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पर तुम पुरुष हो ना, तुम स्वीकार थोड़े ना करोगे

Posted: April 27, 2020

तुम मेरी फ़िक्र करो, ना करो, मेरे रहते घर से बेफिक्र हो तुम, जानती हूँ मैं, और मानते हो तुम भी, पर पुरुष हो ना, स्वीकार थोड़े ना करोगे। 

जानती हूँ मैं, और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी,
पर पुरुष हो ना,
स्वीकार थोड़े ना करोगे…

मैं पुरुष नहीं, बदल जाय जो हालात के संग
मैं नारी हूं, जो बदले खुद को हालात के रंग
जानती हूँ मैं, और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी,
पर पुरुष हो ना ,
स्वीकार थोड़े ना करोगे…

मैं राम नहीं, ना ही मैं हूँ कृष्णा,
न रावण के जैसी मुझमें मृगतृष्णा,
खुद को मिटाकर तुम्हें बचाऊं
जानती हूँ मैं, और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी।
पर पुरुष हो ना,
स्वीकार थोड़े ना करोगे…

मैं समय नहीं जो बदल जाए,
पत्थर भी नहीं जो थम जाए,
सागर हूं, गगरी नहीं जो छलक जाए,
जानती हूँ मैं, और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी,
पर पुरुष हो ना ,
स्वीकार थोड़े ना करोगे…

भुला सकते हो तुम अपनी खुशी में मुझ को,
हो सकता है याद भी ना आऊँ तुम को,
पर याद करो दुःख का कोई एक पल,
सदा ही साथ खड़ा पाया होगा मुझ को,
जानती हूँ मैं, और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी,
पर पुरुष हो ना,
स्वीकार थोड़े ना करोगे…

तुम मेरी फ़िक्र करो, ना करो,
तुम मेरा ज़िक्र करो, ना करो,
मेरे रहते घर से बेफिक्र हो तुम,
जानती हूँ मैं, और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी,
पर पुरुष हो ना,
स्वीकार थोड़े ना करोगे…

चाहे युग वैज्ञानिक हो,
या कोई सा भी युग रहा होगा,
याद करो मैंने नहीं,
तुमने ही मुझे छोड़ा होगा,
जानती हूँ मैं, और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी,
पर पुरुष हो ना,
स्वीकार थोड़े ना करोगे…

मैं बाहर से कोमल, भीतर से कठोर,
तुम भीतर से कोमल, बाहर से कठोर,
इक दूजे के पूरक, ना अस्तित्व कहीं और,
जानती हूँ मैं, और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी,
पर पुरुष हो ना,
स्वीकार थोड़े ना करोगे…

मूल चित्र : Pexels

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Samidha Naveen Varma Blogger | Writer | Translator | YouTuber • I have done M.A in English Literature. •

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