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मैं पास हूँ या फ़ेल? मेरे मन में ये ख़्याल बार-बार क्यों आता है?

Posted: जून 6, 2020

जब नौकरी के आदेश, पति के तकाजे, बच्चों की इच्छाएं पूरी करने में 19-20 का फर्क रह जाता है ना, तो ये अंतर एक औरत, एक पत्नी, माँ के नाते बहुत भारी पड़ता है।

सड़क पर स्कूटी चलाते हुए जो खुशी, जो आजादी मिलती है, ना, वह कहीं और नहीं! हवा भी रास्ता रोकती नहीं, ब्लकि पिछली सीट पर बैठ खूब शोर मचाती है। और मैं लंबे श्वास के घूँट भर बेपरवाह इन पलों को अपनी आत्मा तक पहुँचाने की कोशिश कर लेती हूँ ।

इतना समय कहाँ कि कुछ आपको समझा सकें

वैसे तो लॉक डाउन है, बच्चे स्कूल नहीं आ रहे, परन्तु हम अध्यापक वर्ग को स्कूल आना पड़ता है। रोज़ नहीं, एक दिन छोड़ कर, स्टाफ़ अदल-बदल के ड्यूटी देता है।

सुबह घर से निकलते ही कॉलोनी की भाभियाँ मज़े लेकर पूछती हैं,”चले घूमने?” मैं भी हंस के कह देती हूँ, “हाँ जी! आओ आपको भी घुमा लाएं!”

“हमारे नसीब में ये सब, तैयार होना, घूम आना! कहाँ?” और मैं सोचती हूँ कि हमारे पास भी इतना समय कहाँ कि कुछ आपको समझा सकें!  बस मुस्कुराते हुए चल पड़ते हैं जलती गर्मी में किलोमीटर नापने!

‘हाँ जी! काम कर रहे हैं!’

लॉकडाऊन से पहले जहाँ मोबाइल वगैरह को देख स्कूल में अध्यापकों पर प्रश्न चिह्न खड़े हो जाते थे! आज यही मोबाइल शिक्षा की रीढ़ की हड्डी बन गए हैं। देर रात तक बैठ कर अपने विषय से संबंधित वीडियो,  ऑडियो, प्रश्न उत्तर शीट, पीडीएफ वगैरह बनाना। फिर स्कूल में या छुट्टी वाले दिन घर में बैठ बच्चों को भेजना।

जिन बच्चों की कॉपी की फोटो आ जाती है फिर तो ठीक अगर नहीं तो फोन करके प्रेरित करते रहना और कॉपी की प्रतीक्षा करना। फिर इस ब्यौरे को शिक्षा विभाग के ब्लॉक मैन्टोर , जिला मैन्टोर तथा संबंधित लिंक तक फ़ेसबुक, वॉटस्ऐप से भेजना ताकि बता सकें कि ‘हाँ जी! काम कर रहे हैं!’ तथा रोज़ के शिक्षा विभाग द्वारा भेजे कार्य विद्यार्थी तक भेजने।

आँखें फूट जाती हैं। फिर सुबह जिस सवारी का आनंद आता है दोपहर के वक़्त सबसे बड़ा पाप लगती है। कई घंटे मोबाइल और रजिस्टरों में अनुसंधान में तपी आँखें सूरज की आग में बिलकुल चुंधिया जाती हैं ।

परन्तु घर में घुसते ही ऐ.सी की ठंडक का मखमली माहौल अंदर खींचता है और कॉलोनी में सब्जी वाले की आवाज़ गेट की तरफ मुँह मोड़ देती है। मन तो नहीं करता पर सब्जी तो लेनी है!

फिर साफ-सुथरे होकर रसोई घर का हाल पूछा जाता है। सबके चेहरे पढ़े जाते हैं । जिसमें रसीले पकवान आँखों में तैरते दिखाई देते हैं। इस खुली कॉपी को अच्छी तरह परख कर, तसल्ली की जाती है कि कहीं कोई प्रश्न चिन्ह न रह जाए? और काम वाली (वर्षा) की भी याद बहुत तड़पाती है।

टी.वी के सामने बैठने की मनोरम घड़ी आ गयी लेकिन…

उफ! सब प्रश्न पत्र हल कर पति के संग टी.वी के सामने बैठने की मनोरम घड़ी आती है। तकिए महाराज अपनी अकड़ भूल सिर को सहलाते ही हैं कि पति की हल्की मुस्कान फिर एक प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देती है। बोलने की हिम्मत नहीं तो इशारों में ही एक कप चाय की फ़रमाइश सुनाई देती है। कुछ सोचती हूँ परन्तु तरस आ जाता है क्योंकि वे भी ऑफिस से शाम को आते हैं। परन्तु खुद पर तरस नहीं आता!

एक अध्यापिका , पत्नी, माँ के नाते बस सब ओर बड़े-बड़े प्रश्न चिन्ह दिखाई देते हैं। मुझ पर कोई ज़बरदस्ती भी नहीं, पर फिर भी मैं फ़ेल नहीं पूरे अंक लेकर केवल फर्स्ट आना चाहती हूँ। परन्तु जब कहीं नौकरी के आदेश, पति के तकाजे,  बच्चों की इच्छाएं पूरी करने में 19-20 का फर्क रह जाता है, ना, तो ये अंतर वैसे तो बाकी मामलों में नजर अंदाज किया जा सकता है। पर एक औरत, एक पत्नी, माँ के नाते बहुत भारी पड़ता है।

मूल चित्र : Canva

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