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अगर आप एक खुशहाल परिवार चाहते हैं तो आपका ज़िम्मेदार होना भी ज़रूरी है!

Posted: मई 21, 2020

जब आप अपने घर, बच्चों और अपनी पत्नी की ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकते, तो इन सब में, सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए न पड़ें। पहले खुद को ज़िम्मेदार बनाएं। 

“आज ऑफिस से आने में लेट हो जाऊँगा, तुम मार्किट से सब्जियां ले आना,” विराज ने अपनी पत्नी सुलेखा से कहा

“ठीक है मैं ले आउंगी, वैसे आप कब तक आ जाओगे?”

“यार आज मीटिंग है, खत्म होते होते शाम के 6 बज जाएंगे”, विराज ने कहा।

“ओके कोई बात नहीं”,  सुलेखा ने धीरे से कहा और फोन रख दिया।

शाम को सुलेखा सब्जियां लेकर घर पहुंची ही थी कि विराज आ गया, “आप तो लेट आने वाले थे फिर क्या हुआ जल्दी आ गए?”

“अरे वो मीटिंग कल की रखी गई है।”

“अच्छा हुआ आप आ गए। आप पिया को थोड़ा होमवर्क करवा दो, मैं तब तक रात के खाने की तैयारी कर लेती हूँ।”

“क्या यार तुम भी न! तुम इसे पापा के पास बिठा दिया करो वो इसे पढ़ा देंगे।”

“विराज आपको पता है कि पापा जी को कमर की प्रॉब्लम है, वो ज्यादा देर तक नहीं बैठ सकते, और वो सारे दिन तो टीवी देखते हैं कभी न्यूज़, कभी शेयर बाजार।”

“आपको पढ़ाना है तो बोलो… वरना मैं ही कर लूंगी।”

“अच्छा! तुम ही पढ़ा लेना पिया को।”

“विराज सुन लो, कुछ दिनों के बाद पिया के स्कूल में पीटीएम है। मैडम ने बच्चों से कहा कि सब अपने माता पिता को साथ लेकर आएंगे।”

“ओके मेरी पत्नी मैं चलूंगा”, विराज ने गर्दन हिलाकर बोला।

“पीटीएम शनिवार को है और आपकी छुट्टी होती है कोई बहाना मत बना लेना”, सुलेखा ने भी हँसते हुए कहा।

शनिवार की सुबह सुलेखा और पिया तैयार हो गयी लेकिन विराज ने कहा, “मैं नही जा पाऊंगा, तुम पापाजी को लेकर चली जाओ मुझे बहुत जरूरी काम है आफिस का, घर से ही करूँगा।”

“ठीक है हम जा रहे हैं। आप पीकू को ध्यान रखना, उसे नहला कर खाना खिला देना।”

“ओके पत्नी कर दूंगा।”

करीब तीन घंटे के बाद पापाजी, सुलेखा और पिया वापिस आये।

देखा तो विराज सोफे पर आराम से लेट कर टीवी देख रहें है और पीकू नहाया नहीं है और जोर-जोर से रो रहा है। फिर जैसे ही उसे गोद मे लिया, तभी सुलेखा की सास बोल पड़ी, “आगे से इसे भी साथ लेकर जाया करो, बहुत तंग करता है, कोई काम भी नहीं करने देता। इसका ध्यान मुझसे नहीं रखा जाता और विराज तो तुम्हारे जाते ही टीवी देखने लगा इसे कोई चिंता नहीं है पीकू की।”

सासू माँ की बात सुनते ही सुलेखा को बहुत गुस्सा आया। उसने विराज को आड़े हाथों लिया और बोला, “जब आपको हमारे साथ जाना नहीं था, तो आपने बहाना क्यों बनाया? स्कूल में भी मैडम ने आपके न आने का कारण पूछा, कह रही थी बच्चों के साथ पिता का आना जरूरी होता है। पिया क़ी फीस सबमिट करवानी थी, वो तो अच्छा हुआ कि पापाजी रुपये लेकर गए थे, वरना मुझे वापिस घर आना पड़ता।”

“ये बच्चे आपके हैं या आपके माँ-बाप के जो बच्चों की सारी जिम्मेदारी वो उठाएं? जब बच्चों की जिम्मेदारी नहीं ले सकते थे तो इन्हें पैदा ही क्यों किया था या उस समय भी यही सोचा था कि मेरे माँ बाप ही मेरे बच्चों का पालन करेंगे। जब आप अपने घर, बच्चों और अपनी पत्नी की जिम्मेदारी उठा नहीं सकते थे, तो पहले ही मुझे बता दिया होता तो आज कहानी कुछ और होती।” सुलेखा इतना बोल कर चली गयी और विराज बिना कुछ बोले सुलेखा को ही देखता रहा।

यह सच्चाई है, आज भी कई आदमी अपने माता पिता के बिना कुछ नही कर सकते यहां तक कि उनके बच्चे भी उनके माता पिता के भरोसे ही पलते हैं। माना कि हमें अपने बड़ों की मदद चाहिए, उनके द्वारा दी गई सलाह हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। लेकिन आप इतने भी पंगु भी मत बनिए कि माता-पिता बिना एक कदम भी चल पाना असंभव हो जाए।

मूल चित्र : Canva

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