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काश मेरे बच्चे भी असली बचपन जी सके……

Posted: मई 22, 2020

प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही दुनियां में खोया हुआ है व्हाट्सएप, फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम से जुड़े हुए हैं लेकिन अपने आस पास रहने वाले लोगों के साथ बात करने का समय नही है।

काश फिर से वो दिन लौट कर आ जाते बचपन की वो खट्टी मीठी यादें आज भी ताज़ा हैं जैसे कल की बात हो मेरा मन उन्हीं पुराने दिनों को याद करते हुए कभी कभी मचल उठता है। हमारा मिट्टी में खेलना, घर बनाना, उछल कूद करना, पकड़म पकड़ाई, चोर पुलिस, सतोलिया, लूडो, कैरम और न जाने कितने खेल खेलना। सारा दिन मस्ती करना और क़भी कभी मम्मी से मार भी खाना। वैसे हम सबका बचपन बहुत खेलकूद, मस्ती में बीता है, वैसी मस्ती आज कल के बच्चों की कहाँ मिलेंगी।

आज के बच्चों को सिर्फ मोबाइल फोन चाहिये और कुछ न हो तब भी चलेगा। आज सब कुछ तो मोबाइल में मिल जाता है। हमारे समय में मोबाइल नहीं थे बहुत अच्छा था वरना हम सब भी आज के बच्चों की तरह सिर्फ मोबाइल में ही लगे रहते। मेरी बेटी तो अभी छोटी है तो उसे मोबाइल का इतना शौक नही है। मेरी बेटी को तो टी वी पर भीम देखना पसंद है, उसके लिए वो पूरा दिन बैठ सकती है। लेकिन हमें दूरदर्शन पर आने वाली रंगोली, महाभारत, रामायण, चंद्रकांता, चित्रहार आदि का इंतजार करना और देखना आज भी याद है उनके क़िरदारों को भी अच्छे से पहचानते थे। आज भी उनको दुबारा देखने को तैयार है।

जब भी मायके जाना होता है अपने भाई बहिन और पड़ोस के बच्चों के साथ मिलकर आज भी हम लुक्का-छुप्पी का गेम जरूर खेलते है। आस पड़ोस, और हमारे घर की नयी पीढी यानि कि मेरी बेटी, भतीजे और भतीजी भी हमारे साथ खूब खेलते हैं इस तरह से हम अपने बच्चों के और पास आ जाते है उनके साथ हमारा सम्बन्ध मजबूत बनता है। मुझे तो आज भी याद है कि गर्मियों की छुट्टियों हम सब बच्चे मिलकर देर रात तक खेलते थे। सबकी मम्मी बुला बुला कर थक जाती थी। हम सब बच्चों का खेल में मन और हमारी मम्मी अपनी सहेलियों के साथ बैठकर गप्पें मारती थी।
भरी दोपहर में जब मम्मी सो जाती थी तब हम दोनों बहने छुप छुपाकर बाहर निकल कर गुड्डे गुड़ियों के साथ खेलते थे, उनके लिए खाना बनाना, उनकी शादी करना, अपनी सखी सहेलियों को बुलाना, पार्टी करना, कितना मजा आता था।

एक किस्सा तो मुझे आज भी याद है। एक दिन दोपहर में मम्मी सो गई और हम दोनों बहने घर से बाहर निकल कर अपने मोहल्ले की औरतों को अपने गाने सुना रही थी हमारे साथ गली के और भी बच्चे थे सब मस्त होकर हमारा गाना सुन रहे थें, मेरी बहन नाच भी रही थी तभी मेरी मम्मी भी वहाँ आ गयी और फिर हम दोनों की खूब धुलाई हुई जो हमे आज भी याद है।

ये सब खेल मेरी बेटी को कहाँ मिलेगें?? लेकिन मेरी पूरी कोशिश है कि मेरी बेटी भी सबके साथ मिल जुल कर खेलें और अपने बचपन को यादगार बना सके। आज कल लोगों का आपसी प्रेम और व्यव्हार बदल गया हैं। बच्चों के साथ होने वाले अत्याचार, यौन शोषण के कारण किसी पर भी विश्वास करना मुश्किल हो गया है। माना कि आज की हाईटेक टेक्नोलॉजी से हमें बहुत सुविधा उपलब्ध हैं लेकिन इसके कारण हम अपने रिश्तों से दूर होते जा रहे है प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही दुनियां में खोया हुआ है व्हाट्सएप, फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम से जुड़े हुए हैं लेकिन अपने आस पास रहने वाले लोगों के साथ बात करने का समय नही है।

आपके क्या लगता है? कि मेरा हो या आपका बचपन जैसा हमने इन्जॉय किया है वैसे हमारे बच्चे कर भी पायेंगे या नही?

मूल चित्र : Unsplash 

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