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और मैं तैयार थी अपने आत्मसम्मान की इस जंग को जीतने के लिए…

Posted: जुलाई 6, 2020

उसने कहा था वो उतना ही सहेगी जितना सहने की ताकत रहेगी, जिस दिन वो ताकत खत्म होगी, उस दिन वो पता नहीं क्या करेगी और आज वो दिन आ गया था…

“सुनिए मुझे पांच हज़ार रुपये की ज़रूरत है दे दीजिए”, स्मृति ने पति अंशुमान से कहा।

“दिमाग़ तो खराब नहीं हो गया तुम्हारा? होश में तो हो? पांच हज़ार मांग रही हो? तुम्हें पैसे की क्या ज़रूरत?” उसने गुस्से से खा जाने वाली नज़रों से घूरा।

स्मृति एकदम से एक पल के लिए डर गई थी, फिर धीरे से बोली, “मुन्ने के लिए गरम कपड़े लेने थे इसलिए।”

“पिछले साल जो कपड़े लिए थे वो अपने मायके दे आई क्या?” स्मृति की बात बीच में ही काट कर आवाज आई।

“मायके में कौन है? माँ पापा तो पहनेंगे नहीं, फिर फालतू बात बोलने की क्या जरूरत है?” बात मायके की आई तो डर के बावजूद बोल दिया।

“मायके वालों की बात आती है तो बुरा बड़ी जल्दी लग जाता है।”

इस बार वो कुछ नहीं बोली

इस बार वो कुछ नहीं बोली, जानती थी अभी कुछ बोलेगी तो बात बढ़ जाएगी। इसलिए खामोशी से वहाँ से हट गई। छोटी-छोटी बात को कैसे बड़ा बनाना है कोई उससे पूछता। बच्चों के कपड़े कितनी जल्दी छोटे हो जाते हैं और मुन्ना तो वैसे भी बड़ी जल्दी लम्बा हो रहा था। इसलिए उसके कपड़े हों या जूते, सब बहुत जल्द छोटे हो जाते थे।

अंशुमान दकियानूसी ख्यालात के साथ बहुत गुस्से वाला भी था, हर छोटी-छोटी बात को खींचने की आदत थी। स्मृति शादी से पहले हर गलत बात के लिए डटकर मुकाबला करती, कहीं कुछ गलत हो रहा होता तो उसे सही करने की हर कोशिश करती।

शादी के बाद सब बदल गया था, वो बदल गई थी

एक बार उसने अपनी दोस्त की इज्ज़त बचाने के लिए अपनी जान तक की परवाह नहीं की थी।  मगर शादी के बाद कैसे सब बदल गया था, वो बदल गई थी। अंशुमान की गलत बात का डटकर मुकाबला क्यों नहीं कर पाती थी, क्यों उसकी ज्यादतियों को सहती जा रही थी। शायद उसके प्यार का वो नाजायज फायदा उठाता था। शादी तो माँ-पापा ने ही की थी मगर वो उसे बहुत चाहने लगी थी।

एक बार तो उसने हाथ उठा लिया था। स्मृति ने तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि जिससे वो इतना प्यार करती है वो ऐसी हरकत करेगा। मगर अंशुमान ने माफी मांग ली थी, इसलिए ना चाहते हुए मुन्ने की खातिर पुलिस की धमकी दे कर उसने माफ़ कर दिया।

मुन्ना के आने के बाद वो थोड़ा बदला था मगर ये बदलाव कुछ ही महीनों का था। वो फिर से पहले जैसा हो गया। स्मृति ने उससे बात करना बहुत कम कर दिया था, जब बहुत जरूरी होता तभी बात करती।

स्कूल में पढ़ाने की बात कही तो…

मुन्ना बड़ा हो रहा था, उसकी ज़रुरतें भी बढ़ रही थीं।  मगर अंशुमान को समझ में नहीं आता था।  एक दिन स्मृति ने स्कूल में पढ़ाने की बात कही तो वो गुस्से के मारे चिल्लाने लगा, “बाहर जाकर किससे मिलने के लिए तड़प रही हो? कौन है जिसके लिए इतना बहाना बनाया जा रहा है, कोई पुराना आशिक तो नहीं है? मेरी सैलरी कम पड़ रही है तुमको? इतने में गुजारा नहीं कर पा रही हो? या फिर जो मैं सोच रहा हूँ वो सच है?”

इस बार बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हो रहा था

“आप जितना पैसा देते हैं उतने में सिर्फ घर की जरूरतें ही पूरी होती हैं। घर के अलावा भी बहुत सारे खर्च होते हैं। आप के समझ में नहीं आएगा।” उसकी बेहूदा बातें सुनकर स्मृति का खून खौल गया था, मगर हमेशा की तरह बर्दाश्त करते हुए इतना ही कहा था। बावजूद कि बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हो रहा था।

“क्यों मेरे समझ में क्यों नहीं आ आएगा? तुम्हारे पास कोई जवाब ही नहीं है। हमेशा तो आजादी से रही है, अब मेरे घर और मेरे बच्चे को पालने के लिए घर में रहना पड़ रहा है तो बाहर जाने के बहाने बना रही हो। एक बात कान खोल कर सुन लो, मैं पागल नहीं हूँ, ना तो बेवकूफ हूँ। मेरे घर में जो मैं चाहूंगा जैसा चाहूंगा वैसे ही तुमको रहना पड़ेगा। और हाँ! आज के बाद इस तरह के फालतू बहाना लेकर मेरे पास मत आना।”

इस बार पक्का सोच लिया था कि वो नौकरी ज़रूर करेगी

“मैं ये नौकरी जरूर करूंगी। आपको जो सोचना है सोचिए। मुन्ना बड़ा हो रहा है उसका एडमिशन भी उसी स्कूल में करा दूंगी।” उसने इस बार पक्का सोच लिया था कि वो नौकरी ज़रूर करेगी इसलिए पहली बार अपने फैसले पर अड़ गई। मगर ये बात अंशुमान को और गुस्सा दिला गई उसने बिना सोचे समझे कसकर उसके गाल पर थप्पड़ जड़ दिया। इससे भी गुस्सा शांत नहीं हुआ तो धक्का मार कर गिरा दिया और गुस्से से अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया।

सुबह जब दरवाजा खोल कर बाहर आया तो घर एकदम शांत था। किसी की कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। तभी उसके दिमाग ने काम करना शुरू किया और कल की सारी बातें याद दिला दीं। वो तो कमरे में जाकर नींद की दवा लेकर सो गया था और अभी जागा था। वो वैसे ही किचन की तरफ बढा फिर अपने लिए चाय बनाई।

उसने उठकर दरवाजा खोला तो…

स्मृति की याद तो आई मगर सर झटक कर चाय पीने लगा। दरवाजे पर कोई दस्तक दे रहा था, उसने उठकर दरवाजा खोला सामने स्मृति पुलिस के साथ खड़ी थी। पुलिस को देखकर तो उसके होश ही उड़ गए।

स्मृति ने अंशुमान के खिलाफ केस दर्ज करवा दिया था। अंशुमान ने बहुत माफी मांगी, मगर स्मृति ने सोच लिया था इस बार वो माफी नहीं देगी। वो अपने नज़रों में गिरती जा रही थी। अब वो अपने वजूद से अंशुमान को खेलने नहीं देगी।

वो उतना ही सहेगी जितना सहने की ताकत रहेगी

उसने कहा था वो उतना ही सहेगी जितना सहने की ताकत रहेगी। जिस दिन वो ताकत खत्म होगी, उस दिन वो पता नहीं क्या करेगी। रात भर सोचने के बाद उसने अंशुमान को सजा दिलाने का फैसला कर लिया था। अंशुमान ने उसके कैरेक्टर पर उंगली उठाई थी जिसे वो चाहकर भी नहीं भुला पा रही थी।

उसने अपना आत्मसम्मान वापस पा लिया

अंशुमान को पुलिस के साथ जाता देखकर उसका दिल जरूर तड़पा था। माँ से बात की थी तो उन्होंने बहुत समझाया कि वो सब सोच समझ कर कदम उठाए। मगर इस बार वो सोचना नहीं चाहती थी, इसलिए जो वो खुद की नज़रों में गिर गई थी। उस आत्मसम्मान को अपने अंदर वापस पाना चाहती थी, वो उसने पा लिया।

मूल चित्र : Canva 

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