कोरोना वायरस के प्रकोप में, हम औरतें कैसे, इस मुश्किल का सामना करते हुए भी, एक दूसरे का समर्थन कर सकती हैं?  जानने के लिए चेक करें हमारी स्पेशल फीड!

फिल्म गुलाबो सिताबो है मज़बूत महिला किरदारों की एक ज़बरदस्त फिल्म

फिल्म गुलाबो सिताबो में महिलाओं के हिस्से जितना भी है वो जबरदस्त और फिल्म की जान है, ये महिला किरदार आपको अक्ल के मामले में पुरुषों पर भारी दिखेंगे। 

फिल्म गुलाबो सिताबो में महिलाओं के हिस्से जितना भी है वो जबरदस्त और फिल्म की जान है, ये महिला किरदार आपको अक्ल के मामले में पुरुषों पर भारी दिखेंगे। 

रिलीज़ होने के चैबीस घंटे में हमने कोई फिल्म आजतक नहीं देखी। हिंदी फिल्मों के प्रति हमारे प्यार पर शक न करें, लेकिन फिल्म १ दिन या १ हफ्ते या की १ साल पुरानी हो तो भी कहानी नहीं बदलती ऐसी अजीब सोच रखते हैं हम।

हमारी सोच अजीब है इसका खुलासा पहले ही कर दे रहें हैं क्योंकि अगर आपने ये पोस्ट नुमा रिवेव्यू नुमा दिल की बात पूरी पढ़ी तो आप भी शायद अंत में कहें, “बड़ी अजीब हैं, इनने ये सब कैसे दिख गया!”

तो तमाम मोहतरम ये जान लें कि मायके से जुड़ी कोई भी चीज़, इंसान, जगह, सब जी हाँ सब बड़ा अज़ीज़ होता है और फिर ये तो 1 घंटा 58 मिंनट और 52 सेकंड तक हमे मायके के शहर में घुमाता रहा।

न, रुकिए इतनी जल्दी जज न करें और इसे हमारे लॉकडाउन में लखनऊ न पहुंच पाने से आये बुखार का ताप भी न जाने। कुछ था, जो पता नहीं कैसे कुछ अज़ीज़ दोस्तों से छूट गया या यूँ कहें कि हम अजीब हैं तो इस कुछ सुस्त चाल फिल्म में हमने वो देखा जो हमे अमूमन हर जगह दिखता है या हम देखना चाहते हैं।

फिल्म गुलाबो सिताबो के किरदार!

आयुष्मान खुराना उर्फ़ बांके

औसत से कुछ ऊपर देंगे इस किरदार को आयुष्मान के होने मात्र ने इस किरदार से अपेक्षा बहुत बढ़ा दी थी लेकिन लखनऊ फैज़ाबाद बस्ती गोरखपुर गोंडा के रहने वाले मित्रों ने बांके से कभी न मुलाकात तो की होगी। छठी पास और कभी आठवीं फेल बांके घूमते हैं 22 -24 साल तक खुद को लड़के लपाड़ों में गिनते हुए कभी किसी गल्ले पर या कभी बिना काम धंधे के।

किसी न किसी गली मोहल्ले में ‘इनकी वाली’ भी होती है और चूँकि अब ज़रा इन शहरों के पुराने मोहल्ले भी फारवर्ड हो गए हैं तो कभी हनुमानगढ़ी, कभी गोमती पुल पर मिल जायेंगे और फिर कुछ साल में या महीनों में वो नये जोड़े में सज बगल से बिना पलक उठाए निकल जाती है इसका दर्द! उफ़ बहुतों को ज़रा सी कसक होगी हालाँकि ये फिल्म का मुख्य प्लाट नहीं था। बहरहाल बांके को दिए हमने 5 में से 2.5

Never miss real stories from India's women.

Register Now

अमिताभ बच्चन उर्फ़ मिर्ज़ा

मेरी क्या ही बिसात की सदी के महानायक के ऊपर दो शब्द भी लिखूं लेकिन मिर्ज़ा! मिर्ज़ा की साफगोई दिल जीत गयी। आला दर्ज़े के टुच्चे, और सौ फीसदी लखनऊ के रंग में सराबोर मिर्ज़ा से कोफ़्त होने लगती है जब उसे सिर्फ हवेली दिखती है। इतना लालच मियां उम्र का ख्याल किया होता। कब्र में पैर लटके हैं लेकिन इन्हें  हवेली अपने नाम चाहिए!

क्यों? क्या बेगम ने कोई कमी रखी? लेकिन लालच बुरी बला ही नहीं आफत हैं और इसका नमूना है मिर्ज़ा। चोरी चकारी टुच्चई उनके नस नस में थी और इस मुई हवेली के लालच ने धोखेबाज़ भी बना दिया।

साफगोई ज़रूर पसंद आयी क्योंकि बांके के पूछने पर बेख़ौफ़ बेझिझक बता दिए की 15 साल बड़ी बेगम से निकाह किया हवेली की खातिर और हाँ , कुछ अवध की मर्द ज़ात की तरह खुशफहमी का शिकार भी थे और सोचते की बेगम उनकी जवानी पर मर मिटी ! हम्म, अब क्या ही कहें तुम्हे मिर्ज़ा तुमने बेगम जान से हवेली के लिए निकाह किया या बेगम जान ने तुमसे हवेली के इश्क़ में निकाह किया!

ऐसे मिर्ज़ा हैं आस पास देखने की कोशिश तो करिये, औकात नहीं लेकिन फिर भी 78 साल के मिर्ज़ा ,ऊँचे पाएंचे के पायजामे में बड़े इमामबाड़े के सामने से गुज़रते हुए बिलकुल अपने किरदार में थे और इन्हे 5 में से – ये गुस्ताखी नहीं होगी। आगे बढ़ते हैं।

अब बात फिल्म गुलाबो सिताबो की धुरी और उसके मुख्य किरदार!

हाँ मिर्ज़ा और बांके हो गए लेकिन धुरी कुछ और, और मुख्य किरदार जिसने दिल जीत लिया वो थी औरतें! जी हाँ शायद ध्यान नहीं गया आपका इन औरतों पर जो किरदारों में सबसे मज़बूत थी।

बांके की माँ

बांके की माँ, जिसने ठान लिया कि तीनों लड़कियों की पढ़ाई बहुत ज़रूरी है। वजह चाहे जो रही हो, लेकिन लड़कियां पढ़ गयी और क्या खूब पढ़ी। सबसे छोटी तो, ज़बान मानो कैंची!

गुड्डो

गुड्डो, घर की और समाज के हालात को देखती हुई, पढ़ाई के साथ दुनियादारी सम्भालने में बांके से बेहतर। ये बात बांके को नहीं जंचती लेकिन सच्चाई आँखिन पर पट्टी बंधे से बदल तो नहीं जाएगी न!

फ़ौजिआ

फ़ौजिआ, जो कि बांके की गर्लफ्रेंड की भूमिका में है।ब्रेकअप और मूव ऑन करने की अदा ऐसी की मात्र ‘आर्गेनिक आटा है क्या ?” ये पूछ कर ही सब पर पानी फेर दिए या कहें की आटा भरभरा दिया !

दुल्हन

दुल्हन, हाय अरसे बाद सुना ये शब्द। दादी मेरी माँ को दुल्हिन बुलाती थी। अवधि में दुल्हिन ही कहा जाता है और ये कुछ उर्दू का पुट लिए लखनऊ के जनानखाने में ‘दुल्हन’ शब्द का प्रचलन था। आह ये था बड़ा बुरा है! दुल्हन अपनी मालकिन की पक्की वफादार।

देखने वाले शायद इन किरदारों को कहानी को आगे बढ़ाने या बस फिलर के तौर पर देखें लेकिन सुजीत सरकार ने बाकि फिल्मों की तरह बेहद मज़बूत औरतों की झलक दी है जो अपने दिल, दिमाग और जिस्म, तीनों से सोचती है वो भी बिना शर्मिंदगी के।

मेरे लिए फिल्म गुलाबो सिताबो की मुख्य किरदार ‘बेगम फत्तो’ यानि की फ़ारुख़ जफर!

और अंततः मेरे लिए फिल्म की मुख्य किरदार ‘बेगम फत्तो’ यानि की फ़ारुख़ जफर!

पहले ही सीन में लखनऊ के ज़ायके को ज़बान में महसूस कर सकते हैं। जितनी बार भी डायलॉग आये फ़िज़ा में वाकई पुराने लखनऊ की आबो हवा की खुशबू महसूस हुई। बेगम फत्तो एक मुस्कराहट ले आयी जब वो और दुल्हन सैर पर निकली और देर रात बुढ़िया के बाल के साथ लौटी। देर रात तक घूमने का हक है!

और आखिर कदम जानलेवा!

बेगम फत्तो 95 साल की उम्र में अपने पुराने आशिक के साथ ‘भाग गयी’! जी अटपटा लगा न?

इस वाकये को फिल्म की पटकथा लिखने वाली जूही चतुर्वेदी ने क्या सोच कर लिखा, ये तो नहीं बता सकती लेकिन हालिया दिनों की सबसे मज़बूत किरदारों में से एक हैं बेगम फत्तो। जिस दिन गलती का एहसास हो गया उसे सुधारने की प्रक्रिया शुरू कर दी।

और तौबा उनका दिमाग!

बांके और मिर्ज़ा लगे रहे पुरातत्व विभाग के ज्ञानेश शुक्ल (विजय राजा की बेमिसाल एक्टिंग) और वकील क्रिस्टोफर (बृजेन्द्र काला, I speak English at HOME. खाने में सिर्फ लंच और डिनर खाते हैं!) व बिल्डर के पीछे और यहां बेगम फत्तो ने डाक्टर के वेश में वकील बुलवा भेजा और कर दिया सौदा!

अब खाओ बतासा! न रही हवेली न रही बेगम।

हाथ आये हीरे की कीमत मिर्ज़ा को न थी, न आगे होगी इसका पता आखिरी सीन में चल ही जाता जब 250 रुपल्ली में बेची कुर्सी पर 1 लाख 35 हज़ार का तमगा लग जाता है ।

बेगम जान यानि की बेगम फत्तो की कीमत अब्दुर रहमान ने की और वो चली गयी अपनी ज़िन्दगी जीने बेहिचक बेझिझक!

आखिर में अगर पुराने शहर को देखना व महसूस करना चाहते हैं तो भी फिल्म देख लीजिये, असल में लखनऊ बदल रहा है। बड़े शहर बनने की रेस में खो रहा है। रूमी दरवाज़े को बिना भीड़ के देखने की खुमारी अलग होती है।

पुराने लखनऊ की तरह कुछ सुस्त रफ्तार, मगही पान की तरह ज़बान पर धीमे धीमें घुलता और किरदारों की परतों में लिपटी फिल्म गुलाबो सीताबो। अगर आजकल की वेबसेरीज़ और नेटफ्लिक्स की स्लीक फ़िल्में आपकी पसंद हैं, तो मत देखिये लेकिन अगरचे आपकी भी किसी हवेली या मेहराबदार दरवाज़े से आशिकी रही हो या के किरदारों की रूह में झाँकने का शगल हो तो आराम से दिल के दिमाग को खोल कर देख डालिये।

हाँ, दिल में भी दिमाग होता है और ये अटपटी बात फिर कभी।

मूल चित्र : YouTube 

टिप्पणी

About the Author

Sarita Nirjhra

Founder KalaManthan "An Art Platform" An Equalist. Proud woman. Love to dwell upon the layers within one statement. Poetess || Writer || Entrepreneur read more...

22 Posts | 105,568 Views
All Categories