के बिना? क्या मैं सब संभाल लूंगी? क्या मैं हूँ इतनी मजबूत?

हाँ मैं हूँ! मैं एक बहादुर…देश के लिए जान देने वाले इंसान की पत्नी हूँ…मैं कमज़ोर कैसे हो सकती हूँ? रौनक हमेशा कहते थे, ‘अभी तो हमारी कोई औलाद है, नहीं मगर जब भी होगी, वो क्या करेगी ये उनका खुद का फैसला होगा। मगर मेरी दिली तमन्ना है, अगर मैं शहीद हो गया तो वो भी अपने देश के लिए जान देने का कोई भी मौका ना छोडे़। क्या तुम खुद को इतना मजबूत कर पाओगी?’

उस वक्त तो वो कुछ नहीं बोल पाई थी बस हलके से मुस्कुरा दी थी क्योंकि उन्होंने जो बोला था ‘शहीद’ सुनकर ही उसका दिल बैठने लगा था फिर कैसे कुछ बोल पाती? लेकिन अब उसे खुद को बहुत मजबूत बनना था, सबके लिए…अपने रौनक के मम्मी-पापा के लिए…उनके बच्चे के लिए।  रोकर उनके रूह को तकलीफ नहीं होने देगी। वो एक सच्चे देशभक्त की पत्नी थी…

मूल चित्र : Canva 

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