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डॉक्टर्स डे : क्या आप भारत की पहली महिला डॉक्टर्स को जानते हैं?

Posted: जून 30, 2020

भारत में १ जुलाई को हर वर्ष डॉक्टर्स डे मनाया जाता है, इस दिन का सही अर्थ है हमारे डॉक्टर्स को अपनी निस्वार्थ सेवा के लिए सम्मान देना।

हमारे देश में डॉक्टर्स को भगवान का दर्जा दिया जाता है और उन भगवान् का शुक्रिया अदा करने के लिए एक दिन भी सुनिश्चित कर रखा है। भारत में १ जुलाई को हर वर्ष डॉक्टर्स डे मनाया जाता है, इस दिन का अर्थ उन्हें अपनी निस्वार्थ सेवा के लिए सम्मान देना है।

यह दिन चिकित्सा उद्योग और इसकी उन्नति के लिए भी मनाया जाता है। प्रौद्योगिकी के माध्यम से लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए डॉक्टरों ने अथक प्रयास किये हैं और यह दिन उनकी उपलब्धियों को चिह्नित करता है।

डॉक्टर्स डे का इतिहास

दुनिया भर के विभिन्न देशों में अलग-अलग तिथियों पर डॉक्टर दिवस मनाया जाता है और भारत में यह १ जुलाई को मनाया जाता है अब सवाल यह उठता है की आखिर १ जुलाई ही क्यों?

तो आइये जानते हैं इसके पीछे का इतिहास

नेशनल डॉक्टर्स डे प्रसिद्ध चिकित्सक और पश्चिम बंगाल के दूसरे रहे मुख्यमंत्री डॉ बिधान चंद्र रॉय को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है। डॉ. बिधान चंद्र का जन्म और पुण्यतिथि दोनों ही १ जुलाई को होती हैं।

1991 में, केंद्र सरकार द्वारा डॉ. बिधान चंद्र रॉय को सम्मान देने के लिए राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस की स्थापना की गई थी। डॉ. चद्र एक बहुत सम्मानित चिकित्सक और एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे। वह बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री थे और 1948 में अपनी मृत्यु तक अपने पद पर लगभग 14 साल रहे। उन्हें पश्चिम बंगाल का महान वास्तुकार भी माना जाता है उनको भारत सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

आइये अब जानते हैं भारत की पहली महिला डॉक्टर्स के बारे में

कादम्बनी गांगुली

भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के दौरान, महिलाओं के अधिकार और शिक्षा बहुत दूर की बात थी। अधिकांश महिलाओं को शिक्षा अनुमति नहीं थी।


तब ‘कादम्बनी गांगुली’ देश की पहली ऐसी महिला बनीं जिन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में डिग्री प्राप्त की।
कादम्बिनी ने अपनी औपचारिक शिक्षा बंगा महिला विद्यालय से पूरी की। वह कलकत्ता यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा में बैठने के लिए बेथ्यून स्कूल से पहली उम्मीदवार थीं और 1878 की शुरुआत में परीक्षा पास करने वाली पहली महिला बनीं।

उन्होंने अपने शिक्षक, द्वारकानाथ गांगुली से शादी की, जो कि बंग महिला विद्यालय के ब्रह्म समाज के प्रमुख नेता थे, जो उनसे 20 साल बड़े थे।

जब अधिकांश लोगों ने सोचा कि वह स्नातक होने के बाद अपनी शिक्षा को समाप्त कर देगी, तो द्वारकानाथ ने उन्हें चिकित्सा का अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित किया। लेकिन डॉक्टर बनने की राह आसान नहीं थी, कलकत्ता मेडिकल कॉलेज ने उनकी योग्यता के बावजूद कदंबिनी को दाखिला देने से मन कर दिया क्योंकि पहले किसी भारतीय महीला ने ऐसी कोशिश नहीं की थी और महिलाओं का उस क्षेत्र में कोई इतिहास नहीं था।

आनंदी गोपाल जोशी

1886 ने आनंदी गोपाल जोशी के साथ पश्चिमी चिकित्सा पद्धति का अभ्यास करने वाली पहली भारतीय महिला चिकित्सक के रूप में अपने रिकॉर्ड को चिह्नित किया। उन्होंने अपनी जीबीएमसी (बंगाल मेडिकल कॉलेज की स्नातक) की डिग्री प्राप्त की, जिससे उन्हें अभ्यास करने की अनुमति मिली।

आनंदीबाई गोपालराव जोशी पहली महिला भारतीय चिकित्सक थीं। वह संयुक्त राज्य अमेरिका से पश्चिमी चिकित्सा में अपनी पढ़ाई पूरी करने वाली भारत की पहली महिला भी थीं। आनंदी की शादी 9 साल की छोटी सी आयु में हो गयी थी लेकिन उनके पति ने उनको आगे पढ़ाने का निर्णय लिया।

आनंदीबाई के पहले बच्चे को 14 साल की उम्र में छेद हो गया था , चिकित्सकीय देखभाल की कमी के कारण, दस दिनों के बाद बच्चे का निधन हो गया। यह घटना आनंदीबाई के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ थी और उन्होंने अपने पति के समर्थन से चिकित्सा को आगे बढ़ाने के लिए चुना।

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गोपालराव चाहते थे कि आनंदी चिकित्सा सीखें और दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाएं। गोपालराव ने आनंदीबाई को चिकित्सा का अध्ययन करने के लिए अमेरिका भेजने का निर्णय लिया।
आनंदीबाई को पेन्सिलवेनिया के महिला मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया गया और 19 साल की उम्र में चिकित्सा के क्षेत्र में अपना दो साल का कोर्स पूरा किया। उन्होंने 1886 में एमडी के साथ अपनी थीसिस का विषय ‘आर्यन हिंदो के बीच ऑब्स्टेट्रिक्स’ रखा।

अपनी थीसिस में, उन्होंने आयुर्वेदिक ग्रंथों और अमेरिकी पाठ्यपुस्तकों के बारे में जानकारी दी। उनकी स्नातक होने पर, महारानी विक्टोरिया ने उन्हें एक संदेश भेजा।

इस प्रकार कादम्बिनी गांगुली भारत में चिकित्सा का अभ्यास करने वाली पहली महिला डॉक्टर थीं जबकि आनंदीबाई जोशी पहली महिला डॉक्टर थीं जिन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका से पश्चिमी चिकित्सा में अपनी डिग्री हासिल की।

आज करोना के दौरान वाकई डॉक्टर्स ने यह साबित कर दिया कि वह भगवान् का स्वरुप होते हैं, उन्होंने अपने घरों को छोड़कर अपने परिवारों को छोड़कर सिर्फ और सिर्फ अपने मरीजों को महत्व दिया, उन्होंने अपने स्वास्थय की परवाह किये बिना दिन रात अपने मरीजों का इलाज किया और अब भी कर रहे हैं।

आज विमेंस वेब की तरफ से हम भी उन सभी डॉक्टर्स को धन्यवाद देते हैं , जो निस्वार्थ रूप से दूसरों की सेवा करते हैं। वो सभी सच्चे नायक हैं और उन्हें इस तरह से पहचाना जाना चाहिए।

मूल चित्र : Wikipedia 

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