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…आखिर गायब कहाँ हो जाती हैं हमारी टॉपर लड़कियाँ?

एक बात मुझे अक्सर खटकती थी, 'हमारे साथ लड़कियां इतनी कम क्यों है हर क्लास में?" कहीं सात, कहीं चार और कहीं मात्र एक। कहां चली जाती है ये टॉपर लड़कियाँ?'

एक बात मुझे अक्सर खटकती थी, ‘हमारे साथ लड़कियां इतनी कम क्यों है हर क्लास में?” कहीं सात, कहीं चार और कहीं मात्र एक। कहां चली जाती है ये टॉपर लड़कियाँ?’

कोरोना काल की वज़ह से अब तक फिज़ाओं में एक आवाज़ नहीं सुनने को मिल रही है, जो अक्सर दसवीं और बारहवीं के रिजल्ट आने के बाद सुनने को मिलते है, वह है, “शाबाश बेटी यह हुई न बात!”  या फिर दंगल फिल्म का वह मशहूर डायलांग,“मारी बेटी छोरो से कम है की?”

टॉपर लड़कियाँ और हमारा आत्मविश्वास

जब से मैंने होश संभाला है मई का महीना हमेशा से आम के आने के खुशी के साथ-साथ इस खबर का भी होता ही था। फलां कि बेटी ने दसवीं में टॉप कर लिया, फलां की बेटी ने बारहवीं में अच्छे नम्बर लाए। उस वक्त लड़कियों का टॉप करना या उनके साथ गार्जियनों का रेस कराना अपने अंदर का आत्मविश्वास इतना कमज़ोर कर देता था कि सारा गुस्सा खेल के मैदान में क्रिकेट के गेंद और बल्ले पर पड़ता था। साथ के दोस्त तुरंत इस बात को ताड़ लेते और थोड़े देर के लिए हमदर्द बन जाते क्योंकि इस पीड़ा से वह भी गुज़र रहे होते थे।

कहां चली जाती है ये टॉपर लड़कियाँ?

बारहवीं के बाद जब ग्रेजुएशन, एमए और उसके बाद जब हाईर स्टडी की पढ़ाई करने आगे बढ़ता चला गया, तब तमाम बातों में एक बात अक्सर खटक जाती थी वह थी, “हमारे साथ लड़कियां इतनी कम क्यों है हर क्लास में?” कहीं सात, कही चार और कहीं मात्र एक। कहां चली जाती है ये टॉपर लड़कियाँ? क्या वह टॉप सिर्फ इसलिए करती है कि हमारे अंदर सीरियस होने की आग उनको जलानी होता है या कोई और ही बात है?

कुछ तो वज़ह होगी जो ये टॉपर लड़कियाँ गायब हो जाती हैं?

दसवीं और बाहरवीं में कोई इतना अच्छा करने के बाद, करियर तो उन टॉपर लड़कियों को भी प्रिय होता ही होगा न? कुछ तो वज़ह होगी इनके गायब होने की? यूं ही मैदान छोड़कर भाग नहीं खड़ी होती होंगी वो!

मैंने अपने सवाल को उन ही कुछ महिला साथियों के बीच में छेड़ा तो उनका जवाब केवल जवाब नहीं था। समाज की सच्चाई वह आईना था जिसमें समाज की हर लड़की को अपना चेहरा देखना पड़ता है और सबों के सामने मुस्कुराना पड़ता हैं।

घर के पास वाले स्कूल में या पार्लर में काम करोगी तो ठीक रहेगा!

महिला साथियों ने अपनी अपनी सामाजिक गठरी खोली और बताया कि हम लड़कियों का आगे पढ़ना घर के पिता, दादा, पति, ससुर यहां तक कि मां और सास तक की इनसिक्योरिटी का हिस्सा है। जिसके कारण सुनने को मिलता है, ‘बेटी, बहुत पढ़ लिया, अब शादी कर ले, डार्लिग….बीएड कर लो, ब्यूटीशियन का कोर्स कर लो…..घर के पास वाले स्कूल में या पार्लर में काम करेगी तो ठीक रहेगा! बेटी इस घर की बहुएं काम नहीं किया करतीं!’ इतना अधिक रोक-टोक कि हम अच्छे मार्क्स लाकर भी अपना शहर छोड़कर पढ़ने नहीं आ पाते। शहर छोड़कर नौकरी करने नहीं जा पाती हैं टॉपर लड़कियाँ।

माता-पिता पढ़ाई का खर्चा उठाने के बज़ाए दहेज बनाना चाहते हैं!

समाज हमारी शादी में दहेज़ लेना अपना अधिकार समझता है और माता-पिता आगे की पढ़ाई का खर्चा उठाने के बज़ाए दहेज के लिए जमा करना चाहते हैं।

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“दहेज जो गैर-कानूनी है? और स्टूडेंट लोन? वह भी एक चीज़ होती है।”

“जाओ यार, पहले पता लगाओ, फिर बेटी पढ़ाओ।”

बच्चे संभालना सिर्फ माँ का काम है?

“और अगर पढ़ भी लिया तब अंतिम बह्मआस्त्र, बच्चे! जिसके हिसाब से समाज और पुरुष यही उम्मीद करते हैं कि बच्चे संभालना तो सिर्फ महिलाओं का काम है और वो कैरियर की दौड़ से बाहर! वो एक कहावत है, चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात है, वह हम लोगों के लिए बना है, तुम लोगों के लिए नहीं।”

सामाजिक पितृसत्तात्मक व्यवहार चुनौति से कम नहीं है

महिला साथियों के सामाजिक बोझ की गठरी का बोझ इतना अधिक था कि मुझसे नहीं उठाया गया। सच्चाई यह भी है जो लड़कियां पढ़ भी पाती है उनके सामने भी सामाजिक पितृसत्तात्मक व्यवहार चुनौति से कम नहीं है। हर सीढ़ी पर उनको लिटमस पेपर टेस्ट के तरह स्वयं को साबित करना पड़ता है।

अब पुरुषों के साथ-साथ समाज को ज़िम्मेदारी होना है

टॉपर लड़कियाँ अपना कैरियर बनाने में आगे बढ़ सके इसके लिए पुरुषों के साथ-साथ समाज को जिम्मेदारी उठानी की ज़रूरत है। साथ ही साथ सरकारी नीतियों को इसका ख्याल रखने की ज़रूरत है कि उनके फैसले लड़कियों के विकास के पायदान में अवरोध नहीं खड़ा करें। जाहिर है इसको केवल, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ से पूरा नहीं किया जा सकता है। कई राज्यों ने लड़कियों के पढ़ाई को स्कूल और कालेजों के बाद बढ़ोत्तरी के लिए वज़िफे देने की घोषणाएं की हैं, परंतु इन घोषणाओं के बाद भी सामाजिक सोच में बदलाव की गति बहुत धीमी है।

करियर सिर्फ पुरुषों का नहीं बल्कि स्त्रियों के लिए भी अहम है

करियर सिर्फ पुरुषों का नहीं बल्कि स्त्रियों के लिए भी अहम है यह बात स्कूल में ही बताई जानी चाहिए। तब जाकर हम आने वाले दिनों में महिलाओं की स्थिति में सुधार होता देख पाएंगे।

असल में, करियर बनाने में महिलाओं की हिस्सेदारी समाज की सोच का आईना है और समाज की सोच स्कूली शिक्षा के समय ही बदलने की शुरुआत की जानी चाहिए। सामाजिक सोच और सरकारी नीतियों में पितृसत्तात्मक सोच को बदलने बिना हम दसवीं और बाहरवीं के बाद कालेजों एवं हायर एजुकेशन में ही नहीं रोजगार के क्षेत्र में लड़कियों का इज़ाफा नहीं देख सकते है। अब वक्त आ गया है कि यह काम जितनी जल्दी हो, उतना बेहतर।

अब हमें हमारी टॉपर लड़कियाँ वापस चाहियें।

मूल चित्र : Canva 

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