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अनुराग कश्यप की फ़िल्म ‘चोक्ड – पैसा बोलता है’ नोटबंदी में मिडिल क्लास स्ट्रग्ल की कहानी है

अनुराग कश्यप की नई फ़िल्म चोक्ड - पैसा बोलता है, एक साधारण से लगने वाले असाधारण राजनैतिक टॉपिक, नोटबंदी, पर कसी गई एक सरल और खूबसूरत फ़िल्म है।

अनुराग कश्यप की नई फ़िल्म चोक्ड – पैसा बोलता है, एक साधारण से लगने वाले असाधारण राजनैतिक टॉपिक, नोटबंदी, पर कसी गई एक सरल और खूबसूरत फ़िल्म है।

स्पॉइलर अलर्ट 

अभिनेता भी पूरे और जिनके निदेर्शन में भी है दम वह है अनुराग कश्यप। इस बार उनके पिटारे से निकली है एक खूबसूरत सी कहानी फ़िल्म चोक्ड : पैसा बोलता है, जो साधारण से लगने वाले असाधारण राजनैतिक टॉपिक (नोटबंदी) पर कसी गई है। कहानी कहने में समान्य फार्मूले से अलग एक शिल्प का सहारा लिया गया जो कहानी कहने की खूबी के बतौर याद की जाएगी। इसके खतरे उठाकर इसे सफल बनाने का काम एक मजा हुआ निर्देशक ही कर सकता है जो करने में अनुराग सफल होते दिखते है। साथ ही साथ भक्तों की राजनीति की भोथरी धार पर दौड़कर चलने में भक्तों को तो समझ ही नहीं आएगी।

चोक्ड – पैसा बोलता है की क्या है कहानी

एक आम मिडिल क्लास परिवार का संघर्ष, अचानक अमीर हो जाना और फिर नोटबंदी के बाद खड़े हुए हालातों के उतार-चढ़ाव को बयां करती है कहानी चोक्ड  – पैसा बोलता हैचोक्ड (choked)  दो हिस्से में कही गई कहानी लगती है पहले हिस्से में एक आम मीडिल क्लास परिवार के संघर्ष की कहानी है जहां सारे के सारे पात्र चोक्ड है और दूसरे हिस्से में पैसा बोलता है।

कहानी है सरकारी बैंक में काम करने वाली सरिता सहस्त्रबुद्धे(सैयामी खेर) की। मराठी महिला है, पति साउथ इंडियन- सुशांत पिल्लई(रोशन मैथ्यू)। जो बेरोज़गार है, घर के छुटकर काम करता है या दोस्तों के साथ बैठकर कैरम खेलता है। इनका एक नन्हा बेटा है समीर, मध्यमवर्गीय परिवार है। रोज़ आलू की सब्ज़ी बनती है, सरिता रोज़ घर का काम करके, टिफिन बनाकर, लोकल ट्रेन पकड़कर बैंक जाती है। शाम को भाजी तरकारी लेते हुए लौटती है, थकी हारी, वापस आकर फिर रसोई में जुटती है। खाना पकाती है, लाइफ नीरस है। जिसे देखकर कोई कह नहीं सकता कि इनकी लव मैरिज़ है।

एक रात सबकुछ तब बदल जाता है जब सरिता का रसोई का नाला ओवरफ्लो हो जाता है और उसमें से पैसे निकलते हैं। हज़ार हज़ार के नोट, वो चौंक जाती है, वो बहुत खुश हो जाती है। लेकिन तभी देश में नोटबंदी की घोषणा कर दी जाती है, हज़ार और पांच सौ के पुराने नोट बंद। उसे धक्का लगता है, लेकिन फिर रसोई के पाइप से 2000 के नए नोट निकलने लगते हैं, पूरा माजरा क्या है ये जानने के लिए फिल्म देखना होगा।

फिल्म में जब पहली महिला पात्र सरिता कहती है, “मेरा मोदी जी से कोई प्रॉब्लम नहीं है, तुम से है सुशांत। जान निकल रही है मेरी बैंक में। कोई रो रहा है, कोई मर रहा है। चौबीस घंटे काम करो और वापस आओ तो घर साफ नहीं रहता है। टाइम नहीं है मेरे पास प्रधानमंत्री के बारे में सोचने के लिए। और तुम्हारे पास टाइम के अलावा कुछ है नहीं। ये लो, करो साफ। बनो प्रधानमंत्री।”

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यह संवाद एक साथ एक कामकाजी बैंकर महिला के सारे तकलीफ को उधेड़ कर रख देता है। जिसके बारे में अभी तक प्ब्लीक स्पेस में नोटबंदी के बाद कुछ भी नहीं कहा गया है। जबकि नोटबंदी की मार के बाद काम करते हुए सबसे अधिक बैंड बैककर्मियों की बजी थी। सरिता अपने साथ-साथ नोटबंदी के कारण समाज की तकलीफ को भी समेट लेती है।

दूसरी महिला पात्र शरवरी ताई(अमृता सुभाष)  है घर में बेटी की शादी, छत के सीलन से परेशान है और पांच सौ, हजार के नोट बंद होने के बाद वैसे ही पीड़ा में है जैसे उस समय तमाम शादी करने वाले परिवार थे। नोटबंदी का महिलाओं पर पड़ने वाले असर का छोटा सा मूल्यांकन, वह भी शानदार।

कमोबेश एक घंटे चौबन मिनट की फिंल्म की कहानी, में संघर्ष अचानक आई खुशी और नोटबंदी के बाद की आम जिंदगी की परेशानियों पर गहरी निगाह रखकर अनुराग कश्यप ने सैयमी की बोलती आंखों से शानदार काम लिया है रोशन मैथ्यू और बाकी सह कलाकार अपने अभिनय से चोक्ड को देखने लायक बना देते है।

फिल्म का एक संवाद बैककर्मियों को लंबे समय तक याद रहेगा, “बस यहीं मात खा जाती है भारत माता। उस मशीन ने दो दो बार गिनकर बता दिया कि चालीस हजार है, लेकिन नहीं। जब तक उंगली को थूक लगाके दो बार गिन नहीं लें तब तक भारत माता की जय कहां होने वाली है।”

इसका जवाब भी उतना ही सुंदर है, “मशीन बैचारी ने दो बार गिना है थूंक लगाकर मैंने तीसरी बार गिना है, आप फिर से नहीं गिनेगें न।” इसके बाद की मुस्कान, यही है जिंदगी, जो हर उतार-चढ़ाव के बाद भी हल्के-फुल्के नोकझोक के साथ चलती रही और चलती रहती है।

मूल चित्र : YouTube 

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