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क्यों रह जाती हैं अक्सर गरीब, अमीर परिवारों की बहू और बेटियाँ?

Posted: जुलाई 22, 2020

इनमें से कई महिलाओं की सफल कहानी, सफल पत्नी, सफल माँ, तक ही सीमित रह जाती है, क्योंकि उनकी योग्यता को ग्रहण लग जाता है, अमीर पिता, पति या पुत्र का?

कॉलेज से आते ही रीवा, सामान सोफे पर पटक ससुराल से आई, अपनी मुस्कान दीदी को ढूंढते हुए, आवाज़ लगाने लगी। तो देखा मुस्कान बॉलकनी में बैठी सब्ज़ी काट रही थी।

सबको अमीर उद्योगपति ही क्यों चाहिए

रीवा: “दीदी! तुम्हें पता लगा वो मेरी सहेली शिवानी की शादी एक अमीर बिजनेसमेन से पक्की हो गई। आजकल यही ट्रेंड है, सब अमीर उद्योगपति ढूंढते हैं और फिर जिंदगी, ‘वाह’ नहीं ‘झक्कास’ बन जाती है। काश! मेरी भी शादी ऐसे ही अमीर उद्योगपति से हो जाए तो फिर! सब झक्कास!”

मुस्कान: “अच्छा! शिवानी की जिससे शादी होने जा रही है, उस लड़के ने क्या किया है? मतलब कितना पढ़ा-लिखा है?”

रीवा: “अरे! ये योग्यता कम है कि वो एक सफल बिजनेसमेन है? वाह! क्या जिंदगी है, इन बड़े-बड़े उद्योगपतियों की पत्नियों और बेटियों की? डिजायनर कपड़े, गहने, मेकअप, गाड़ी, नौकर-चाकर! बस आराम ही आराम! नहीं-नहीं, बस ऐश ही ऐश! अलग ही दुनिया है इनकी! हम तो ऐसी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकते! है, ना?” पर दूसरी तरफ से कोई उत्तर न मिलते देख रीवा ने अपनी बड़ी बहन मुस्कान को हल्का सा धक्का दिया!

मुस्कान: “क्या है?”

रीवा: “मैं कुछ बोल रही हूँ!”

मुस्कान: “हाँ! तो बोलती रहो।”

रीवा: “मैं कोई पागल हूँ, जो अकेली ही बोले जाऊँ!”

मुस्कान: “क्या?”

रीवा- ” तो तुमने कुछ भी नहीं सुना?”

मुस्कान: “सुन रही हूँ, मेरी बहना! तुम्हारी इन बे-सिर-पैर की बातों को!”

रीवा: “फिजूल की बातें! चलो मेरी बातें फिजूल हो सकती हैं, पर इन उद्योगपतियों की बीवियों और बेटियों की जिंदगी नहीं!”

मुस्कान: “अच्छा क्या खासियत है?”

रीवा: “अरे! अभी तो बताया, बस ऐश ही ऐश!”

मुस्कान: “किसकी ऐश?”

रीवा: “इन उद्योगपतियों की पत्नियों और बेटियों की, ऐश!”

मुस्कान: ” हाँ! ठीक कहा, इन उद्योगपतियों की पत्नियों और बेटियों की? तो इसमें बीवियों और बेटियों का अपना अस्तित्व तो ज़्यादातर जीरो हुआ, ना? अपना कोई नाम नहीं! बस उद्योगपति पिता का नाम, फिर शादी के बाद उद्योगपति पति का नाम। अपना नाम इनका कहाँ है?”

रीवा: “अपना नाम किसका होता है?”

मुस्कान: ” मेरा है, ‘मुस्कान वर्मा बजाज’! मेरा पूरा नाम! क्या इन बेटियों या बहुओं को ये आजादी है कि जो इन्होंने अपना नाम मायके में रह कर कमाया है। उसे अपने नाम के साथ पति के सरनेम से पहले जोड़ सकें? यह नाम मेरा अस्तित्व, मेरी पहचान, मेरी जिदंगी की कमाई, मेरी आजादी का द्योतक है!”

रीवा: हंसते हुए! “अकेले नाम से क्या होता है? आजादी तो मेरी तुम्हारी, अपने पैसों से ये ही खरीद लें!”

मुस्कान: “अच्छा तो पहले अपनी आजादी खरीद कर बताएँ, ना?”

रीवा: “क्या पहेली बुझा रही हो! स्पष्ट बताओ ना!”

मुस्कान: “अच्छा! जब तुम इन पत्नियों और बेटियों बारे में पढ़ती हो, देखती हो या सुनती हो, तो वीडियो या खबरों में इनकी खासियत क्या दिखाई जाती है?”

रीवा: “वही जो मैं बता चुकी हूँ!”

मुस्कान: “नहीं! सच्चाई वो है जिसको कि तुम देखना नहीं चाहती या फिर पैसे की रूपहली, चुंधियाती चमक के नीचे चुप पड़ी होने के कारण दिखाई नहीं देती! नहीं तो क्या इन बहु-बेटियों की विशेषता केवल इनका पहनावा या चमक-दमक है? क्या इनमें अपना कोई टेलेंट नहीं?”

और ये सुन कर रीवा सोच में पड़ गयी।

कई औरतें अपने संबंधित कार्यक्षेत्र में अपनी विशिष्टता, अपनी अलग पहचान जिंदा नहीं रख पातीं

सच में, क्यों प्रसिद्ध, योग्य, हुनरमंद लड़कियाँ जब इनकी बहुएँ बनती हैं, तो अपने विशिष्ट कार्यक्षेत्र में कार्य क्यों नहीं कर पातीं? क्यों वो अपने घराने के होटल, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, ट्रस्ट की ही अध्यक्ष बन, लोक भलाई के काम से अपने अवचेतन या चेतन मन के किस कोने को सांत्वना से भरने की कोशिश करती रहती हैं? वे क्यों नहीं अपने संबंधित कार्यक्षेत्र में अपनी विशिष्टता, अपनी अलग पहचान जिंदा रख पाती?

क्यों आज भी ज़्यादातर उनकी ऊपरी खूबसूरती से हटकर, क्यों उनके व्यक्तित्व की बात नहीं करता?

बस समाचार में छपता है कि फलाने की बीवी/बेटी ने इतनी मंहगी ड्रेस पहनी, गहने डाले, पार्टी में गई! उनकी विशेषता, उनकी ऊपरी खूबसूरती से हटकर, क्यों उनके व्यक्तित्व की बात नहीं बताती! उनकी अपनी सफल कहानी, क्यों सफल पत्नी, सफल माँ, तक ही सीमित रह जाती है?
क्योंकि उनकी योग्यता को ग्रहण लग जाता है। ताकतवर, अमीर पिता, पति या पुत्र का? तो फिर क्या हम कह सकते हैं कि सब समर्थ होते हुए भी, वो अभी भी आदिम युग के पारिवारिक सरंचना में ही जी रही हैं या उन्हें वैसे ही जीने को कहा जा रहा है?

क्या उन्हें अपनी व्यक्तिगत सफलताओं का आनंद लेने दिया जाएगा?

नहीं! ऐसा वो सोच ही नहीं सकती ! क्या वो चांदी के सिक्के रूपी चाँद के ग्रहण में जीने की आदि हो चुकी हैं? क्या वो इस छाया से बाहर निकल कर तहदार मेकअप के नीचे अपने चेहरे से नज़र मिला पाएंगीं? गहनों के बोझ से निकल, अपनी व्यक्तिगत सफलताओं का आनंद ले पाएंगीं? पर इन्हें यह अहसास तभी होगा जब वो हम आम कही जाने वाली सबल व्यक्तित्व की औरतों के संघर्ष से खुद कमाएंगी या उन्हें कमाने दिया जाएगा। इस शौर्य का खुद अनुभव करने दिया जाएगा? और ये कहने दिया जाएगा कि ‘ये सब मेरी कमाई है, मैं परिवार से बस ले नहीं अपितु बहुत कुछ देने में भी समर्थ हूँ। मेरी ड्रेस बहुत मंहगी नहीं पर इसके ताने-बाने में मैं हूँ!’

क्यों उस आसमान को देख सकती हैं पर उड़ नहीं सकतीं?

जैसे बड़े पेड़ की घनी छाया में केवल अनचाही घास उग सकती है, कोई उच्च किस्म का पौधा नहीं!
सोने के पिंजरे में बंद पंछी, जब बाहर निकल कर, दरवाज़े के पास फुदकता ,छलांग लगाता है, तो मालिक और पंछी दोनों बहुत खुश और संतुष्ट दिखाई देते हैं, क्योंकि पंछी को पता ही नहीं कि पिंजरे के बाहर रहने पर उसके पंख और आकार लेते , तथा बलिष्ठ बन विपरीत बहती हवा को चीर कर दूर आकाश तक उड़ान भर सकते थे। न कि रिमोट से चलने वाले जहाज की तरह बस कुछ मीटर ऊपर और कुछ मीटर दूर!

यह एक खूबसूरत व्यसन है, जो मदमस्त कर दूसरी दुनिया से इन बहु-बेटियों को दूर ले जाता है और वो तहदार मेकअप से दमकती, हीरों के चमकते चाँद के तले ,परियों सी खूबसूरत ड्रेस में लहराती, बल खाती उस आसमान को देख सकती हैं पर उड़ नहीं सकतीं। और इसमें इनका भी इतना कसूर नहीं है क्योंकि इनके पंख या तो पैसे के नशे में सुन्न कर दिए जाते हैं या उगने ही नहीं दिए जाते!

क्या ये पढ़ कर कर आप भी रीवा की तरह कुछ सोचने पर मजबूर हुए?

मूल चित्र : Canva  

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