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शारदा मेहता, जिनकी कोख से जन्म लेना चाहते थे महात्मा गाँधी

26 जून 1882 में शारदा मेहता का जन्म उस दौर में हुआ था जब भारतीय महिलाओं को वे सारे अधिकार नहीं प्राप्त थे, जो आज उनके पास हैं। भारतीय नारी मुक्ति आंदोलन के शुरुआत में शारदा मेहता ऐसी नारी मुक्तिवादी महिला हैं, जिनका निजी और सार्वजनिक जीवन अनूठा रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो एक पत्नी, […]

26 जून 1882 में शारदा मेहता का जन्म उस दौर में हुआ था जब भारतीय महिलाओं को वे सारे अधिकार नहीं प्राप्त थे, जो आज उनके पास हैं।

भारतीय नारी मुक्ति आंदोलन के शुरुआत में शारदा मेहता ऐसी नारी मुक्तिवादी महिला हैं, जिनका निजी और सार्वजनिक जीवन अनूठा रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो एक पत्नी, माँ, बहन और पुत्री के तौर पर उनकी भूमिका, के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद तथा महान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनके संतुलन को देखकर महात्मा गाँधी ने कहा था, “अगले जन्म में वह शारदा मेहता की कोख से जन्म लेना चाहेंगे।”

इससे यह प्रतीत होता है कि शारदा विविध भूमिकाओं को निभाते हुए सरल और गरिमापूर्ण व्यक्तित्व की रही होंगी। 26 जून 1882 में शारदा मेहता का जन्म उस दौर में हुआ था जब भारतीय महिलाओं को वे सारे अधिकार नहीं प्राप्त थे, जो आज उनके पास हैं।

भारतीय महिलाएं उस दौर में शिक्षा, आत्म अभिव्यक्ति और अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के अवसरों से महरूम थीं। महिलाओं के लिए अलगाव, अधीनता की स्थिति, पर्दा तथा एकांत कौमार्य का शिष्टाचार बना हुआ था। कम उम्र में शादी के बाद बाहर की दुनिया से उनका संपर्क कम हो जाता था।

शारदा मेहता का शिक्षित होने के लिए संघर्ष

शारदा मेहता के साथ भी वही हुआ जो उस दौर की लड़कियों के साथ हो रहा था। जब वह मात्र 16 वर्ष की थीं तब सामाजिक प्रथाओं के अनुसार परिवार ने अपने चुने हुए स्व-जातीय युवक के साथ उनका विवाह कर दिया। जिसके बाद उनके पति सुमंत मेहता चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन हेतु इंग्लैड चले गए थे।

गुजरात में वर्ष 1902 में महिला शिक्षा ही नहीं, बल्कि सह-शिक्षा की मिसाल पेश करते हुए पहली स्नातक महिला बनने का गौरव जिन दो महिलाओं को प्राप्त है, उसमें शारदा मेहता और उनकी बड़ी बहन विधा गौरी नीलकंठ हैं। खुद को शिक्षित करने के लिए संकल्पबद्ध शारदा, अपनी बड़ी बहन के साथ तमाम विरोधों  के बावजूद एक महाविद्यालय में पढ़ने लग गईं, जो लड़कों का महाविद्यालय था।

जिन दिनों महाविद्यालयों में लड़कियों के पढ़ने पर कटाक्ष और असहमतियों के ताने झेलने पड़ते थे। उन दिनों लड़कों के महाविद्यालय में पारंपरिक साड़ी में सिर तक ढंकी दो लड़कियां सभी लड़कों और क्लास में प्राध्यापक के बैठने के बाद प्रवेश करतीं और क्लास में निर्धारित जगह पर बैठ जाती थीं। महिला शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता का यह उनके जीवन का पहला और बहुत बड़ा कदम था।

महिलाओं को शिक्षित करने का संघर्ष

इंगलैंड से लौटकर उनके पति डाॅ. सुमंत मेहता बड़ौदा राज में प्रमुख चिकित्साधिकारी नियुक्त हो गए और शारदा ने स्वयं को पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखने, अनुवाद करने और बाल साहित्य पर लघु-पुस्तिका लिखने में लगा लिया लेकिन वह स्वयं खुश नहीं थीं। वह नारी शिक्षा के क्षेत्र में कुछ करना चाहती थीं, जिससे महिला उत्थान हो सके।

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महिला शिक्षा के बाद महिलाओं की भूमिका पर वह लिखतीं हैं “महिलाओं को घर की चारदीवारी के भीतर काम-काज से संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। उन्हें अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के उत्थान में भाग लेना चाहिए।” महिलाओं के लिए शिक्षा का महत्व समझते हुए उन्होंने खुद 1913 में “चिमनबाई स्त्री समाज” की नींव रखी, जहां पहले सिलाई-बुनाई और नर्सिंग से छोटी-सी शुरूआत हुई, जो बाद में महिला पाठशाला और आगे चलकर कर्वे महाविद्यालय के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

शारदा एस.एन.डी.टी की सीनेट और सिंडीकेट की सदस्य रहीं। 1927 में जब अखिल भारतीय महिला सम्मेलन का गठन हुआ, तब वह मार्गरेट कजिन्स के साथ सक्रियता से जुड़ी रहीं। 20वीं सदी के प्रारंभिक दशक तक शारदा ने महिला शिक्षा से महिलाओं के जीवन और प्रयोजन को नया अर्थ देने का प्रयास किया।

शारदा की आज़ादी के संघर्ष में भूमिका 

उनके प्रयासों से डाॅ. सुमंत मेहता ने भी महसूस किया कि आर्थिक रूप से विपुल सरकारी नौकरी उनकी राजनीतिक और रचनात्मक गतिविधियों में बांधक बन रही है। जिसके बाद वह शारदा के साथ महात्मा गाँधी से मिले और आज़ादी आंदोलन में सक्रियता से जुड़े।

बारदोली सत्याग्रह के समय सारभौन आश्रम के संचालन के दौरान उनके संगठन क्षमता से सरदार  पटेल और गाँधी प्रभावित हुए। बारदोई सत्याग्रह के समाधान हेतु शारदा बंबई के राज्यपाल से मिलने गईं, जहां शिष्टमंडल सदस्य के रूप में उनका नाम मनोनीत किया गया। उन्होंने विदेशी कपड़ों का  बहिष्कार किया और शराब की दुकान के बाहर धरना दिया। साथ ही महिला रोज़गार और स्वावलंबन के लिए खादी आंदोलन को प्रोत्साहन देने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

शारदा ‘बहिष्कार समिति’ की अध्यक्षा रहीं और ब्रिटिश शोषण व अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध व्यक्त करने में वायसराय को भेजे गए पत्र में सबसे पहले हस्ताक्षर उनके ही थे।

आज़ादी के बाद जब सत्ता और पदवियों को पाने की होड़ मची तो शारदा और उनके पति ने इससे हमेशा के लिए स्वयं को अलग करके रचनात्मक कामों के प्रति समर्पित कर लिया। पति की मृत्य के बाद वह उनके संस्मरण को तीन खंडों में एकत्र करने में व्यस्त रहीं।

13 नंवबर 1970 को उनकी मृत्यु पर गुजरात के महाकवि उमाशंकर जोशी ने उनको माता का साक्षात रूप कहकर संबोधित किया। भारतीय नारी मुक्ति आंदोलन में महिला शिक्षा के लिए उनके संघर्षों को एक मुक्तिवादी महिला के रूप में याद किया जाता रहेगा।

संदर्भ – महात्मा गांधीज़ लास्ट इंप्रिज़नमेंट: द इन साइड स्टोरीज़ (खंड 8)

मूल चित्र : लेखक द्वारा 

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