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शादी डॉट कॉम ने रंग के फ़िल्टर हटा दिए तो क्या, लड़की तो हम गोरी…

Posted: जून 25, 2020

हाल ही में शादी डॉट कॉम ने एक क्रांतिकारी फैसला लिया कि अब उनकी वेबसाईट पर स्किन शेड कार्ड के आधार पर लड़की की प्रस्तुति नहीं होगी। 

आज एक खबर पढ़ते ही मैं पुराने गीत गुनगुनाने लगी। शायद आप भी गुनगुनाना चाहेंगे? जैसे,
“गोरे गोरे मुखड़े पे काला-काला चश्मा” या  “ये गोरे-गोरे गाल, ये तीखी-तीखी नज़रें, ये हिरनी जैसी चाल”

अगर गोरी लड़की ये गाने सुनें तो उसे लगे कि ये गाने उसके लिए ही लिखे गए हैं। और सांवरी लड़की सुने तो? तो बेचारी पहले कदम पर अपने आप को बहिष्कृत, तिरस्कृत, हारी हुई महसूस करे! सारा आत्मविश्वास, आत्म ग्लानि के कारण आँखों में आए अश्रुओं में बह जाए।

रंगभेद का ये मिशन तो था ही इम्पोसिबल

और लीजिए फिर सारी दुनिया उसकी बदल गई। अब वो अपने आपको उस ढर्रे में ढालने के लिए मुख्यतः दो काम करेगी। एक तो अपने आपको योग्य सिद्ध करने के लिए या तो ये मिशन इम्पोसिबल गोरी होने के लिए जी तोड़ मेहनत करेगी या फिर अपनी अच्छी शिक्षा, स्तरीय नौकरी, के लिए स्वयं को योग्य बनाएगी।

जैसे कि रंगभेद का पहला मिशन तो था ही इम्पोसिबल तो भी उसने उसमें भी हाथ आज़माया होगा! जिसमें उसके ही घर की, मोहल्ले की, सजातीय औरतों, लड़कियों ने बहुत सारे लेप के टोटके बताए हुए होंगे या धड़ल्ले से रंगभेद की नीति को समर्थन देती बाजार में बिकने वाली क्रीम, साबुन, कॉस्मेटिक वगैरह को प्रयोग करने के सुझाव दिए होंगे। पर किसी समझदार औरत ने ये नहीं कहा होगा कि, “बेटा! खूबसूरत दिल ही असली खूबसूरती होती है!”

चेहरा अपना पर उसका मूल्यांकन करने का अधिकार किसी और का?

हाँ, ये अवश्य कहा होगा, “खूबसूरती देखने वाले की नज़र में होनी चाहिए!” अर्थात दूसरा व्यक्ति देख कर बताएगा कि उक्त लड़की खूबसूरत है के नहीं! चेहरा अपना! जिस पर उस लड़की का अधिकार है, पर उसका मूल्यांकन कर परिणाम बताने का अधिकार हमने किसी और को दे दिया? चाहे वो लड़का बाकी गुणों के मामले में उस लड़की के सामने खड़े होने के काबिल भी न हो?

अब लड़की पढ़ाई, नौकरी के इस संघर्ष के समय अंतर्मन में ही एक संग्राम में अकेली युद्ध कर रही होती है कि कब शादी का मौका आएगा और उसे पता लगे कि वो योग्य है कि नहीं? और फिर जब रिश्ते की बात होनी शुरू हो तो रिश्तेदारी वाले हाथ खड़े कर कहते हैं, “आज कल विज्ञापन का जमाना है, इतनी सारी वेबसाइट हैं, वहां भाग्य आजमाया जाए!”

समाज की रंगभेद की मान्यताएं पैरों में कम दिमाग को अधिक लपेटे हैं

और जिनके दिल का वो टुकड़ा है वो, अपनी बेटी संग इस चित् या पट् के खेल में सिक्का फेंक उसकी साइड देखने का इंतजार करते हैं। क्योंकि समाज की रंगभेद की मान्यताएं बहुत भारी-भरकम जंजीरों जैसी होती हैं, जो पैरों में कम दिमाग को अधिक लपेटे होती हैं।

प्रचलित शेड कार्ड के आधार पर अपने रंग को एक नाम दें

और इन्हीं में कैद पढ़ी-लिखी, सक्षम लड़कियाँ लीक पीटने के लिए आगे बढ़ती जाती हैं। और फिर सुनहरे भविष्य को टटोलने के लिए किसी वेबसाइट पर जाती हैं, रजिस्टर करने के लिए हर जानकारी पूरे विश्वास से भरी जाती है पर एक कॉलम को देख कर दिमाग सुन्न हो जाता है, उंगली वहीं सोचती है कि ये तो वही धर्मसंकट है जिसके बारे में वह शायद एक सेकंड पहले भूली ही थी और वो फिर सामने? जो कि कह रहा है कि प्रचलित शेड कार्ड के आधार पर अपने रंग को एक नाम दें जो कि उक्त वेबसाइट पर एक फिल्टर की तरह काम करेगी। जिससे शॉपिंग करने वाले लड़के या उसके माता-पिता को आसानी हो जाए और जल्दी से उनका प्रोडक्ट मिल जाए।

तथा लड़की भी, शेड कार्ड की जानकारी के आधार पर अपना व्यक्तित्व, शील, गुण सब बहुमूल्य योग्यताएं, रंग के सामने गिरवी रख कर शिथिल होकर बैठ जाती है। शिक्षित मन उसका विरोध करना चाहता है परन्तु व्यवहारिक दिमाग उसे उसी ढलान पर संतुलन बनाए रखने को मजबूर करता है।

ये रंगभेद की धारणा आदिम जमाने से चली आ रही है

रंगभेद की ये अब की धारणा नहीं, आदिम जमाने से चली आ रही है। संसार के कई देश इस तरह के भेदभाव के जहरीले दंश के ग्रास बन चुके हैं। कुछ उदाहरणों के साथ चलिए उस पीड़ा को महसूस करने की कोशिश की जाए। और समझा जाए कि यह एक सजीव मानव के अस्तित्व के ऊपर कितनी बड़ी प्रताड़ना का स्रोत रही होगी।

डोर टेस्ट और कॉम्ब टेस्ट

अफ्रीका, अमेरिका, यूरोप , एशिया के अधिकतर देश “रंग भेद नीति” के उस क्रूर इतिहास से वाकिफ़ हैं। जिसमें घर के नौकरों तक को रखने तक के लिए रंग को बहुत अहमियत दी जाती थी। गाढ़े रंग के लोग ही नौकर बनेंगे, उनमें से भी घर के अंदर जो काम करेंगे, और बाहर काम करेंगे उसके लिए , ‘डोर टेस्ट ‘ जिसमें दरवाज़े पर शेड कार्ड में से निश्चित एक रंग का पेंट किया जाता था जो नौकर उस दरवाज़े के रंग से गहरे रंग के होते थे वो घर के बाहर काम करेंगे और हल्के रंग के घर के अंदर।

इसी तरह से ‘कॉम्ब टेस्ट’ जिसमें कंघी बालों में घुमा कर देखा जाता था, अगर कंघी अटक जाए तो हल्के दर्जे के काम दिए जाते थे। पहने जाने वाले कपड़े, डिजाइन, खान-पान सब रंग भेदी नीति के अंध गुलाम थे।

इसी तरह समुद्र के किनारे, पार्क में लगे बैंच, सामाजिक स्थानों पर भी आम लिखा होता कि ये अश्वेत लोगों के लिए नहीं। और तो और कानून भी इसका समर्थन करते थे। जज ,पुलिस में ऊँचे पदों पर भी शेड कार्ड के आधार पर योग्यता निश्चित की जाती थी। यही नहीं किए जुर्म की सजा कितनी सख्त होगी ये भी ‘शेडकार्ड योग्यता’ ही निर्धारित करती थी।

फिर सब बदल गया, पर रातों रात नहीं!

और फिर सब बदल गया, पर रातों रात नहीं! अपितु जब ऐसे देशों में क्रांति हुई, तब। बिलकुल ये सब वैसे ही नहीं! जैसे अंग्रेजों की गुलामी के दौर में हमें भुगतना पड़ा था कि अंग्रेज गोरे हैं अर्थात समझदार गुणी, उच्च सरकारी नौकरियों के योग्य। और हम भारतीय चाहे जितने भी योग्य हों पर सर्वोच्च, उच्च के योग्य नहीं, चाहे विदेश से ही शिक्षा ग्रहण करके आए हों! उन्हें अंग्रेज अपने से निम्न स्तर पर ही देखते। और फिर हम एक दिन कुछ जगे हुए मन-दिमागों के कारण जागे, उन्होंने क्रांति का बिगुल बजा कर हममें नव जीवन संचार किया और हम उस भेद भाव की सोच और व्यवहार से आजाद हो गए!

परन्तु तभी संसार के एक कोने में घटना घटती है

अरे! इसी बीच हम तो उस सांवरी लड़की को भूल गए जो वेबसाइट पर आज अपनी योग्यता सिद्ध करने में लगी है। न ये आज के जमाने की लड़की आजाद हुई न पुराने जमाने कि संस्कारी, सांवरी लड़कियाँ! परन्तु तभी संसार के एक कोने में घटना घटती है। जिसमें यूएस बेस्ड एक मानवीय भावनाओं को समझने, महत्व देने वाला दिल इस पीड़ा के न दिखने वाले दुख को महसूस करता है।
और केवल अपनी सबल इच्छाशक्ति के बलबूते पर उसी नेटवर्क का सहारा लेकर एक प्रश्न खड़ा कर देता है!

और वेबसाइट को लगता है कि कहीं उनका साम्राज्य न गिर जाए!

उस एक के जागने से अचानक बहुत से लोग उस रोशनी से जाग गए। तब गोरे-काले  रंग भेद विचारधारा को समर्थन देती ऐसी शादी करवाने वाली वेबसाइट की आँखें चुंधिया जाती हैं, और उसे लगता है कि कहीं उनका साम्राज्य न गिर जाए! कोई कानूनी लड़ाई की छाया उनके वेबसाइट के गोरे रंग को धूमिल न कर दे तो वो भी इस वायरल पटिशन के आगे झुक कर एक क्रांतिकारी फैसला करते हैं कि, “अब से उनकी वेबसाईट पर ‘रंगभेद नीति’ पर शेड कार्ड के आधार पर लड़की की प्रस्तुति न कर, उस लड़की की समर्थ, असली योग्यताओं का डॉटा फीड किया जाएगा!
तो फिर से सिद्ध हुआ कि एक विचार जिंदगी बदल भी सकता है, और दुनिया हिला भी सकता है!

प्रश्न है कि अब इसका परिणाम क्या होगा?

परन्तु प्रश्न है कि अब इसका परिणाम क्या होगा? क्या आदिम युग की ये सोच एक वेबसाईट के डॉटा एन्ट्री कॉलम बदलने से सचमुच बदल जाएगी! क्या सब सांवरी लड़कियों को योग्य जीवन साथी मिल पाएंगे? इसका उत्तर तो, आप लड़कियाँ ही दे सकती हैं!

अगर सकारात्मक हो कर देखें तो मशाल जल चुकी है बस इस नई सोच को अपनाने और समाज से कबूल करवाने कि जरूरत है। जो कि सरल बिलकुल भी नहीं। अभी तो सफर शुरू हुआ है।
ऐसे कई प्रोडक्ट, विचारों का भी विरोध करना बाकी है ताकि रंग भेद की नीति को कहीं भी हल्के में न लिया जाए, जो कि मेरे, आपके लिए साधारण सी बात हो सकती है परन्तु इस रंगभेद नीति के कारण चिंता के अंधेरे में कैद हमारी बच्चियों के लिए नहीं!

तो मंजिल की तरफ पहले कदम रूपी इस फैसले के बाद आगे बढ़ें। आपकी ही बारी चल रही है।
और मंजिल वहीं कहीं सामने है!

मूल चित्र : Canva 

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